वोट देना जनतंत्र में हर नागरिक का अधिकार है और कर्तव्य भी। पर पप्पू यानी खाता पीता उच्च वर्ग न अपने मताधिकार का प्रयोग करना आवश्यक समझता और न ही अपने कर्तव्य का पालन करना जरूरी समझता है।यह रोग इतना फैल गया है कि चुनाव आयोग को पप्पू को वोट देने के लिए प्रेरित करने के लिये छोटी छोटी फिल्म बनाकर विज्ञापन भी देने पड़े हैं। 15वीं लोक सभा के चुनाव के समय तो टी वी चैनलों तथा व्यापारिक घरानों ने भी मिलकर पप्पू के वोट देने के फर्ज को निभाने की आवश्यकता को प्रसारित करने की मुहिम चलाई। पर हुए ढाक के वही तीन पात। 26/11/ 2008 के मुंबई के आतंकी हमले के बाद गुस्से से लाल पीला हुए उच्च वर्गीय मुंबईकर जिस तरह से सड़क पर उतर कर आया उससे कुछ लोगों को आशा थी कि इस 15वीं लोक सभा के चुनाव में वह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेगा। पर नहीं लिया। सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाले अभिनेता राहुल बोस जैसे लोग हताश हुए। हों पप्पुओं की बला से। इससे पप्पू को क्या मतलब।
आखिर पप्पू वोट क्यों दे?चुनाव केवल वोट की ताकत ही नहीं दर्शाता वह धनतंत्र की ताकत भी दर्शाता है। एक जमाना था लोक से जुड़े नेता वोट के साथ साथ नोट भी अपने चुनाव क्षेत्र से चुनाव का खर्चा चलाने के लिए मांगते थे और लोग सहर्ष देते थे। चुनाव जीतने के बाद भी इन नेताओं की आर्थिक हालत में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आता था। इस चुनाव के दौरान भी एक टी वी चैनल ने एक पुरानी जन प्रतिनिधि को परिवार के भरण पोषण के लिए अपने पति के साथ पत्थर ढ़ोते दिखाया था। अब जमाना बदल गया है। अब जनतंत्र का ऊर्जा स्त्रोत धनतंत्र होगया है। यदि पारिवारिक विरासत में राजनीतिक हैसियत प्राप्त न हो तो धनतंत्र उसे प्राप्त करने का सबसे सरल रास्ता है। बहुजन समाज पार्टी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। आज तो पैसे से चुनाव लड़ने के लिए टिकट खरीदा जाता है। (बहुजन समाज पार्टी मे यह खुले आम होता है।पिछले 2008 के विधान सभा चुनाव में दो मुख्य राष्ट्रीय दलों पर भी टिकट बेचने के आरोप लगे थे।)टिकट मिलने के बाद तो चुनाव जीतने के लिए हर कदम पर पैसा लगाना होता है। सभाओं व रोड शो करने के लिए भाड़े में लोगों को जुटाना पड़ता है।यह धन कहां से आता है और क्यों आता है।आज आम मतदाता भी यह खूब समझता है।
13वीं लोक सभा के समय तहलका से स्ट्रिंग आपरेशन तथा 14वीं लोक सभा के दौरान हुए विभिन्न स्ट्रिंग आपरेशनों से स्पष्ट हो गया कि तथाकथित जन प्रतिनिधि जनसेवा के मकसद से नहीं धनसेवा के मकसद से चुनकर आते हैं। इसीलिए हम देखते हैं जब भी सांसदों या विधायकों की या निगम स्तर के जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्ते को बढ़ाने के मसले पर सत्तापक्ष कोई प्रस्ताव लाता है उस पर राजनीतिक दलों में कभी कोई मतभेद नहीं होता। सर्वसंमति से ये प्रस्ताव पास होजाते हैं।
धनतंत्र के बल पर चुनाव जीते सभी प्रतिनिधि गैर कानूनी तरीके से ही अपने धनतंत्र को मजबूत करने में विश्वास नहीं करते।उदारीकरण के दौर में जो भी राजनीतिक दल सत्ता में आता है वह देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हित साधने के लिए ही नियम, कानून बनाता है नीति निर्धारित करता है। पिछले 18 सालों के अनुभव से साफ होगया है कि देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हित साधने में राजनीतिक दलों की विचारधारा आड़े नहीं आती।विकास का मतलब भी रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा व स्वास्थ से हटकर बिजली, सड़क व पानी होगया है। यह स्थिति उस जनतंत्र में है जहां एक सरकारी समिति ने अपनी रपट में उजागर किया था कि 80 प्रतिशत जनता की रोजना आमदनी महज 20 रुपया है। एक बात साफ है आम जन को जीवन की मूल सुविधाएं(रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा व स्वास्थ) मुहैय्या कराने से जनता की सेवा करने का दावा करने वाले प्रत्यासी व उनके राजनीतिक दलों को वह लाभ नहीं होता जो देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों को बिजली, सड़क व पानी की सुविधा उपलब्ध कराने में होता है। राजनीतिक दल किस प्रकार विकास के नाम पर देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हाथों इस देश की संपदा ओने पौने दामें में बेच रहे हैं इसका नंगा स्वरूप झारखंड, छत्तीसगड़ तथा उड़ीसा जैसे प्राकृतिक संपदा के धनी राज्यों में देखा जासकता है। अक्सर इस प्रक्रिया में संविधान, नियम व कानूनों को भी ताक पर रख दिया जाता है।आम आदिवासी या वनवासी जिसका अस्तित्व इन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है इसका विरोध कर रहा है और सरकारी तंत्र की ज्यादतियों का शिकार होरहा है। दुर्भाग्य से अक्सर उसे न्यायपालिका से भी राहत नहीं मिल रही है।
