शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

गांधी जयंती के बहाने।

दो अक्तूबर गांधी जयंती के उपलक्ष में प्रधान मंत्री ने कहा कि नफरत और संघर्ष के कारण महात्मा गांधी का शांति(सत्य का नहीं?)और अहिंसा का संदेश आज भी दुनियां में प्रासंगिक है।लेकिन अपने समाज में अप्रत्याशित रफ्तार से बढ़ रही हिंसा की प्रवृति के कारणों और शीघ्रातिशीघ्र निदान खोजने की आवश्यकता उनको महसूस नही हुई।आज देश के किसी भी भाग में इंसान स्वयं को सुरक्षित महसूस नही कर रहा है। कहीं पर बम के धमाके हैं तो कहीं सांप्रदायिक हिंसा। सांप्रदायिक तत्व अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए आम लोगों को धर्म, जाति, भाषा प्रांत आदि के खांचों में बाट कर हिंसा के लिये भड़का रहे हैं।सरकारें इन असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने से बचती हैं । कारण उनके स्वंय के राजनीतिक हित इस प्रकार की हिंसा से ही सधते हैं। समाज में गरीबी, बेरोरजरगारी इस कदर बढ़ रही है कि समाज के बड़े तबके को वर्ग संघर्ष के अलावा न्याय पाने का दूसरा रास्ता नजर नहीं आता। क्रांतिकारी आंदोलनों को दबाने के लिए सरकारें गरीबों, शोषितों, विस्थापितों को आपस में बाटने में तथा एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने लगी हैं(मसलन् छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम)। गाधी जयंती पर राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि तो हिंसा के कारणों की समीक्षा ही होगी। क्योंकि सत्य के बगैर अहिंसा संभव ही नही है ।पर हमारे प्रधान मंत्री शांति तो याद रखते हैं सत्य नहीं।
‘त्याग की मूर्ति’ कांग्रेस अध्यक्ष ने भी पानीपत की अपनी रैली में गांधी के आदर्शों का बखान किया। परन्तु केन्द्रीय की सरकार की उपलब्धियों में उन्होंने केवल परमाणु करार का नाम लिया जिसको अमेरिकी सीनेट ने गुरुवार दो अक्तूबर को ही पास कर दिया था।परमाणु करार अपने आप में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला समझौता है। परमाणु ऊर्जा के जिस उत्पादन को इस करार से बढ़ाया जा सकेगा उससे पर्यावरण के प्रदूषण की जो आशंक्षा व्यक्त की जारही है। इस प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। और इस कुप्रभाव से मासूम बच्चे सर्वाधिक पीड़ित होते हैं। परमाणु ऊर्जा उत्पादन में लगी विदेशी कंपनियों के पुराने संयंत्रों को खरीदने में हमारे राजनेता इतने आत्मविभोर हुए हैं कि उनको दीवार पर लिखी यह इबारत नजर नही आती।उनको अपने नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य पर मडराने वाला खतरा भी नहीं दिखता। उन्हें यह जानने की आवश्यकता ही महसूस नही होती कि क्यों फ्रांस,डेनमार्क, नीदरलैंड परमाणु ऊर्जा उत्पादन से अपना हाथ खीच रहे हैं । अमेरिका में भी आखिरी परमाणु संयंत्र व्यावसायिक रूप में 1996 में चालू किया गया था।
सामयिक वार्ता में मनमोहन सिंह पर रत्नेश कुमार कविती छपी है।उसमें लिखा गया है प्रिय मनमोहन/भारतीय तन/ अमेरिकी मन/ कहता जन-जन। मनमोहन ही क्यों?अमेरिकी मन तो आज हर उस मध्यवर्गीय भारतीय का है जो कोई न कोई जुगाड़ लगा कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हिस्सा बनने की कोशिश में लगा है। या बन गया है। हम भारतीयों का यह मर्ज पुराना है।अंग्रेजों के भारत आने के बाद से ही अधिकतर संभ्रांत भारतीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने में ही अपना भविष्य देखने लगे थे। हिन्द स्वराज के सातवे अध्याय में गांधी लिखते हैं कि फटापट धनी बनने के चक्कर में भारतीयों ने कम्पनी के कारिन्दों की सहायता की उनको गले लगाया। 1947 में अंग्रेज चले गए।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय जगत में इग्लेंन्ड का स्थान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने ले लिया। अब अधिकतर संभ्रांत भारतीय (उनकी विचारधारा अमेरिका विरोधी ही क्यों न हो) अमेरिका से जुड़ने में ही अपना भविष्य देखते हैं। सरकारी स्तर पर 1992 से पूरे भारतीय व्यवस्थआ को ही अमेरिका के सांचे में ढ़ालने की कवायद होरही है। लेकिन अमेरिकीकरण की इतने सालों की प्रक्रिया में भी हम आजतक उनके(आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के) उस गुण को नही आत्मसात कर पाए जिसके गांधी भी कायल थे। हिन्द स्वराज के पांचवे अध्याय में अंग्रेजों के सदगुण बताते हुए गांधी लिखते हैं कि अंग्रेज कभी अपने देश की किसी प्रकार की हानि बर्दास्त नही करते । यह गुण अमेरिकियों में भी कूट कूट कर भरा है। इंग्लेंड से आजादी हासिल करने के बाद अमेरिका ने इंग्लेंड पर अपनी असमान आर्थिक निर्भरता से पूरी तरह निजात पा ली और ब्रितानी साम्राज्यवाद से अन्तर्राष्ट्रीय जगत में होड़ करने लगा । प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश की भूमिका में उभरा।
अमेरिका के विपरीत हम भारतीयों में ठेट भारतीय हितों के संरक्षण एवं संवर्धन की कोई जीजीविषा नही दिखती।(अपने को सबसे बड़े राष्ट्रवादी का तमगा देने वाले हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन अंग्रेजों के समय से ही उनके हाथ की कठपुतली बने रहे। आज भी देश के विभिन्न भागों को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौक कर साम्राज्यवादी तत्वों का ही हित साध रहे हैं।) यदि जीजीविषा होती तो अमेरिका के एक इशारे पर हमारे ईमान्दार प्रधान मंत्री अपनी सरकार को दांव पर नही लगाते तथा हर प्रकार के अनैतिक हथकंडे अपना कर संसद में विश्वास मत हासिल करने की औपचारिकता पूरी नही करते। जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने, सांसदों ने पाले बदले वह दर्शाता है कि हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की ही है।आज भी हम अपने पूर्वजों की तरह ही (इंग्लेंन्ड की जगह)अमेरिका का स्वागत,उसकी मदद अपने क्षुद्र निजी स्वार्थों की पूर्ति या प्रतिरोध की क्षमता की कमी की वजह से कर रहे हैं। गांधी ने इस खतरे से हमें 1909 में ही सावधान कर दिया था उन्होंने लिखा कि पूँजी अंग्रेजों के लिए ईश्वर है। आज अमेरिकियों के लिए भी यह ईश्वर से कम नही है। अमेरिकियों का व्यापार भी हमें 1909 में अंग्रेजों के व्यापार की तरह अति पसंद है। ब्रितानियों की तरह अपने तौर तरीकों से अमेरिकी हमें खुश रखते हैं और जो चाहते हैं हमसे करवा लेते हैं।(2,10,2008 की परमाणु संधि इसका एक उदारहण है।)
1909 गांधी ने बताया कि अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। तथा पूरी दुनियां को अपना बाजार बनाना उनका लक्ष्य था । उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेरिका ने भी आज पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी अर्थव्यवस्था का बंधक बनाकर रखा है।1909 की तरह आज भी हम देशवासी भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी पकड़ मजबूत करने में लगे हैं। 1909 में अंग्रेज पूरे विश्व को अपनी मंडी बनाने का प्रयास कर रहे थे पर पूरी तरह सफल नही हो पाए। इसके विपरीत आज अमेरिका ने पूरे विश्व को कमोवेश अपनी मंडी बना ही लिय़ा है। 1909 में यदि हमने आपस में लड़कर अंग्रेजों की शक्ति को बढ़ाया था तो आज भी सभी समाजों के सांप्रदायिक तत्वों ने पूरे देश को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौकने में कोई कोर कसर नही उठा रखी है।
हिन्द स्वराज के पंद्रहवे अध्याय में गांधी जी बताते हैं कि भारत को किस प्रकार का स्वराज नही चाहिये।अपना मंतब्य समझाने के लिए वे इटली का उदाहरण देते हैं। चूंकि समाज का भविष्य समाज को दिशा देने का दावा करने वाले नेताओं की विचारधारा पर निर्भर करता है इसलिए गांधी इटली के दो प्रमुख नेताओं की विचारधाराओं में भिन्नता की दर्शाते हुए राष्ट्र का मतलब समझाते हैं ।नेता का जनता के प्रति कर्तव्य बताते हैं। गांधी कहते हैं गैरीबाल्डी के लिए इटली का अर्थ वहां का राजा तथा उसके अनुचर थे, जबकि मैज्जिनी के लिए इटली का मतलब वहां की जनता थी। मैज्जिनी राजा को महज जनता का सेवक मानते थे।इटली और आस्ट्रिया के बीच हुआ युद्ध केवल दो राजाओं के बीच का टकराव था जिसमें इन देशों की जनता की हैसियत केवल प्यादे की थी। युद्ध जीतने के बाद इटली की उपलब्धियां मामूली रही। जिन सुधारों के नाम पर युद्ध लड़ा गया था उनको लागू नही किया गया। लोगों की हालत में कोई सुधार नही हुआ है। इसलिए इटली के मजदूरों में असंतोष पनपता रहा। वे हत्याएं करते रहे तथा विरोध प्रदर्शन करते रहे। उनके विद्रोह की आशंका हमेशा बनी रही। गांधी नही चाहते थे कि स्वराज मिलने पर भारत के लोगों की ऐसी दुर्गति हो। यहां के नेता जनता के नाम पर सत्ता हथिया लें ऐसा वे नही चाहते थे । गांधी के लिए राष्ट्र भक्ति (देश भक्ति ) का अर्थ आम जन को तानाशाही के दमन चक्र से बचाना था। देश भक्ति का गांधी के लिए मतलब था सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय । दबाव की राजनीति में गांधी विश्वास नही करते थे।वे मानते थे कि हिंसा के माध्यम से हासिल किये गए अधिकार स्थाई नही होते। कारण जैसे ही हिंसा का भय दूर होजाएगा व्यवस्था इन अधिकारों को वापस ले लेगी।
हमारी आजादी के साठ सालों का इतिहास दर्शाता है कि भारतीय लोगों को अधकचरी आजादी ही मिली।राजनीतिक दल सत्ता हथियाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। आम इंसान की आवश्यकताएं, और महत्वाकाक्षाएं, हमारे राजनीतिक तंत्र की प्रार्थमिकता नही रही है। समय बीतने के साथ साथ नेताओं तथा उनके द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था का असली रुप समाज के सामने आगया। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की जगह पूँजी खासकर विदेशी पूँजी हिताय उनका उद्देश्य रह गया है। 1992 के बाद स्थिति और भी खराब होने लग गई है। उदारीकरण की वजह से अमीर और अमीर गरीब और गरीब होरहे हैं।हताशा में विभिन्न वर्गों के लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अभी तक किसानों की आत्मह्त्या सुर्खियों में थी तो अब बुरकरों के आत्महत्या के समाचार आने लगे हैं। आर्थिक मंदी के कारण डाक्टर सटोरियों के भी मानसिक परेशानियों का शिकार होने की घटनाएं बता रहे हैं।
लोगों का धैर्य उनका साथ छोड़ रहा है।अपनी जायज और नाजायज मागें मनवाने के लिए लोग हिंसा का सहारा ले रहे हैं। व्यवस्था का दमन भी चरम पर है।आज देश और देशवासियों की हालात उस तरह की ही है जिस तरह की हालत देख कर गांधी को 1909 में रोना आता था। भारतीय नेता भी गैरीबाल्डी की तरह हैं। इन नेताओं के लिए लोग राष्ट्र का निर्माण नही करते वरन् भौगोनिक सीमाएं देश का निर्माण करती हैं।