विकास के नाम पर पिछले 60 सालों में अपने जल जंगल जमीन के बेदखल होकर जब गरीब रोजी रोटी की खोज में शहर आता है तो यहां उसके लिए झुग्गी बनाने के लिए जगह नहीं है। वह सड़क किनारे रेड़ी लगाकर सब्जी आदि नहीं बेच सकता। अब बड़े बड़े मौल खोले जारहे हैं वहां ये व्यापारिक घराने खुदरा माल बेच रहे हैं। इन मौलों के लिए भी भूमि, बिजली, सड़क पानी चाहिये। पप्पू के हित इन देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हितों से जुड़े हैं।निजीकरण व आउटसोर्सिंग की वजह से महज फर्राटो की अंग्रेजी बोलने वाले पप्पुओं को भी आसानी से नौकरी मिल रही है।मौल उनकी मौज मस्ती की पूरा प्रबंध करते हैं। आखिर मौज मस्ती के लिए एक ही जिंदगी तो है।उस एक ही जिंदगी में चुनाव के दिन मिली एक दिन की छुट्टी वोट देने में कैसे बरबाद की जा सकती है। इतना बड़ा दिल तो पप्पू के पास नहीं हो सकता। दूसरा वोट कोई भी दे। सरकार किसी भी दल की बने पप्पू की हित संरक्षित होता है। कारण पप्पू को नौकरी देने वाली कंपनी के हितों की सुरक्षा करने में ही हमारे जनप्रतिनिधि तन मन धन से लगे होते हैं।
जहां तक आम आदमी का सवाल है उसके लिए मताधिकार अस्तित्व का अधिकार है। उसको मालूम है लोकतंत्र पर धनतंत्र का ग्रहण लगा है और समय के साथ साथ इस ग्रहण का आकार-प्रकार भी बड़ा हो जारहा है । फिर भी वह बहुत सोच समझ कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहा है। मसलन् राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) की सरकार ने जिस तरह एक ओर गोदामों में अनाज सड़ाया या ओने पौने दामों में निर्यात किया पर भूख से मरते लोगों तक नहीं पहुचाया उसी का परिणाम उसे 14वीं लोकसभा के चुनाव में भुगतना पड़ा।इंड़िया शाइनिंग या फील गुड का राजग का नारा धरा का धरा रह गया।नई सरकार को कुछ नीतियां तो आमजन के लिए बनानी पड़ी।यह सच है क्रियांवयन में बहुत गड़बड़िया हैं।उसका खमिजाना यह सरकार भुगतेगी। पूर्ण बहुमत की उमीद तो किसी भी दल को नहीं है। यदि आमजन के हितों की रक्षा के लिए बनी नीतियां ईमांदारी से लागू की गई होती तो क्या यह हताशा होती।धनतंत्र के ग्रहण के बावजूद लोकतंत्र की यही जीत है।
लेकिन पप्पू का वोट देना हम क्यों जरूरी मानते हैं। अति आवश्यक तो है किसी बालिग नागरिक को मताधिकार से वंचित नहीं किया जाय।मुझे नहीं लगता कि कभी इस पर बहस हुई हो कि कैसे उन लाखों (यदि करोड़ों नहीं भी तो) बेघर लोगों को भी यह अधिकार मिले। उदारीकरण के दौर में हमारे शहरों को पेरिस या शांगहाई बनाने की होड़ में कई झुग्गी बस्तियां उजाड़ी गईँ। आवासीय बस्ती टूट जाने से इनके मतदाता पहचान पत्र भी वैलिड नहीं रहे। कई बस्तीवासियों को वैकल्पिक आवासीय जगह नहीं मिलने से इनके नए आवासीय पतों के आधार पर नए मतदाता पहचान पत्र भी नहीं बने हैं।चूंकि ये लोग अनपढ़ हैं, गरीब हैं हम इनके मताधिकार के बारे में चिंतित नहीं हैं। हमें लगता है इनके वोट नहीं देने से लोकतंत्र को कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पप्पू का वोट देना हमें आश्वस्त करता है कि वह सोच समझ कर लायक प्रत्यासी को ही चुनेगा।शायद यह हमारा आमजन के प्रति दुराग्रह ही है। यदि हम भ्रष्टाचार के आकड़ों और प्रकृति पर नजर डालें तो पाऐंगे कि भ्रष्टाचार करने वाले व भ्रष्टाचार को बढ़वा देने वाले अधिकतर लोग मध्यवर्गीय ही हैं। मध्यवर्ग ही गैर कानूनी तरीके से अपने हितों के संवर्धन के लिए घूस देता है या जान पहचान निकालता है। य़दि मध्यवर्ग पिछले दरवाजे से काम कराने बंद कर दे तो भ्रष्टाचार अपने आप कम हो जाएगा। गरीब मजबूरी में ही घूस देता है। चूंकि उसके पास कोई सरकारी ओहदा नहीं होता इसलिए वह घूस नहीं लेता है। घूस सरकारी मुलाजिम लेता है। अभी तो आम धारणा है कि छोटे से छोटा मुलाजिम भी जो घूस लेता है उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है। गरीब तो बाहुबली भी हो नहीं सकता। दूसरा बिना सफेद पोस के संरक्षण के बाहुबली का बजार नहीं फलता फूलता।
यदि लोकतंत्र में धनतंत्र के प्रभाव को कम करना है तो आज जरूरत है आमजन को बिना हील हुज्जत के मतदाता पहचान पत्र मिले। और इस मतदाता में अपने मताधिकार का बिना किसी लाग लपेट के प्रयोग करने का माद्दा जागे।जिस दिन यह मतदाता शराब की बोतलों, साडियों या बिरयानी की दावतों के एवज में मतदान न दे।बल्कि उपलब्ध प्रत्यासियों की सूची में सबसे लायक, तथा सबसे कम भ्रष्ट प्रत्यासी को चुनेंगे उस दिन धनतंत्र पर लोकतंत्र के विजयी होने की शुरुआत होगी।
गुरुवार, 7 मई 2009
रविवार, 9 नवंबर 2008
भारत कभी जगत गुरु होता था और आज!!!
अभी हाल तक भारतीय जनता दल के नेता ताल ठोक कर कहते थे कि पकड़े गए आतंकी मुसलमान ही होते हैं। अब जब उनकी करीबी साध्वी के भेष में सांप्रदायिक जहर उगलने के साथ साथ मालेगांव और मोडासा में हुए बम धमाकों संलिप्त होने के आरोप में पकड़ी गई है तो संघ परिवार के कई नेता इसको इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध जन आक्रोष बताने की कोशिश कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि हिंदू आतंकवादी नही होता। उड़ीसा के कंधमाल में इसाइयों के विरुद्ध की गई योजनाबद्ध हिंसा को भी आम जन द्वारा की गई स्वतः स्पूर्त हिंसा की संज्ञा दी जाती है। सवाल उठता है कि स्वतः स्पूर्त हिंसा भी तभी भड़कती है जब उसके लिए जमीन तैयार की गई होती है। एक समुदाय के लोगों के मन में दूसरे समुदाय के लोगों के प्रति घृणा, अविश्वास के बीज सतत् प्रयास से बोए जाते हैं। मौका मिलते ही ये बीज हिंसक घटनाओं के रूप में अंकुरित होते हैं। इससे पहले भी जब जब संघ परिवार ने दंगे भड़काए तो उन दंगो को जन आक्रोष की ही संज्ञा दी। 2002 के गुजरात के मुसलमानों के कत्लेआम को क्रिया प्रतिक्रिया कहा गया। जब जब जन आक्रोष की दलील दी गई तब तब दिमाग में एक सवाल कौंधा कि प्रतिद्वंदी को समूल नष्ट कर देना या उसकी कमर तोड़ देना तो भारतीय परंपरा नही रही। जब हमारी परंपरा ही नहीं रही तो फिर इस प्रकार का हिंसक व्यवहार अचानक 19वी 20बी सदी क्यों प्रारंभ हुआ वह भी धर्म के नाम पर।
हिंदू समाज में जाति-आधारित दमन शोषण रहा है पर प्रतिद्वंदी संप्रदायों का कत्लेआम नही
मसलन् जिस मर्यादा पुरुष राम का मंदिर बनाने के लिए अयोध्या और पूरे भारत में संघ परिवार हिंसा का तांडव नृत्य करवाता रहा है उस राम ने आताताई शासकों को हराया लेकिन कहीं भी प्रजा का कत्लेआम नही कराया।इसके विपरीत जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर जो हिंसा आज भड़काई जारही है उसमें निहत्थी गरीब प्रजा ही मारी जारही है। पांडवों को भी महाभारत का युद्ध मजबूरी में लड़ना पड़ा। युद्ध टालने के लिए उन्होंने कौरवों की हर जां बेजां शर्त मानी। लेकिन इसके बाद भी जब उनको पांच गांव देने के लिए भी कौरव राजी नही हुए तो महाभारत हुआ। इस महाभारत के युद्ध में भी सैनिक हताहत हुए। प्रजा का कत्लेआम तो नही हुआ। हां धर्म की रक्षा के नाम पर जातिवादी ब्राह्मणी व्यवस्था का ही संरक्षण किया।जिन शूद्रों व एकलव्यों ने इस ब्राह्मणी व्यवस्था को चुनौती देने की गुस्ताखी की उनको अपनी जान या अंगूठा खोना पड़ा। इस प्रकार भारतीय हिंदू जनमानस की आस्था के जो मुख्य प्रतीक माने जाते हैं जिनको आज भावनाएँ भड़काने तथा अपने ही देश के के लोगों को उजाड़ने के लिए इस्तेमाल किया जारहा है वे भावनाओं में बह कर अनाचार और अत्याचार करने वाले नहीं थे।उन्होंने तो आताताई शासकों का ही विनाश किया। और यह विनाश एक प्रकार से बेकसूर प्रजा को इन राजाओं के अत्याचारों से बचाया। नारी का अपमान खासकर उसकी अस्मिता लूटने जैसा जघन्य अपराध तो किसी भी हाल में क्षम्य नही था। आज किस हिंदू धर्म को बचाने के नाम पर ये सभी दुष्कर्म किये जारहे हैं?यह प्रश्न उन सबको पूछना चाहिये जो इनके बहकावे में आकर आम जनजीवन असुरक्षित कर रहे हैं। नारी अस्मिता लूट रहे हैं।
भारत के प्राचीन इतिहास पर एक सरसरी नजर डालने पर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि हम साम्राज्यवादी कभी भी नही रहे हैं। विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल में राजा, जनजातीय-सभा, और समिति की सहमति से ही निर्णय लिए जाते थे। बौद्ध काल (600 B.C.-A.D. 200 ) में गणराज्यों का अधिक चलन था। कई गणराज्यों में सत्ता बहुत सारे व्यक्तियों के हाथ में होती थी।गणराज्य के मुखिया का चुनाव होता था।सभी महत्वपूर्ण मसले सभा में पेश किये जाते थे।स्थानीय प्रशासन स्थानीय सभाएँ चलाती थी तथा राज्य के प्रशासन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। कुछ गणराज्यों में गावों को विभिन्न आर्थिक पेशों के आधार पर संगठित किया जाता था। हालाकि निरंकुश राजतंत्र इस काल में नही था। परन्तु सत्ता की प्रकृति और चरित्र भी पूर्णरूप से लोकतांत्रिक नहीं था।सभा और समितियों में कुलीन वर्गों के प्रबुद्ध लोगों का दबदबा था।इसी वर्ग के बुजुर्गों का सभा में भी बोलबाला था।(Om Prakash,Negating the Colonial Construct of Oriental Despotism: The Science of Statecraft in Ancient India) संक्षेप में शासन एक व्यक्ति तथा उसके सहायकों की सहायता से नही वरन् ऊँची जातियों के प्रबुद्ध लोगों की सहमति से चलता था।शासन, प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था में इन जातियों का दबदबा तब भी था और आज भी बरकरार है।