बुधवार, 17 सितंबर 2008

पतिव्रता की मजबूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कांग्रेस के पास भेजे गए 123 के नीतिगत दस्तावेज में कहा कि करार में भारत को ईधन आपूर्ति का आश्वासन एक राजनीतिक वादा है और इसे कानूनी बाध्यकारी वादे में तब्दील नही किया जासकता। बुश का बयान आते ही भारत सरकार सफाई देने में या कहिये लीपा पोती में लग गई।कानूनी मामलों में कानूनविद ही ज्यादा अच्छी तरह समझा सकते हैं। अतः कपिल सिब्बल आगे आये उन्होंने फरमाया कि अमेरिका ने राजनीतिक वादा किया है कि परमाणु ईधन की आपूर्ति में रुकावट आने की स्थिति में वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के अन्य सदस्यों से मदद मांगेगा। कपिल सिब्बल ने सफाई दी कि बुश ने यह नही कहा कि वे इस राजनीतिक वादे का सम्मान नही करेंगे।सिब्बल का मानना है कि कानूनी बाध्यता एक अलग सवाल है। (जनसत्ता,13,09) भारत अमेरिका के संबंधों को समानता के तथा आपसी हितों के संरक्षण व संबर्धन के पटल पर स्थापित करने के आधार तो कानूनी प्रावधान ही होंगे। इसीलिए अमेरिकी सरकार ने हाइड कानून पास किया और इस संधि को हाइड कानून तथा 123 के तहत ही कांग्रेस से पास करवा रहा है। सरकारें तो शायद कानूनी बाध्यताओं के आधार पर ही चलती हैं राजनीतिक वायदों के आधार पर नहीं। क्योंकि राजनीतिक वादा तो वुश ने किया है। बुश की कुर्सी गई तो वादा भी गया। यदि कुर्सी रहते भी बुश वादे को भूल जाते हैं तो भारत क्या कर सकता है। यदि राजनीतिक वादे में कोई बाध्यता होती तो बुश को यह सफाई देने की क्या आवश्यकता थी कि कोई कानूनी बाध्यता नही है। इस संदर्भ में इतिहास से यह उद्धरण भी प्रासंगिक है। प्रथम विश्व युद्ध के समय में अपनी आजादी की अलख जगाए देशों का समर्थन पाने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने वादा किया कि युद्ध के बाद गुलाम देशों को स्वनिर्णय का अधिकार दिया जायगा।इसी उमीद में गांधी जी ने भारत में अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती का अभियान चलाया। लेकिन बाद में जब अमेरिकी कांग्रेस ने वर्साय संधि पर मुहर लगाने से इंकार कर दिया तो वुडरो विलसन के सारे वादे धरे के धरे रह गये। किसी ने उन पर मुकरदमा भी नही चलाया। अपने देश में दुर्भाग्य से बुश की कांग्रेस को सफाई के बाद यह राजनीतिक बनाम् कानूनी बाध्यता चिंता का विषय नही बनी। चिंता का विषय बना तो सरकार पर इस संधि का विरोध करने वाले वाम पंथियों के हाथ सरकार पर प्रहार करने के लिए आया यह नया हथियार। अमेरिका से संबंध बनाए रखने के लिए इस हथियार को भोथरा करना आवश्यक था।आज अधिकतर तथाकथित जागरूक भारतीय, मीडिया सभी अमेरिका के अनुकरण में ही देश का हित देख रहे हैं। सरकार और उसके समर्थक राजनीतिक दलों को तो इसी प्रकार के जनमानस की दरकार है।इसीलिए 11 सितंबर को अपने रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने वाशिंगटन में अमेरिकी हथियार कंपनियों को भरोसा दिलाया कि उनको देश में व्यापार करने का बराबरी का मौका दिया जायगा। भारतीय समुदाय के समारोह में मंत्री महोदय ने वियना में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से मिली छूट के लिए भी बुश प्रशासन का आभार जताया। लेकिन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में आने वाली दिक्कतों को ठंडे बस्ते में ही बंद रखना रक्षा मंत्री ने सुविधाजनक समझा।(जनसत्ता 12,9,) उल्लेखनीय है कि वाशिंगटन पोस्ट ने अपने संपादकीय Yes for an Answer में लिखा है कि भारत अमेरिका परमाणु संधि अमेरिका के हित में है। इससे अमेरिकी परमाणु उद्दोगों को बाजार मिलेगा। पोस्ट ने चिंता व्यक्त की कि यदि कांग्रेस इस विधेयक को पास नही करेगी तो बाजार का यह लाभ फ्रांसीसी कंपनियां ले लेंगी।(पी.टी.आई. 12,09,08) 13 सितंबर को संधि के विरोधी से समर्थक बने, मनमोहन सरकार के संजीवनी बने अमर सिंह ने फरमाया कि भारत अमेरिका असैन्य समझौते के बाद भारत जब उपकरणों का आर्डर देगा तो अमेरिका कंपनियों को घाटे नहीं रखा जाएगा।(जनसत्ता 14 सितंबर)स्मरणीय है कि इस प्रकार का बेवाक शर्त विहीन आश्वासन ये मंत्री व जन नेता अपने लोगों को नही देते। किसान 10 पंद्रह हजार का कर्ज नही चुका पाने के कारण देश के हर राज्य में आत्महत्या कर रहे हैं। पर है कोई माई का लाल नेता जो यह कह दे कि बहुत हो चुका अब भारत का किसान आत्महत्या नहीं करेगा। हमारे संवेदनशील प्रधान मंत्री भी पैकेज की घोषणा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। दलितों, आदिवासियों, गरीब गुरबों के बीच जाकर, उनकी रोटी पानी का सेवन करने की हिम्मत करने वाले, उनकी झुग्गियों में रात विता कर भारत के हासिये में रह रहे इंसान की मुश्किलों को समझने की कोशिश कर रहे भारत के युवा नेता राहुल गांधी भी आम भारतीय की हालत नही सुधरने का सारा दोष राज्य सरकारों पर मढ़ देते हैं। काग्रेस शासित राज्यों में भी हालात बेहतर नही हैं यह तथ्य उनकी जवान नही लड़खड़ाता। यही बात आतंकवादी हमलों या बाढ़ पीड़ितो को राहत पहुचाने के संदर्भ में कही जासकती है। इस प्रकार भारतीय नेताओं की भारतवासियों के लिए प्रतिबद्धता व अमेरिकी हितों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता में साफ फर्क नजर आता हैं।अमेरिका के लिए जब हम प्रतिबद्ध होते हैं तो बदले में अमेरिका से उसी प्रकार की प्रतिबद्धता की अपेक्षा भी नही करते।उल्टे जब कभी इस प्रकार के प्रश्न को दबाए रखना संभव नही होता तो लीपा पोती करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अमेरिका के एक खास प्रकार के संबंध बनाए रखने की हमारी मजबूरी एक पतिव्रता स्त्री की मजबूरी की भांति है।भारतीय पतिव्रता नारी भी अपने पति के हर अवगुण और वादखिलाफी को नजरअंदाज कर उसको परमेश्वर मानकर उसकी सेवा में लगी रहने में ही अपना सौभाग्य समझती रही है।आधुनिक भारत में राजा राम मोहन राय के समय से ही संपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय नेता व समाज सुधारक पतिव्रता स्त्री को पतिव्रत के इस गैर बराबरी तथा दोहरे मापदंड़ों की गुलामी से आजाद करने की कोशिश करते रहे। आज दुर्भाग्य से पूरे देश को ही अमेरिका के संदर्भ में इस प्रकार की गैर बराबरी के, आर्थिक गुलामी के रिस्तों में धकेला जारहा है। यह सब महान त्यागी कर रहे हैं। जाने माने अर्थशास्त्री कर रहे है और राष्ट्र हित के नाम पर होरहा है।

सोमवार, 8 सितंबर 2008

जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो...