ईसा पूर्व 300 में कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र में मजबूत राजतंत्र की वकालत की तथा चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में प्रथम हिंदू साम्राज्य स्थापित किया। इस ग्रंथ में कौटिल्य ने लिखा है कि राजा को वर्ण तथा आश्रम आधारित सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहिये। इस ब्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन की आज्ञा नही थी। ब्राह्मणों का समाज में विशेष स्थान था। इसकी वजह से उनका राजनीति में भी गहरा प्रभाव था। राजा के मंत्री इसी जाति के लोग होते थे। राज पुरोहित का राजा पर खासा प्रभाव होता था। हालाकि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था जाति आधारित असमान व्यवस्था थी। कौटिल्य का राजा प्रजा पालक था। कौटिल्य ने सेना में सभी वर्णों के लोगों की भर्ती का प्रावधान किया था। योगक्षेम जिसकों बनाए रखना राजा का मुख्य उद्देश्य था, उराके तहत जनता का हित ही नही वरन् जनता की सम्पंनता तथा जनता की खुशहाली भी आती थी।राजा की खुशी प्रजा की खुशी में निहित थी। प्रजा के हित में ही राजा का हित भी होता था। राजा का सर्वप्रथम कर्तब्य असामाजिक तत्वों से, धोखेबाज ब्यापारियों, और कारीगरों से, चोरों डाकुओं व हत्यारों से प्रजा की रक्षण व पालन माना गया।संरक्षण का अर्थ जान माल की रक्षा था। यह मान्यता थी कि जो राजा अपनी प्रजा के प्रति अपने कर्तब्यों का ईमानदारी से पालन करता है वह स्वर्ग का अधिकारी होता है।
चंद्र्गुप्त को भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाला पहला सम्राट माना जाता है। चंद्रगुप्त के बाद पुत्र बिंदुसार फिर पोता अशोक गद्दी पर बैठा। इस महान साम्राज्य की जनसंख्या पचास मिलियन थी और क्षेत्र में यह मुगल साम्राज्य तथा भारत में अंग्रेजी साम्राज्य से भी बड़ा था। चंद्र गुप्त की राजधानी पाटलीपुत्र उस समय का विश्व में सबसे बड़ा शहर था।यह आठ मील लंबा व डेढ़ मील चौड़ा था।इसमें 570 स्तंभ थे और चौसठ दरवाजे थे। इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित करने पर भी चमद्रगुप्त को नहीं उसके पोते अशोक को विश्व इतिहास में सर्वोत्तम शासक माना जाता है। क्यों ?क्योंकि सम्राट अशोक ने ही विश्व को समानता तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाया। इसीलिए प्राचीन काल से ही भारत को विश्व में जगत गुरु माना जाता रहा है।
अशोक नैतिकता का वह पाठ जिसने भारत को जगत गुरु बनाया।
भारत को जगत गुरु बनाने का श्रेय सम्राट अशोक को जाता है। चंद्रगुप्त, बिंदुसार या इनके गुरु कौटिल्य को नहीं।अशोक ने क्या किया कि भारत जगत गुरु होगया। अशोक ने भारत का जबरदस्त नैतिक रूपांतरण किया।इसीलिए के. ए. नीलकांत शास्त्री ने लिखा है अशोक का राज्य भारतीय इतिहास के सर्वाधिक चमकदार पन्ने हैं। ये चमकदार पन्ने कलिंग की विजय नही हैं।वरन् इस विजय में हुई हिंसा से आहत होकर अशोक का भविष्य में केवल धम्म के माध्यम से ही विश्व विजयी होने का द्रढ़ निश्चय था। धम्म अशोक के लिए रामबांण होगया। अपने पहले शिलालेख में अशोक ने लिखवाया कि उनका सिद्दांत धम्म के माध्यम से रक्षा करना, धम्म के अनुसार ही शासन चलाना, धम्म से ही प्रजा को संतुष्ट रखना तथा धम्म से ही साम्राज्य की रक्षा करना।
नैतिकता से विश्वविजयी होने के लिए अशोक ने क्या किया? अपने निजी जीवन में आत्म-संयम, आत्म-नियंत्रण, मन की निर्मलता, पूर्ण समर्पण का भाव लाना, कृतज्ञता लाना सर्वाधिक आवश्यक बताया था।मन की निर्मलता प्राप्त किये बगैर धम्म का पालन संभव नही था। पड़ोसियों, रिस्तेदारों के लिए व्यवहार में ईमानदारी, उदारता बरतना,अपने से भिन्न लोगों(समाजों, संस्कृतियों) के प्रति सहिष्णुता, व आदर का भाव अपनाना,संपूर्ण प्राणी जगत के लिए स्नेह, सदभाव, आत्मीयता होना,बुजुर्गों के लिए श्रद्धा भाव व्यक्त करना, अपनी प्रजा की सुख सुविधा के लिए संचार माध्यमो तथा यातायात के साधनों की व्यवस्था करना, कुएँ खुदवाना, पेड़ लगवाना,सभी इंसानों और जानवरों के लिए इलाज की सुविधा करना आदि, आदि थे। गरीबों के हितों की बादशाह को खास चिंता थी। इसीलिए अशोक स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों का अक्सर दौरा किया करते थे।(Roger Boesche
Kautilya's "Arthaωstra" on War and Diplomacy in Ancient India
The Journal of Military History, Vol. 67, No. 1 (Jan., 2003), pp. 9-37).
इसके विपरीत आज स्वंय को भारतीय मूल्यों के अनुसार आचरण करने वाले ,राष्ट्रवादी, हिन्दूवादी बताने वाले राजनीतिक दल अपने ही शासित राज्यों में प्रजा का कत्लेआम करवा रहे हैं। औरतों का असमत लूटी जारही है। घर और संपत्ति लूटी और जलाई जारही है। लोगों को जंगलों या राहत शिविरों में शरण लेने मजबूर किया जारहा है। धर्म के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को ध्वस्त किया जाता है। हड़ताल और बंद का आह्वान कर शिक्षण संस्थानों,औद्योगिक इकाइयों, व व्यापारिक प्रतिष्ठानों को महिनों तक बंद रहने को मजबूर किया जाता है। अभी जिस प्रकार के समाचार पढ़ने और देखने में आरहे है उससे इन दलों द्वारा शासित राज्यों में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त संगठनों को संरक्षण तथा पोषण की संभावनाएँ भी लग रही हैं। सेना में भी आतंकियों की घुसपैठ होने के सबूत या संभावनाओं की जांच चल ही है। एक सेवा निवृत एवं एक कार्यरत पदाधिकारी को पुलिस (आतंकवाद निरोधक दस्ते) ने गिरफ्दार किया है। यहां यह बताना प्रासंगिक है कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक का भूतपूर्व सैनिकों का एक प्रकोष्ठ है। कल रात (07, 11 ) ,के एनडीटीवी हिन्दी सेवा का पट्टी में लिखा आरहा था कि एन डी ए शासन काल में बड़ी संख्या भूतपुर्व सैनिकों ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी। आतंकी घटनाओं में सेना के अफसरों भी हाथ होने की आशंकाओं के संदर्भ में उपरोक्त सूचनाएं महत्वपूर्ण और धर्म के नाम पर फैलाई जारही इस प्रकार की अराजकता से कितने लोगों की रोजी रोटी जाती है कितनों का भविष्य बरबाद होता है। इससे हिंदुत्व के इन ठेकेदारों को मतलब नहीं। इनको स्वर्ग तो जाना नही है। इनको तो किसी भी कीमत पर सत्ता सुख चाहिये। सत्ता में आने के बाद ये भी कांग्रेस की तरह अमेरिका के पिछलग्गू बनने में ही फील गुड करते हैं। चूंकि ये फील गुड करते हैं इसलिए फलते फूलते अमेरिका में ही इनको इंडिया शाइनिंग नजर आती है।अनाज से भरे भंडारों के बावजूद भूख से होरही भारतीयों की मौतें इनको विचलित नही करती। जगत गुरु भारत की और भारतवासियों की ऐसी दुर्दशा करने वाले स्वयं भारतीय ही क्यों हैं यह समझना आवश्यक है।
1990 के अंतिम चरण में, देश में लालकृष्ण आडवाणी के ‘रामरथ’ यात्रा के कारण बड़े पैमाने में दंगे हुए।इन दंगों में हुई हिंसा से व्यथित होकर बंगला भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार, व गांधी-विचारनिष्ठ लेखक शैलेशकुमार वंद्योपाध्याय ने दंगों के इतिहास पर पुस्तक लिखनी आरंभ की। पुस्तक लेखन के अंतिम दौर में बाबरी मस्जिद के तोड़ दिया गया था तथा पूरे देश को एक बार फिर दंगों की भयानक आग में झोंक दिया गया। इस पुस्तक के एक अध्याय दंगों की अनुवंशिकता में लेखक ने अंग्रेजों की बांटो राज करो नीति का पर्दाफास किया है। लेखक के ही शब्दों में
“1857 की घटना की पुनरावृत्ति न हो इसका उपाय सुझाने के लिए सन् 1859 में ब्रिटिश सरकार ने एक राँयल कमीशन की नियुक्ति की। ....उस राँयल कमीशन के सामने लाँर्ड एलिफिनस्टोन...ने कहा कि हिन्दू-मूसलमान की संयुक्त सैन्यशक्ति के कारण सैनिक विद्रोह आसान हुआ है। इसीलिए कमीशन ने भारतवासियों के बीच भेदभाव का बीज बोने के लिए सुनियोजित कार्यसूची की सिफारिश की।.... सन् 1862 में भारत सचिव उड ने बड़े लाट लाँड एलगिन को लिखा, भारत में हमने अपनी सत्ता एक दल को दूसरे दल से टकराकर कायम रखी है।और इस काम को हमें अभी जारी रखना होगा। अतः देशवासियों के अन्दर सामूहिक चेतना जागृत होने के मार्ग में रुकावट पैदा करने के लिए जो संभव हो किया जाय। सन् 1888 में भारत सचिव जार्ज फ्रांसिस हैमिल्टन ने कर्जन को लिखा ...हम यदि भारतवालियों को बिलकुल भिन्न भिन्न तरह के मतावलम्बी हिस्सों में विभक्त कर सकें तो शिक्षा –विस्तार के पलस्वरूप हमारी शासन-व्यवस्था के ऊपर जो प्रछन्न (गुप्त) तथा निरन्तर आक्रमण होने की सम्भावना है उसके विरुद्ध हमारी स्थिति और भी मजबूत हो सकेगी। पाठ्य पुस्तकों को हमें इस तरह तैयार करना होगा जिससे विभिन्न सम्प्रदायों के बीच के भेदभाबों को और भी बढ़ाया जासके।लाँर्ड क्रास ने भारत के बड़े लाँट डफरिन को बताया, धर्म के क्षेत्र में इस तरह का भेदभाव हमारे स्वार्थ के अत्यन्त अनुकूल है।अतः आपके द्वारा प्रायोजित भारत की शिक्षा- व्यवस्था तथा शिक्षण-सामग्री के सम्बन्ध में बनी जाँच कमिटी द्वारा दिये गये सुझावों से हमें कुछ फायदा होने की आशा है।”(पे. 140-141)
शैलेशकुमार वंद्योपाध्याय आगे जोड़ते हैं कि “भारत सचिव चार्ल्स उड ने वाइसराय को लिखा कि भारत में रह रहे जाति-समूहों का आपसी अन्तर्द्वन्द ही भारत में ब्रिटिशों को ताकत देगा। अतः एक फूट डालनेवाली शक्ति को हमेशा जिन्दा रखना होगा। क्योंकि यदि समग्र भारत हमारे विरुद्ध एक हो जाय तो हम कितने दिनों तक यहां टिके रह पायेंगे।”(पे.146) ऐसे ही कुछ उदगार गांधी ने भी हिन्द स्वराज में व्यक्त किये। गांधी ने लिखा कि अंग्रेजों ने अपनी ताकत के बल पर भारत नही लिया वरन् हम भारतीयों ने उन्हें दे दिया।
1904 में लिखी गई सखाराम गणेश देउस्कर की किताब देश की बात में भी लेखक ने आधुनिक भारत में पनपी धार्मिक असहिष्णुता के लिए अंग्रेजी राज को जिम्मेदार बताया। उनका मानना है कि “शरीर- युद्ध में भारतवासियों का बाहुबल और वाणिज्य-युद्ध में उनका धन बल हरण करके ही अंग्रेज शांत नहीं हुए। .…अंग्रेजों को भारतवासियों में बुद्धि-विप्लव उत्पन्न कर उनकी चित्त –वृतियों में खलबली पैदा करने के लिए भी युद्ध करना पड़ा है। इस देश में नई शिक्षा प्रणाली चलाकर देशवासियों का विचार- स्त्रोत नई राह में बहाना और पाश्चात्य सभ्यता की सहायता से लोगों की बुद्धि को मोहित कर उनमें आत्माभिमान और आत्म-शक्ति पर अविश्वास उत्पन्न कराना ही इस युद्ध का प्रधान लक्ष्य था।इस युद्ध से पराधीन जाति का मनरूपी खेत, जीतने वालों के हाथ में पूरी तौर पर चला जाता है।” (पे.261) इसी पुस्तक के संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में (1910) लेखक ने लाला हरदयाल के एक लेख को उद्धृत किया है। 