जनसत्ता के 24 अगस्त के अंक में साजिद रशीद ने अजित साही की 16 अगस्त के तहलका पत्रिका में छपी रपट पर अपनी टिप्पणी खुले पत्र की शैली में लिखी। तहलका पत्रिका में छपी रपट में लेखक ने सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आँफ इंडिया ) के गिरफ्दार सदस्यों पर पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद ठहराने की कोशिश की। साजिद रशीद ने कुछ और पहलुओं को उजागर कर यह समझाने की कोशिश की कि समस्या का दूसरा पहलू भी है। साजिद रशीद की रपट पढ़ कर लगा कि वे इस्लाम के नाम पर आम युवकों को हिंसा के मार्ग पर लेजाने वाले संगठनों की बड़ी बेवाकी से भर्तस्ना करने की कुव्वत रखते हैं। साथ ही जैसा कि उन्होंने स्वयं ही लिखा है कि हिंदू अतिवादी संगठनों के विरुद्ध गवाही देने में भी वह पीछे नही रहे हैं। उनकी आपत्तियों का अजित साही ने 7,9 के जनसत्ता में जो उत्तर दिया वह साजिद रशीद के तर्कों को अपने तत्थों से काटने नूरा कुश्ती भर थी। दुर्भाग्य से अजित साही ने साजिद रशीद की चिंता पर गौर करने का कष्ट नही किया। साजिद रशीद ने 10 अगस्त को भी सिमी पर जमात-ए-इस्लामी का बजरंग दल शीर्षक से लेख लिखा। साजिद रशीद के तीनों लेखों को पढ़ने से यह समझ में आया कि उनकी चिंता उनके समाज का भविष्य है। सिमी के गिरफ्दार नेताओं का कानून का नजर में निर्दोष होना उनके लिए इतना मायने नही रखता जितना अजित साही के लिए दिखता है।साजिद रशिद उनको बेकसूर नही मानते। फिर भी इसमें कोई शक नही है कि पुलिस आतंकी घटना के बाद अल्पसंख्यक समाज के गरीब तबके के बेकसूर लोगों को पकड़ कर उन पर जुल्म करती है। (आरुसि हत्या कांड में भी घरेलू नौकर ही पकड़े गए हैं। उनमें से एक को सबूतों के अभाव में जमानत भी मिल गई है।) ।
साजिद रशीद महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे है। धर्म के नाम पर सिमी द्वारा फैलाई जारही जो आतंकी विचारधारा है वह नव युवकों को गुमराह कर रही है।और ये भोले भाले नवयुवक बहकावे में आकर अपना और साथ में पूरे समाज का नुकसान कर रहे हैं। अजित साही से उम्मीद थी कि वे अपने उत्तर में या तो यह सिद्ध कर दें कि सिमी एक अहिंसक संगठन है और उसकी गतिविधियों से इस्लाम व मुसलमानों का भला ही होरहा है। पर वह यह नही कहते हैं। खाली सिमी के उद्देश्य लिख देते हैं। हमें यह नही भूलना चाहिये कि आज पूरे देश में धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर आम जनता का भावनाएं भड़काई जारही हैं। राजनीतिक स्वार्थों के लिए यह सब किया जारहा है। जो काम मुसलमानों के बीच सिमी कर रहा है वही काम हिंदुओं के बीच संघ परिवार कर रहा है।ओडिसा में गरीब दलित व आदिवासी धर्म के नाम पर आपस में मर कट रहे हैं। ये हिंसा कौन फैला रहा है धार्मिक संगठन। महाराष्ट्र में भाषा के नाम पर लोगों को उकसाया जारहा है। कुछ साल पहले खालिस्तान के नाम पर सिख युवकों को गुमराह किया गया। पंजाब के एक प्रोफेसर व प्रसिद्ध रंगकर्मी जो खालिस्तान आंदोलन का खुलकर विरोध कर रहे थे ने दिल्ली में एक जन सभा में कहा था कि बम फटने की हर घटना के बाद पुलिस आस पास के दस बीस गावों से नौ जवानों को उठा लेजाती थी।अपने बच्चों को छुड़ाने के लिए हर माता पिता को 10,000 रुपये घूस देनी पड़ती थी। उस समय 10,000 रुपये आज के मुकाबले बड़ी राशि हुआ करती थी। खालिस्तान आंदोलन ने पंजाब खासकर सिखों को जो नुकसान पहुचाया क्या कभी उसका आंकलन होगा। क्या कभी आंदोलन के नेता उन माताओं से माफी मांगेंगे जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। काश्मीर में तो खोये हुए व्यक्तियों के रिस्तेदारों ने एक संगठन ही बना लिया है। धर्म, भाषा,क्षेत्र, वर्ग संघर्ष के नाम पर जो भी हिंसक वारदातें होती हैं उनमें मरते तो बेकसूर ही हैं।छत्तीसगड़ में भी नक्सली हिंसा व सलवा जूडूम में मर तो आदिवासी ही रहे हैं। बिहार में नक्सलियों व जमींदारों की सेनाओं के बीच होने वाली हिंसक झड़पों में मरे तो दलित ही।अक्सर हिंसक आंदोलनों को चलाने वाले नेता या तो विदेश में आराम फरमाते हैं या देश में सुरक्षित ठिकानों में रहते हैं। लिट्टे के प्रभाकरन् भी गरीबों को ही मानव बम बनाते हैं। बम विस्फोटों में असंख्य बेकसूर मरते हैं। कई वेकसूरों को पुलिस पकड़ कर यातना देती है। प्रभाकरन् तो सुरक्षित ही रहते हैं। क्या आमजन को बलि का बकरा बनाने की इस साजिस का भंडाफोड़ नही होना चाहिये?संक्षेप में समाज में विष राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले नेता ही अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए फैलाते हैं उससे मरते आम बेकसूर हैं। करता कोई है भरता कोई है। साजिद रशीद इस करने वाले पर अंगुली उठा रहे है। काश अजित साही इस इशारे को समझ पाते और माकूल जबाब देते। अब समय आगया है अपने समाज के ताने बाने को बनाए रखाने के लिए हम सबको मिलकर, अपने निहित स्वार्थों के लिए इस ताने बाने को नष्ट करने वालों को रोकना चाहिये।