1909 में मा़डर्न रिव्यू में छपे लेख में लाला ने लिखा “…कि जब तक कोई विजेता विजित जाति के सामाजिक कार्यों पर अपना प्रभुत्व नहीं जमा लेता अर्थात उनका परिचालन नही करने लगता, तब तक उसकी राजनीतिक जय पूरी नही होती और उस जय की स्थिरता भी नही रहती। जाति की आत्मा को नष्ट करने के लिए सामाजिक जय की आवश्यकता है। विजेता हमें यह सदा सिखाएंगे कि हमलोग उनकी अपेक्षा निम्नकोटि के हैं। उनके आईन और शासन-पद्धति से उनकी यह बात हमारे दिल में चुभ जाएगी। राजनीतिक विजय डंडे की चोट उनकी श्रेष्ठता और हमारी अक्षमता बता देती है। विजित जाति इसी समय अपनी निकृष्टता स्वीकार करती है, और भविष्योन्नति की आशा छोड़ बैठती है। यहीं से उसका मानसिक अधःपतन प्रारंभ होता है। ” (पे. 265)
संघ परिवार के छपे साहित्य पर एक नजर डालने पर हिंदू जाति के उज्ज्वल भविष्य के बारे में उनकी हताशा परिलक्षित होती है। इस निराशा का ताजा उदाहरण विश्व हिंदू परिषद का हिंदुओं से चार बच्चे पैदा करने की फरमाइश है। इसके पीछे जो तर्क दिया गया है वह आने वाले सौ साल में हिंदुओं की स्थिति इतनी दयनीय होने की संभावना बताई गई है कि हिंदू लड़कियों को अपनी अस्मिता बचाने के लिए आत्महत्या करनी पड़ेगी। इस प्रकार की हीन भावना, आत्मविश्वास की कमी, असुरक्षा और हिंसा का वातावरण तो विजित कमजोर का ही आवरण हो सकता है विजेता की मानसिकता की नहीं। विजेता मजबूत होता है और मजबूत को अपनी मजबूती पर विश्वास होता है।इस प्रकार आजादी के साठ साल बाद भी संघ परिवार स्वंय विजित की मानसिकता से उबर पाया है और न ही हमारे समाज को उबरने देना चाहता है।
1947 से पहले भारत को कमजोर करके ही अंग्रेजी साम्राजाय के हित सधते थे। सवाल है भारत को, तथा विभिन्न धर्मों, संप्रदायों में बटे, विभिन्न क्षेत्रों में रह रहे , अलग अलग भाषा बोलने वाले भारतीयों को कौन कमजोर कर रहा है। दंगों से अब किसके हित सध रहे हैं।गुजरात में 2002 में जो हिंसा हुई वह भारत और गुजरात दोनों के माथे पर कलंक का टीका है। इस हिंसा में जो धन संपत्ति का नुकसान हुआ जो उत्पादन के साधन नष्ट हुए जो रोजगार के अवसर समाप्त हुए उससे हिंदू, मुसलमान, गुजराती, भारतीय सभी प्रभावित हुए। इसी प्रकार जम्मू के चालीस दिन से अधिक के बंध, हड़ताल, काश्मीर को जोड़ने वाले इकलौते राजमार्ग को बंद कर देने से जो नुकसान जम्मू काश्मीर की अर्थव्यवस्था को हुआ उससे कौन कमजोर हुआ कौन मजबूत हुआ।उड़ीसा के बारे में भी यही सवाल उठाए जासकते हैं। वह क्या भाषा, प्रांत,क्षेत्र और धर्म के नाम पर लोगों को भड़का कर हिंसा करवा कर भारतीयों का जो आर्थिक, सामाजिक, सास्कृंतिक नुकसान इन राजनीतिज्ञों ने किया है उसका कभी मुल्यांकन होगा? क्या कभी सर्वोच्च न्यायालय इन मुद्दों पर हिंसक राजनीति करने वालों को उनके द्वारा करवाई गई हिंसा की वजह से हुए नुकसान की भरपाई करवाएगा? उमीद तो नही ही है। भारत में संप्रदायिकता का लंबा इतिहास इतना तो स्पष्ट करता है कि संप्रदायिक तत्वों ने अंग्रेजों के राज में आमजन को धर्म के आधार पर बांट कर अंग्रेजी साम्राज्यवादियों के हित साधे। राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर किया। साम्राज्यवादियों की देश का बटवारा करने में मदद की। आज फिर चारों तरफ हिंसा, अराजकता, अविश्वास, वैमनस्य फैलाकर फिर वही चाल चली जारही है। हिंदुओं के कमजोर होने का भय दिखाना भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है।
भारत में सिकंदर से लेकर आधुनिक काल तक विदेशी आक्रमण होते रहे हैं। परन्तु भारतीय राजाओं ने चीन की तरह पड़ोसी देशों में अपना कब्जा नही जमाया। भारत की ख्याति धर्म गुरु की रही है साम्राज्यवादी की नही। सम्राट अशोक भी महान बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार की वजह से बने कलिंग विजय की वजह से नहीं।
9,11 के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पूरे विश्व को दो खेमों में बाटने की कोशिश की।एक खेमा वह जो अमेरिका के नेतृत्व में विश्व को इस्लामी आतंकवाद से निजात दिलाएगा। साथ में यह चेतावनी भी दी गई कि जो देश या समूह इस खेमे का साथ नही देंगे उनको आतंकवाद समर्थक माना जायगा। इसके साथ साथ आतंकवाद को इस्लाम से भी जोड़ दिया गया। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि ओसामा बिन लादेन को इस्लामी जेहादी संगठन बनाने, पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी समाज को कट्टर सांप्रदायिक संगठनों में संगठित करने का काम अमेरिका ने ही किया।
संक्षेप में कहा जासकता है अंग्रेजी राज की तरह ही आज भी साम्प्रदायिकता पूँजीवादी नव-साम्राज्यवादी व्यवस्था जिसका अगुवा अमेरिका है को ही पोष रहा है। प्रश्न उठता है इसका जहर देश के विभिन्न इलाकों में, मतावलम्बियों में फैलाकर, हिंसा का तांडव करा कर हम किसका हित साध रहे हैं और क्यों साध रहे हैं?अमेरिकी नव-साम्राज्यवादियों का? भारत की तो यह परम्परा कभी नही रही है। यह हिन्दुत्व कहां से आयात किया गया है ?और क्य़ों?