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

सांप्रदायिकता का यह दंश तो भारतीय नही है।

आज हिंदुओं की अस्मिता की रक्षा के नाम पर जिस तरह की हिंसा हिंदूवादी संगठन फैला रहे हैं उस तरह की हिंसा की परंपरा न भारतीय है और न ही हिंदू है। बिनौय कुमार सरकार का हिंदू राजनीतिक दर्शन पर एक लेख दिसंबर 1918 के पोलिटिकल साइंस क्वाटरली, पेज 482-500 में छपा।इस लेख में बिनौय कुमार सरकार लिखते हैं कि भारत कट्टर प्रकार की थिआँक्रसि कभी नही था। यहां राज्य धार्मिक संस्थाओं के अधीन कभी नही रहा। हिंदू राज्यों की एक अंय विशेषता यह थी कि वे पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष थे। भारत में धर्म का राजनीति पर कभी भी प्रभुत्व नही रहा। हमेशा ही राज्य का धार्मिक संस्था से अलग स्वतंत्र अस्तित्व रहा। धार्मिक संस्थाओं ने कभी भी राज्य की शक्तियां हासिल करने की कोशिश नही की। धार्मिक संस्थाओं ने कभी राज्य के मामलों में हस्तक्षेप नही किया। इसके विपरीत यूरोप में चर्च और राजा के बीच अक्सर टकराव होते रहते थे। चर्च धार्मिक और भौतिक दोनों क्षेत्रों को अपना नियंत्रण में रखना चाहता था। इसके अलावा पोप अपने कार्डिनल तथा लें गिट्स के माध्यम से भी यूरोपीय राज्यों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करते रहते थे । हिंदू धार्मिक संस्थाओं का इस प्रकार का इतिहास नही रहा है।

13वीं सदी के प्रारंभ से भारत में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। पर भारत के इतिहास में कोई मुसलिम काल नही है इस्लाम के भारत आगमन के पश्चात भी यहां का कोई हिस्सा किसी विदेशी शक्ति के अधीन नही था। सर्व प्रथम इस्लाम ने राजनीतिक तौर पर भारतीयों की आजादी पर अंकुश नही लगाया। दूसरा पूरे देश में कभी भी मुसलमान राजाओं का शासन नही रहा। तीसरा मुसलमान राजाओं व हिंदू राजाओ के आपसी रिस्ते,मुसलमान राजाओं और उनकी हिंदू प्रजा के बीच के रिस्ते,हिंदू राजाओं तथा उनकी मुसलमान प्रजा के बीच के रिस्ते कभी भी रोमन कै थँलिक –प्रा टिस्टैंट के रिस्तों की तरह कटु तथा हिंसक नही रहे। आमतौर पर हिंदू राजाओं के गैर हिंदू प्रशासनिक अधिकारी तथा गैर हिंदू राजाओं के हिंदू सलाहकार व सेनापति होते थे। पुजारी का प्रभाव केवल राजा की तथा जनता निजी धार्मिक जिंदगी तक सीमित था। राज्य की समितियों में पुजारी का दखल केवल तीज त्यौहारों तक सीमित होता था। हर शासक का नैतिक आचरण पर अवश्य धार्मिक मूल्यों के अनुसार होता था। मध्य काल के भारत के राजनीतिक इतिहास में उस प्रकार की अशांति और असुरक्षा कभी नही रही जिस प्रकार रोमन साम्राज्य के उत्थान व पतन के समय दिखी, या इग्लेंन्ड के वेल्स, आइरिस, व स्काट की लड़ाइयों में, या इग्लेंन्ड और फ्रांस के बीच सौ साल के युद्ध में , या इटली के गणराज्यों के मध्य हुए संघर्ष में,या इग्लेंन्ड के गृह युद्ध में, व अन्य यूरोपी देशों में हुए युद्धों में दिखी।
समाज में सारी अच्छाई का स्त्रोत नीति शास्त्र को माना गया जिस प्रकार शरीर को हृष्ट पुष्ट रखने के लिए पौष्टक आहार आवश्यक होता है उसी प्रकार व्यक्ति एवं राज्य के जीवन में स्थायित्व लाने के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का अनुकरण आवश्यक था।हिंदू राजाओं के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक था। नीतिशास्त्र के सिद्धांतों का अनुकरण करके ही राजा प्रजा दोनों के ही हितों का संरक्षण व संवर्धन होसकता है ऐसी मान्यता थी। चूंकि राजा पर अपनी प्रजा के हितों के संरक्षण संबर्धन की जिम्मेदारी थी इसलिए राजा के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का प्रशिक्षण आविश्यक था।
16वी सदी में अब्दुल फजल ने आइने अकबरी में हिंदू नियमों कानूनों का संक्षिप्त विवरण पारसी भाषा में छापा। अब्दुल फजल अकबर के मंत्री थे. अब्दुल फजल ने लिखा कि बुद्धिमान राजा अपने दरबार से भ्रष्ट व षडयंत्रकारियों का सफाया कर देगा।अपने इस महत्वपूर्ण ग्रंथ में अब्दुल फजल ने राजा की तुलना माली से की गई है। जैसे माली बगीचे से खरपतवार उखाड़ कर एक ओर कर देता है और बगीचे को सुंदर बना देता है। साथ ही बगीचे की रखवाली के लिए बाड़ भी चारों ओर उगाता है। ताकि कोई बाहरी तत्व बगीचे में नहीं घुस सके। उसी प्रकार राजा अपने राज्य व प्रजा की देखभाल करता है। अपने प्रशासकों व प्रजा के बीच द्वंद होने पर राजा को प्रजा के साथ खड़ा होना होता था। शुक्र के नीतिशास्त्र के अनुसार राजा को भ्रष्ट लोगों, चोरों उचक्कों,बतमाशों, व अन्य प्रकार की नकारात्मक प्रवृति के लोगों को राज्य का संरक्षण नही देना चाहिये। संक्षेप में बिनौय कुमार सरकार का मानना है कि धार्मिक उन्माद फैला कर समाज में हिंस फैलाना न हिंदू धर्म दर्शन का हैं और न ही कई धर्मों का गुलदस्ता भारतीय धर्म दर्शन का।