शनिवार, 11 अक्टूबर 2008
गांधी जयंती के बहाने।
दो अक्तूबर गांधी जयंती के उपलक्ष में प्रधान मंत्री ने कहा कि नफरत और संघर्ष के कारण महात्मा गांधी का शांति(सत्य का नहीं?)और अहिंसा का संदेश आज भी दुनियां में प्रासंगिक है।लेकिन अपने समाज में अप्रत्याशित रफ्तार से बढ़ रही हिंसा की प्रवृति के कारणों और शीघ्रातिशीघ्र निदान खोजने की आवश्यकता उनको महसूस नही हुई।आज देश के किसी भी भाग में इंसान स्वयं को सुरक्षित महसूस नही कर रहा है। कहीं पर बम के धमाके हैं तो कहीं सांप्रदायिक हिंसा। सांप्रदायिक तत्व अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए आम लोगों को धर्म, जाति, भाषा प्रांत आदि के खांचों में बाट कर हिंसा के लिये भड़का रहे हैं।सरकारें इन असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने से बचती हैं । कारण उनके स्वंय के राजनीतिक हित इस प्रकार की हिंसा से ही सधते हैं। समाज में गरीबी, बेरोरजरगारी इस कदर बढ़ रही है कि समाज के बड़े तबके को वर्ग संघर्ष के अलावा न्याय पाने का दूसरा रास्ता नजर नहीं आता। क्रांतिकारी आंदोलनों को दबाने के लिए सरकारें गरीबों, शोषितों, विस्थापितों को आपस में बाटने में तथा एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने लगी हैं(मसलन् छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम)। गाधी जयंती पर राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि तो हिंसा के कारणों की समीक्षा ही होगी। क्योंकि सत्य के बगैर अहिंसा संभव ही नही है ।पर हमारे प्रधान मंत्री शांति तो याद रखते हैं सत्य नहीं।
‘त्याग की मूर्ति’ कांग्रेस अध्यक्ष ने भी पानीपत की अपनी रैली में गांधी के आदर्शों का बखान किया। परन्तु केन्द्रीय की सरकार की उपलब्धियों में उन्होंने केवल परमाणु करार का नाम लिया जिसको अमेरिकी सीनेट ने गुरुवार दो अक्तूबर को ही पास कर दिया था।परमाणु करार अपने आप में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला समझौता है। परमाणु ऊर्जा के जिस उत्पादन को इस करार से बढ़ाया जा सकेगा उससे पर्यावरण के प्रदूषण की जो आशंक्षा व्यक्त की जारही है। इस प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। और इस कुप्रभाव से मासूम बच्चे सर्वाधिक पीड़ित होते हैं। परमाणु ऊर्जा उत्पादन में लगी विदेशी कंपनियों के पुराने संयंत्रों को खरीदने में हमारे राजनेता इतने आत्मविभोर हुए हैं कि उनको दीवार पर लिखी यह इबारत नजर नही आती।उनको अपने नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य पर मडराने वाला खतरा भी नहीं दिखता। उन्हें यह जानने की आवश्यकता ही महसूस नही होती कि क्यों फ्रांस,डेनमार्क, नीदरलैंड परमाणु ऊर्जा उत्पादन से अपना हाथ खीच रहे हैं । अमेरिका में भी आखिरी परमाणु संयंत्र व्यावसायिक रूप में 1996 में चालू किया गया था।
सामयिक वार्ता में मनमोहन सिंह पर रत्नेश कुमार कविती छपी है।उसमें लिखा गया है प्रिय मनमोहन/भारतीय तन/ अमेरिकी मन/ कहता जन-जन। मनमोहन ही क्यों?अमेरिकी मन तो आज हर उस मध्यवर्गीय भारतीय का है जो कोई न कोई जुगाड़ लगा कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हिस्सा बनने की कोशिश में लगा है। या बन गया है। हम भारतीयों का यह मर्ज पुराना है।अंग्रेजों के भारत आने के बाद से ही अधिकतर संभ्रांत भारतीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने में ही अपना भविष्य देखने लगे थे। हिन्द स्वराज के सातवे अध्याय में गांधी लिखते हैं कि फटापट धनी बनने के चक्कर में भारतीयों ने कम्पनी के कारिन्दों की सहायता की उनको गले लगाया। 1947 में अंग्रेज चले गए।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय जगत में इग्लेंन्ड का स्थान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने ले लिया। अब अधिकतर संभ्रांत भारतीय (उनकी विचारधारा अमेरिका विरोधी ही क्यों न हो) अमेरिका से जुड़ने में ही अपना भविष्य देखते हैं। सरकारी स्तर पर 1992 से पूरे भारतीय व्यवस्थआ को ही अमेरिका के सांचे में ढ़ालने की कवायद होरही है। लेकिन अमेरिकीकरण की इतने सालों की प्रक्रिया में भी हम आजतक उनके(आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के) उस गुण को नही आत्मसात कर पाए जिसके गांधी भी कायल थे। हिन्द स्वराज के पांचवे अध्याय में अंग्रेजों के सदगुण बताते हुए गांधी लिखते हैं कि अंग्रेज कभी अपने देश की किसी प्रकार की हानि बर्दास्त नही करते । यह गुण अमेरिकियों में भी कूट कूट कर भरा है। इंग्लेंड से आजादी हासिल करने के बाद अमेरिका ने इंग्लेंड पर अपनी असमान आर्थिक निर्भरता से पूरी तरह निजात पा ली और ब्रितानी साम्राज्यवाद से अन्तर्राष्ट्रीय जगत में होड़ करने लगा । प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश की भूमिका में उभरा।
अमेरिका के विपरीत हम भारतीयों में ठेट भारतीय हितों के संरक्षण एवं संवर्धन की कोई जीजीविषा नही दिखती।(अपने को सबसे बड़े राष्ट्रवादी का तमगा देने वाले हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन अंग्रेजों के समय से ही उनके हाथ की कठपुतली बने रहे। आज भी देश के विभिन्न भागों को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौक कर साम्राज्यवादी तत्वों का ही हित साध रहे हैं।) यदि जीजीविषा होती तो अमेरिका के एक इशारे पर हमारे ईमान्दार प्रधान मंत्री अपनी सरकार को दांव पर नही लगाते तथा हर प्रकार के अनैतिक हथकंडे अपना कर संसद में विश्वास मत हासिल करने की औपचारिकता पूरी नही करते। जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने, सांसदों ने पाले बदले वह दर्शाता है कि हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की ही है।आज भी हम अपने पूर्वजों की तरह ही (इंग्लेंन्ड की जगह)अमेरिका का स्वागत,उसकी मदद अपने क्षुद्र निजी स्वार्थों की पूर्ति या प्रतिरोध की क्षमता की कमी की वजह से कर रहे हैं। गांधी ने इस खतरे से हमें 1909 में ही सावधान कर दिया था उन्होंने लिखा कि पूँजी अंग्रेजों के लिए ईश्वर है। आज अमेरिकियों के लिए भी यह ईश्वर से कम नही है। अमेरिकियों का व्यापार भी हमें 1909 में अंग्रेजों के व्यापार की तरह अति पसंद है। ब्रितानियों की तरह अपने तौर तरीकों से अमेरिकी हमें खुश रखते हैं और जो चाहते हैं हमसे करवा लेते हैं।(2,10,2008 की परमाणु संधि इसका एक उदारहण है।)