बुधवार, 3 सितंबर 2008

धर्म पर अधर्म की विजय का दिवस

शनिवार (30 अगस्त 2008)) देर रात या यों कहे रविवार के तड़के श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति और जम्मू काश्मीर सरकार के बीच समझौता हो जाने का समाचार सोमवार 1सितम्बर के समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपा। जम्मू काश्मीर सरकार ने श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति को काश्मीर में 40 हेक्टेयर जमीन के यात्रियों के लिए अस्थाई इस्तेमाल की इजाजत मिल गई। श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के संयोजक लीलाकरण शर्मा ने कहा कि “यह ऐतिहासिक और हमारे लिए विजय का दिन है।”विजय किसकी किस पर ? समझ में नही आया। काश्मीर के कट्टरपंथी इसका विरोध कर रहे हैं। तो क्य़ा जम्मू के कट्टरपंथी इसको काश्मीर के कट्टरपंथियों पर अपनी जीत मान रहे थे? इस मायने में यह जीत तो काफी संकीण हुई। धर्म की तो नही ही हुई है।64 दिन के इस आंदोलन से जम्मू काश्मीर अर्थव्यवस्था को, वहां की शिक्षा व्यवस्था को, वहां के सामाजिक ताने बाने को, राज्य के विभिन्न हिस्सों के आपसी रिस्तों पर जो गहरी चोट पहुचाई है उसके एवज में सौ एकड़ जमीन के यात्रियों के लिए अस्थाई इस्तेमाल की इजाजत से किसकी जीत हुई है—अहंकार और अभिमान की? धर्म अहंकार, अभिमान को जीतने का रास्ता दिखाता है । धर्म अहंकार और अभिमान के मद में मस्त होकर दूसरों को नीचा दिखाने,दुखी करने, दीन हीनों को और परेशान करने की इजाजत कभी नही देता। धर्म कभी भी इतना संकीर्ण नही होता है कि 40 हेक्टेयर जमीन के अस्थाई इस्तेमाल की इजाजत पाने के लिए एक पूरे प्रांत के जन जीवन को 64 दिन तक अराजकता की आग में झौंक दे। धर्म किसी की भावनाओं को आहत नही करता। जब कि यह आंदोलन तो एक ही प्रांत के दो हिस्सों के राजनीतिक संगठनों का वोटों के लिए धर्म के नाम पर लोगों की भावना भड़का कर, हिंसा, आगजनी के बल पर अपनी बात मनवाने की कवायत भर थी।इस कवायत में सभी संगठनों ने अर्ध सत्य व झूठ का सहारा लिया। यह तो अधर्म के लिए धर्म का इस्तेमाल था।
64 दिन के इस आंदोलन में भोले का नाम खूब उछाला गया। उस भोले के नाम पर सारी हिंसा हुई जो इस देश के लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरती गंगा के वेग को अपनी जटाओं में संभाल लेता है। ताकि पृथ्वी पर गंगा के तेज पर पृथ्वी की तथा उस पर रह रहे प्राणियों की कोई हानि न हो । उस भोले शंकर के नाम पर सारा विष उगला गया जिसने समुद्र मंथन में मिले विष का पान इसलिए किया था ताकि देवता अमृत पान कर सकें। ऐसे भोले बाबा जाति, धर्म , वर्ण,लिंग के संकुचित खानों में कब सिमटे ? दुर्भाग्य से अपने निहित निजी स्वार्थों के लिए देवी देवताओं का गलत इस्तेमाल करने वालों को भगवान के पालनहार चरित्र को कलुषित करने में कभी संकोच नही हुआ।
आज से दो दशक पहले मर्यादा पुरषोतम राम के नाम पर जो अ-मर्यादा का प्रदर्शन किया गया उससे तो स्वंय राम भी शर्मिंदा हुए होंगे। प्रजा की भावनाओं का आदर करने के लिए जिस राम ने अपनी गर्भवती पत्नी को वनवास दिया, स्वंय विरह की अग्नि में जलते रहे, लेकिन लांछन लगाने वाले इंसान को सजा नही दी। उस करुणानिधान राम का मंदिर बनाने के नाम पर राम रथ विभिन्न राज्यों में घुमाया गया। अपने भाषणों में तथाकथित राम भक्तों ने जो जहर उगला उससे से इस देश का धर्म निरपेक्ष ताना बाना बूरी तरह चरमराया। आगे आगे राम रथ जाता पीछे पीछे सांप्रदायिक हिंसा में निहत्थे गरीब उजाड़े व मारे जाते। करोड़ों ,अरबों की संपत्ति के नष्ट किया जाता। इसकी परिणिति तत्पश्चात केन्द्र व राज्यों में हुए चुनावों में जीती सीटों की संख्या में इजाफा थी।अब तो सांप्रदायिकता का खुन मुह में लग गया था। बाबरी मस्जिद डहाने के लिए पूरे देश में फिर सांप्रदायिक उंमाद फैलाया गया। पूरे देश में एक बार फिर हिंसा का तांडव हुआ। यह सब बाबरी मस्जिद तोड़ कर वहां पर राम मंदिर बनाने के नाम पर किया गया। बाबरी मस्जिद तोड़ दी गई। राम की वह मूर्ति जो मंदिर के अंदर स्थापित थी अब खुले आकाश के नीचे आगई। मूर्ति की पूजा अर्चना सुलभ बनाने के लिए वहां पर अस्थाई ढ़ाचा बनाया गया। इस प्रकार इन तथाकथित राम भक्तों की सत्ता की भूख मिटाने के लिए राम को पक्का आसरा छोड़ कर अस्थाई ढ़ाचे में रहना पड़ रहा है। जिस दिन बाबरी मस्जिद ढ़हाई गई उस दिन को शौर्य दिवस मनाने की घोषणा भी तथाकथित राम भक्तों ने की।(अब भोले भक्तों ने विजय दिवस मनाने की घोषणा की है।) लेकिन जब लिब्राहन आयोग ने इन शूर वीरों को अपना पक्ष रखने बुलाया तो ये बगलें झाकने लगे। अपने अपने को बचाने के प्रयास में फिर अ-सत्य व अर्ध सत्य का सहारा लेने लगे। राम मंदिर के आंदोलन के शीर्ष में रहे एक शूर वीर तो बाबरी मस्जिद विध्वंस पर खेद प्रकट करने से भी स्वंय को नही रोक पाए। ऐसी रीत उन तथाकथित राम भक्तों की है जिन रघुपति(की) रीत सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाई। जो पिता के दिए वचन को निभाने के लिए राज पाट त्याग कर 14 साल वनवास पर रहे।
बाबरी मस्जिद ढ़हाने के बाद बम विस्पोटों का जो सिलसिला चला है वह थमने के बजाय दिन पर दिन बढ़ ही रहा है। (अब अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से भी उसको जोड़ा जारहा है।) दोनों समुदायों के कट्टरपंथियों के हाथ निरपराध लोगों के खून से रंगे होने के सबूत मीडीया में आते ही रहते हैं। सत्ताशीन दल को भी सत्ता हासिल करने के लिए वोटों की आवश्यकता होती है। अतः वह भी कट्टरपंथियों के जहर उगलने की क्षमता से लोहा लेना नही चाहते। आखिर सत्ता सुख अपने कर्तब्य निर्वाह से अधिक आकर्षक होता है।
तथाकथित राम भक्तों की वर्षों की मेहनत आखिर रंग लाई। इन राम भक्तों को जोड़ तोड़ कर सत्ता मिल भी गई। इस जोड़ तोड़ मे बेचारों को राम को ही भुलाना पड़ा। छः साल के अपने शासन में वे राम मंदिर बनाने का मसला किसी न किसी बहाने टालते रहे। हां विष वमन कर बाबरी मस्जिद ढ़हाने में अहम् भूमिका निभाने वाले संतों और साध्वियों को कौडि़यों के मोल सरकारी जमीन आश्रम बनाने के लिए मिल गई। अब राम अस्थाई ढ़ाचे में पुलिस पहरे में रह रहे हैं । तथाकथित राम भक्त आधुनिक सुविधाओं से लैस अपने आश्रमों में सुख से धर्म की विवेचना करने में व्यस्त हैं। इन आश्रमों के संचालन के लिए भी धन चाहिये । धर्म चर्चा से ही भक्तों से वह धन लिया जासकता है।सेक्षेप में तथाकथित राम भक्तों के सत्ता के मोह ने राम को तो सड़क पर ला ही दिया। इसके साथ साथ भारत के इतिहास को, हिंदुओं , हिंदु धर्म के इतिहास को जो कलुषित किया है उसका कभी कोई पश्चाताप करेगा। क्या कभी कोई धर्मभीरु इन तथाकथित राम भक्तों को समझाएगा कि धर्म की राजनीति करना धर्म का कुर्सी पाने के लिए दुरुपयोग करना नही है। धर्म की राजनीति क्या है इसका महात्मा गांधी जी ने विस्तृत विष्लेषण किया है।
छः वर्षों बाद सत्ता सुख भी जाता रहा। पांच साल के सत्ता से वनवास का दुख झेला है।अब फिर मौका है। चुनाव आने वाले हैं।सत्ता पाने के साथ साथ प्रधान मेत्री की कुर्सी भी दाव पर है। राम के नाम पर लोग अब घास नही डाल रहे हैं। सत्ता में बैठे सत्ता भक्तों ने बैठे बैठे भोले बाबा के यात्रियों की सुविधाओं का मसला सत्ता बाहर इंतजार कर रहे तथाकथित राम भक्तों को पकड़ा दिया। इसी का तो उन्हें इंतजार था। अब क्या करना है उन्हें मालूम है। उसका पुराना अनुभव है। इस प्रकार धर्म का दुरुपयोग करने वालों को कभी भी न तो धार्मिक सिद्धांतों से कोई मतलब रहा है।न ही धर्म के लोकहितकारी इतिहास के संरक्षण की जिम्मेदारी का इनको एहसास है।

राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों की तरह श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति व अंय आंदोलनकारी भूल ही गए कि मृगछाला पहने कैलाश वासी भोले शंकर को विधर्मियों से अधिक खतरा तो इस देश के करोड़ों भूखे नंगे लोगों के परिश्रम से अर्जित धन संपदा से अघाए आधुनिक सुख सुवुधाओं से लैस अपने भक्तों से होरहा है। पुराने जमाने में तीर्थ यात्रा का अर्थ अनगिनत शारीरिक कष्ट उठाकर, जान जोखिम में डालकर,बद्रीनाथ अमरनाथ जैसे दुर्गम स्थानों की यात्रा पैदल करनी होती थी। तीर्थयात्रियों को जीवित वापस घर लौटने का भरोसा भी नही होता था। इसलिए तीर्थ पर जाने से पहले सभी इष्ट मित्रों से मिलकर जाते थे।तीर्थयात्रियों की संख्या कम होती थी। शुचिता में उनकी रुचि अधिक होती थी। आज तो तीर्थयात्रा पर्यटन का हिस्सा हो गई है। तीर्थ यात्रियों की रुचि तीर्थ यात्रा, व उपवास में भी उपभोग में ही अधिक रहती है। अमरनाथ व बद्रीनाथ जैसे दुर्गम तीर्थ स्थानों पर भी हर प्रकार की सुख सुविधाएं उपलब्ध है। आज तीर्थ यात्रा के लिए शारीरिक कष्ट उठाने की इच्छाशक्ति या क्षमता की आवश्यकता नही है। आवश्यकता है तो केवल धन की। उसकी मध्यवर्ग के पास कोई कमी नही है। धन के बल पर हैलीकाप्टर से अमरनाथ जाया जासकता है। यदि इतना धन नही है तो भी घोड़े पर या स्थानीय मजदूर की पीठ पर चढ़ कर तो जाया जासकता है। तीर्थ यात्रियों की यह आरामपरस्ती भोले के निवास पर किस प्रकार का कहर ढ़ा रही है। काश इसकी चिंता भी भोले भक्त करते। पता नही भोले शंकर को भक्तों की यह आरामपरस्ती रास आती है या नही। सुना तो यही है कि वह कठोर तप करने वाले को मुह मांगा वरदान दे देते थे। तप करने वाला रावण या भष्मासुर ही क्यों न हो। भोले बाबा तो भोले बाबा हैं उनको इससे क्या लेना देना।
भोले शंकर तो भोले हैं।शायद भक्तों की इन नादानियों को नजरअंदाज कर दें। पर क्या 40 हेक्टेयर जमीन के लिए इतनी कुर्बानियां देने वाले भक्तों को नही सोचना चाहिये कि उनकी भक्ति से भोले का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है।शायद पिछले साल की ही बात है जब पवित्र अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के नकली होने पर विवाद हुआ था। जांच समिति भी बैठी थी। तभी अमरनाथ के वातावरण के गरमाने की बात भी सामने आई थी। हैलीकाप्टरों से आने वाले यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी तथा आम यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी गुफा का तापमान बढ़ जाने का कारण बताया गया। इसी की वजह से लिंग समय से पहले ही पिघल गया। इसी संदर्भ में बताया गया कि उसी साल वहां पर आशाराम बापू ने राम कथा की थी । उनके अनुयाई कथा स्थल तक हैलीकाप्टरों से ही गए। अनुयाइयों की इस प्रकार की लापरवाही से भोले शंकर का निवास स्थान अपना नैसर्गिक चरित्र खो रहा है इसकी चिंता किसी समिति ने नही व्यक्त की । न ही तीर्थयात्रा को स्थानीय परिस्थितों(पर्यावरण) के अनुरूप योजनाबद्ध कराने की किसी नीति का समाचार पढ़ने को नही मिला। हां लद्दाख के पर्यावरण पर चर्चा में एक टी.वी. चैनल ने अवश्य बताया कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।शायद 2015 तक पूरी तरह पिघल जाने की संभावना जताई। इनके पिघल जाने के बाद क्या भोले शंकर कैलाश में वास कर पाऐंगे। आज भोले भक्तों की मुख्य चिंता कैलाश का पर्यावरण बचाने की होनी चाहिये थी। गुणी भक्तों को सुझाना चाहिये था कि वैज्ञानिक अध्ययनों से हिमालय में बने तीर्थ स्थलों के पर्यावरण की क्षमता का अध्ययन कर वहां प्रति वर्ष जाने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या सुनिश्चित की जानी चाहिये। कैलाश मानसरोवर के यात्रियों की तरह इनकी सूची बननी चाहिये। यात्रा पर रवाना होने से पहले यात्रियों को हिमालय को कूड़ाघर बनने से बचाने के उपायों की उचित जानकारी और निर्देश भी दिये जाने चाहिये।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

आधुनिक सभ्यता का संकट

भाग दो
जिम्मेदारी सरकार की है। हम तो सिर्फ मलाई चाटते हैँ
बिहार की बाढ़ से हुई तबाही के हृदय-विदारक दृष्यों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बिहार के नेताओं को संवाददाताओं से बतियाते टी.वी. के चैनल दिखा रहे थे।नेताओं के कपड़े धवल सफेद थे उनके चमकते दमकते चेहरे सुख सुविधाओं से लैस सम्पंन जीवन की अभिव्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व को कही पर भी बाढ़ की विभीषिका ने उद्वेलित किया हो ऐसा नही लग रहा था। उनके चेहरों में बाढ़ पीड़ितों के दर्द कोई झलक नही दिख रही थी।बिना पलक झपकाए ये नेतागण बिहार सरकार को इस त्रासदी का दोषी बता रहे थे।
दोषी कोई भी हो आम जनता तबाह हुई है उसके दुख दर्द में उसकी तन मन धन से सेवा करने का संकल्प किसी नेता ने व्यक्त नही किया। एक ऐसी विपदा जिसमें 40लाख लोग अपना सब कुछ खो चुके हों अकेले सरकार पर राहत और पुनर्वास की जिम्मेदारी डाल देना बाढ़ पीड़ितों के साथ भद्दा मजाक नही तों नही तो क्या है। स्मरणीय है कि ये नेता भी गरीब तबकों से आते हैं। इसी गरीब व असहाय जनता ने इनको सत्ता की गलियों में पहुचाया है.। आज ये कानूनी और गैर-कानूनी तरीके से अरबों रुपये कमा रहे हैं।इस कमाई का कुछ हिस्सा यदि उन्ही गरीब गुरबा के राहत पुनर्वास में लग जाता तों उसका फायदा भी अगले चुनाव में इन्ही नेताओं को होता।
दूसरा बिहार सरकार को दोषी ठहराने के लिए हवाई सर्वेक्षण की क्या आवश्यकता थी। यह काम तो बिना हवाई सर्वेक्षण किये भी संवाददाताओं को बुला कर भी किया जासकता था। जो संसाधन हवाई सर्वेक्षण में खर्च हुए उनको राहत काम में लगाया जासकता था। इन नेताओं के हवाई सर्वेक्षणों से राहत काम में कितनी रुकावट आती है वह एन डी टी वी संवाददाता बता रहा था। मधेपुरा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के तीन घंटे की यात्रा के दौरान पहले तो अधिकतर क्षेत्रों में कोई राहत कर्मी दिखे ही नही। जहां इक्का दुक्का नावें थी भी तो काम नही कर रही थी। ईधन नही था। सरकारी कर्मचारी कह रहे थे जब तक प्रधान मंत्री का हवाई सर्वेक्षण चल रहा है तब तक कुछ भी नही किया जासकता है। यहां पर यह भी विचारणीय है कि विपदा के समय सीमित संसाधनों का दुरुपयोग नेताओं के दौरों पर होना चाहिये या पीड़ितों को राहत पहुचाने में। इस सवाल पर तय नीति होनी आवश्यक है। अन्यथा विरोधी दल सरकार पर असंवेदनशील होने का इलजाम लगाते हैं।
हवाई जहाज से उतरकर प्रधान मंत्री ने दस अरब रुपये व सवा लाख टन अनाज मुप्त देने की घोषणा कर दी। इस घोषणा को सुनते ही पी. साइनाथ की प्रसिद्ध पुस्तक ऍव् रि बडी लव्स अ गुड ड्राउट की याद ताजा होगई। इस घोषणा के बाद टी वी पर मुस्कराते हुए बिहार के मुख्य मंत्री अपनी रेडियो पर की गई अपील की पुनरावृति कर रहे थे।उनकी उन लोगों से अपील थी जो अभी तक प्रभावित नही हुए है परन्तु बारिष की निरन्तरता के कारण कोशी के टूटे तटबन्ध की चौड़ाई और बढ़ने का खतरा था। ऐसी हालत में संभावित क्षेत्रों के लोगों से मुख्य मंत्री बाढ़ आने से पहले ही राहत शिविरों में शरण लेने की अपील कर रहे थे। उनके चमकते दमकते चेहरे तथा हाव भाव से भी इस बिन बुलाए आई बिपदा से निपटने की चिंता का नामोनिशान भी नही था।लोगों के लिए इधर खाई उधर कुआं है। घर छोड़कर राहत शिविरों में जाते हैं तो पीछे से चोर लुटेरे घर लूट रहे हैं । सरकार माल की सुरक्षा के किसी प्रबंध का दावा भी नही कर रही है।जब सुरक्षा बल जम्मू काश्मीर,ओड़िसा में राष्ट्रवादी, प्रांतवादी, हिंदूवादियों द्वारा की जारही हिंसा और आगजनी से निपटने में लगे हों तो आम आदमी की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा।
उधर ओडिशा के कंधमाल जिले में 23 अगस्त को विश्व हिन्दु परिषद के लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्या कर दी गई। प्रदेश के सत्तारूढ़ गठबंधन में सहयोगी होने के बाबजूद स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाले भारत में हिंदू हितों के सबसे बड़े स्वयंभू ठेकेदार हिंसा पर उतर आये।सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति जलाई गई। एक महिला को जिंदा जला दिया गया। ये तथाकथित हिंदू हितों के सबसे बड़े स्वयंभू ठेकेदार भूल गए कि हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखा है जहां नारी की पूजा होती है वहां ईश्वर की वास करते हैं।क्या ये हिंदू धर्म के स्वयंभू ठेकेदार बताएँगे कि जो नारी को जिंदा जला देते है वे कौन हैं और जिस जमीं पर यह जघन्य अपराध हुआ है वहां किसका निवास होसकता है। 29 अगस्त के जनसत्ता में छपी फोटो में एक उदास बच्चा अपने जले घर के प्रागण खड़ा है पास ही घर की औरतें जले घर से बचा खुचा अनाज बटोर रही हैं।क्या वह उदास मासूम ,वह जलकर राख हुआ घर भारतीय का नही हैं।इस देश में करोड़ों लोगों को पास पेट भरने अनाज नही है और ये दंगाई लोगों का बहुत जतन से सहेजा अनाज जला कर राख कर आये। यह कौन सा हिंदू धर्म है यह कौन सी भारतीयता है। हिंदुत्व के नाम पर यह कैसी दानवता है। ओडिसा में विनाश करने उठे हाथ बिहार में बाढ़ पीड़ितों को बचाने के लिए नही उठे है। कारण बाढ़ पीड़ितों के राहत में सहयोग देने से हिंदू वोटों ध्रुवीकरण नही होता। ध्रुवीकरण नही होने से सत्ता मे आने का रास्ता साफ नही होता। सारा खेल वोटों का है। हिंदूवादी राष्ट्रवादी तो महज मुखौटा है जो आम जनता को बरगलाने के लिए पहना जाता है।
इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां का जनमानस सब समझते हुए भी सांप्रदायिक संगठनों के बहकावे आजाता है और इनकी काठ की हाडी बार बार चूल्हे पर चढ़ जाती है।मध्य वर्ग भी यह जानते हुए भी कि यह सब सत्ता में आने की रणनीति है इनका समर्थन करता दिखता है।इनके द्वारा की गई हिंसा में जो जान माल का नुकसान होता है उसके लिए भारतीय जन मानस नही कल्पता। सरकारी संपत्ति का नुकसान हमें अपना नुकसान नही लगता। इसलिए बसो की तोड़ फोड़ आगजनी हमें उद्वेलित नही करती है। ऐसा भान होता है कि अभी भी हम औपनिवेशिक मानसिकता से नही उबर पाए है।
जारी है

बुधवार, 27 अगस्त 2008

भारत में आधुनिक सभ्यता का संकट

भाग एक
आवश्यकता है इन आताताइयों से सावधान रहने की।
24 अगस्त के जनसत्ता में प्रभाष जोशी जी ने पूर्व प्रधान मंत्री चंद्रशेखर की पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ के साथ सार्क सम्मेलन में हुई व्यक्तिगत वार्ता का उल्लेख करते हुए काश्मीर की पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा सईद को समझाने की कोशिश की कि संस्थाओं की मर्यादा का सम्मान करना किसी भी समाज को चलाने के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि राजनीतिक हित लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा का हनन् करके सधते हों तो इस देश में कौन सा राजनीतिक दल है जो इस देश व इसकी जनता के हित को अपने राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर रखने का दावा कर सकता है। ढ़ूढ़ कर भी शायद ही मिले। जम्मू काश्मीर के मसले पर ही यह तो सभी मान ही रहे हैं कि जम्मू के साथ भेदभाव होता रहा है। पर भारतीय जनता पार्टी यह बताने का कष्ट नही करती कि अपने शासन के दौरान उसने क्यों जम्मू के साथ न्याय करने की कोशिश नही की? क्यों वह कांग्रेस के नक्से कदम पर चलती रही? यह भी समझ में नही आता कि कैसे अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दे देने से जम्मू के साथ हुए अन्याय की भरपाई हो पाएगी? पिछले 45-50 दिन से जम्मू में जो हिंसा आगजनी होरही है उससे जो नुकसान इस क्षेत्र को हुआ है क्या वह पिछले 60 साल में किये गए भेदभाव से हुए नुकसान से कम है। जम्मू के संगठनों द्वारा किये जारहे हिंसक आंदोलन से किसका नुकसान होरहा है? जो व्यापारिक और ओद्योगिक संस्थान बंद हैं उससे जो नुकसान होरहा है वह किसका नुकसान है?जिन बच्चों की पढ़ाई शिक्षण संस्थानों को बंद करने से चौपट होरही है उनके भविष्य को कौन सवारेगा? स्थिति सामान्य होने पर प्रशासन उनको परीक्षा में रियायत दे भी दे तो भी इतने लम्बे समय तक पढ़ाई छूटने से कमजोर हुई नींव के कारण जम्मू काश्मीर के बच्चों व युवाओं के आगे रोजगार पाने के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धाओं में असफल होने पर उनके भविष्य को सवारने की जिम्मेदारी कौन लेगा? युवाओं की वह जमात जो इस साल प्रतिस्पर्धा परीक्षाओ में बैठने की तैयारी कर रही होगी उनको इस आंदोलन से जो नुकसान होरहा है उसकी भरपाई कौन करेगा? इस लम्बे बंद को दौरान जिन लागों ने अपनी रोजी रोटी खोई है उसकी भरपाई कौन करेगा?जिन असंख्य दिहाड़ी मजदूरों,बीमारों, बूढ़ों, अपाहिजों आदि को इससे आंदोलन से परेशानी होरही होगी उसकी पूर्ति कौन करेगा? जम्मू के वे सारे संगठन तथा काश्मीर के वे सारे संगठन जो इस पूरे क्षेत्र को तहस नहस करने में आमदा हैं उनको उनके द्वारा किये जारहे इस नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराने का काम कौन करेगा?
उल्लेखनीय है कि यह तोड़ फोड़ खून खराबा जम्मू काश्मीर में ही नही होरहा है।यह पूरे देश में होरहा है।उड़ीसा में विश्व हिन्दूपरिषद के नेता की हत्य़ा के विरोध में निहत्थे स्थानीय लोगों को मारा जलाया जारहा है । सम्पत्ति को नुकसान पहुचाया जारहा है। यह नुकसान स्वयं को देशभक्त बताने बाले संगठन कर रहे है।महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के ठेकेदार ही हिंसा और तबाही मचाए हुए हैं।गूर्जर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा से सार्वजनिक एवं निजी सम्पत्ति का जो नुकसान हुआ वह गूजरों का भी नुकसान नही था? सुप्रीम कोर्ट ने यह मसला उठाया भी था। पर फिर दब गया।यही नही गुजरात में जो मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा कराई गई उससे क्षति किसको पहुची—गुजरातियों को, भारतियों को , मानवता को या सिर्फ मुसलमानों को? इसी प्रकार 1984 में सरदारों के विरुद्ध की गई हिंसा में भी अपने ही मरे, अपने ही उजड़े और अपनों ने ही मारे व उजाड़े। बार बार निहत्थे बेकसूर लोग बेमौत क्यों मर रहे हैं? क्योंकि इन हिंसाओं को भड़काने वालों को चुनाव जीतना था। इतिहास में पढ़ा था कि विदेशी आताताई देशी राजाओं को हरा कर धन सम्पत्ति की लूटपाट कर बचे खुचे को आग लगा कर चले जाते थे।अब तो अपने ही अपनों के हितों की रक्षा के नाम पर अपनी ही सरजमीं को आग के हवाले कर रहे हैं। अतः तर्क या हाजिर जबाबी से इन तत्वों के मुंह तो कुछ क्षणों के लिए शायद बंद किया जासकता है परन्तु इन स्वार्थी तत्वों के काले कारनामों पर लगाम नही लगाई जासकती।आज आवश्यकता है ऐसे नेताओं दलों व संगठनों पर लगाम लगाने की जो किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं। इसके लिए नागरिक समाज को आगे आना होगा तथा चुनाव कानून व चुनाव प्रक्रिया में ऐसे सुधारों के लिए दबाव बनाना होगा जिससे ये स्वार्थी तत्व जन भावना भड़का कर सत्ता हासिल नही कर सकें।