1909 गांधी ने बताया कि अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। तथा पूरी दुनियां को अपना बाजार बनाना उनका लक्ष्य था । उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेरिका ने भी आज पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी अर्थव्यवस्था का बंधक बनाकर रखा है।1909 की तरह आज भी हम देशवासी भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी पकड़ मजबूत करने में लगे हैं। 1909 में अंग्रेज पूरे विश्व को अपनी मंडी बनाने का प्रयास कर रहे थे पर पूरी तरह सफल नही हो पाए। इसके विपरीत आज अमेरिका ने पूरे विश्व को कमोवेश अपनी मंडी बना ही लिय़ा है। 1909 में यदि हमने आपस में लड़कर अंग्रेजों की शक्ति को बढ़ाया था तो आज भी सभी समाजों के सांप्रदायिक तत्वों ने पूरे देश को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौकने में कोई कोर कसर नही उठा रखी है।
हिन्द स्वराज के पंद्रहवे अध्याय में गांधी जी बताते हैं कि भारत को किस प्रकार का स्वराज नही चाहिये।अपना मंतब्य समझाने के लिए वे इटली का उदाहरण देते हैं। चूंकि समाज का भविष्य समाज को दिशा देने का दावा करने वाले नेताओं की विचारधारा पर निर्भर करता है इसलिए गांधी इटली के दो प्रमुख नेताओं की विचारधाराओं में भिन्नता की दर्शाते हुए राष्ट्र का मतलब समझाते हैं ।नेता का जनता के प्रति कर्तव्य बताते हैं। गांधी कहते हैं गैरीबाल्डी के लिए इटली का अर्थ वहां का राजा तथा उसके अनुचर थे, जबकि मैज्जिनी के लिए इटली का मतलब वहां की जनता थी। मैज्जिनी राजा को महज जनता का सेवक मानते थे।इटली और आस्ट्रिया के बीच हुआ युद्ध केवल दो राजाओं के बीच का टकराव था जिसमें इन देशों की जनता की हैसियत केवल प्यादे की थी। युद्ध जीतने के बाद इटली की उपलब्धियां मामूली रही। जिन सुधारों के नाम पर युद्ध लड़ा गया था उनको लागू नही किया गया। लोगों की हालत में कोई सुधार नही हुआ है। इसलिए इटली के मजदूरों में असंतोष पनपता रहा। वे हत्याएं करते रहे तथा विरोध प्रदर्शन करते रहे। उनके विद्रोह की आशंका हमेशा बनी रही। गांधी नही चाहते थे कि स्वराज मिलने पर भारत के लोगों की ऐसी दुर्गति हो। यहां के नेता जनता के नाम पर सत्ता हथिया लें ऐसा वे नही चाहते थे । गांधी के लिए राष्ट्र भक्ति (देश भक्ति ) का अर्थ आम जन को तानाशाही के दमन चक्र से बचाना था। देश भक्ति का गांधी के लिए मतलब था सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय । दबाव की राजनीति में गांधी विश्वास नही करते थे।वे मानते थे कि हिंसा के माध्यम से हासिल किये गए अधिकार स्थाई नही होते। कारण जैसे ही हिंसा का भय दूर होजाएगा व्यवस्था इन अधिकारों को वापस ले लेगी।
हमारी आजादी के साठ सालों का इतिहास दर्शाता है कि भारतीय लोगों को अधकचरी आजादी ही मिली।राजनीतिक दल सत्ता हथियाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। आम इंसान की आवश्यकताएं, और महत्वाकाक्षाएं, हमारे राजनीतिक तंत्र की प्रार्थमिकता नही रही है। समय बीतने के साथ साथ नेताओं तथा उनके द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था का असली रुप समाज के सामने आगया। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की जगह पूँजी खासकर विदेशी पूँजी हिताय उनका उद्देश्य रह गया है। 1992 के बाद स्थिति और भी खराब होने लग गई है। उदारीकरण की वजह से अमीर और अमीर गरीब और गरीब होरहे हैं।हताशा में विभिन्न वर्गों के लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अभी तक किसानों की आत्मह्त्या सुर्खियों में थी तो अब बुरकरों के आत्महत्या के समाचार आने लगे हैं। आर्थिक मंदी के कारण डाक्टर सटोरियों के भी मानसिक परेशानियों का शिकार होने की घटनाएं बता रहे हैं।
लोगों का धैर्य उनका साथ छोड़ रहा है।अपनी जायज और नाजायज मागें मनवाने के लिए लोग हिंसा का सहारा ले रहे हैं। व्यवस्था का दमन भी चरम पर है।आज देश और देशवासियों की हालात उस तरह की ही है जिस तरह की हालत देख कर गांधी को 1909 में रोना आता था। भारतीय नेता भी गैरीबाल्डी की तरह हैं। इन नेताओं के लिए लोग राष्ट्र का निर्माण नही करते वरन् भौगोनिक सीमाएं देश का निर्माण करती हैं।
‘त्याग की मूर्ति’ कांग्रेस अध्यक्ष ने भी पानीपत की अपनी रैली में गांधी के आदर्शों का बखान किया। परन्तु केन्द्रीय की सरकार की उपलब्धियों में उन्होंने केवल परमाणु करार का नाम लिया जिसको अमेरिकी सीनेट ने गुरुवार दो अक्तूबर को ही पास कर दिया था।परमाणु करार अपने आप में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला समझौता है। परमाणु ऊर्जा के जिस उत्पादन को इस करार से बढ़ाया जा सकेगा उससे पर्यावरण के प्रदूषण की जो आशंक्षा व्यक्त की जारही है। इस प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। और इस कुप्रभाव से मासूम बच्चे सर्वाधिक पीड़ित होते हैं। परमाणु ऊर्जा उत्पादन में लगी विदेशी कंपनियों के पुराने संयंत्रों को खरीदने में हमारे राजनेता इतने आत्मविभोर हुए हैं कि उनको दीवार पर लिखी यह इबारत नजर नही आती।उनको अपने नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य पर मडराने वाला खतरा भी नहीं दिखता। उन्हें यह जानने की आवश्यकता ही महसूस नही होती कि क्यों फ्रांस,डेनमार्क, नीदरलैंड परमाणु ऊर्जा उत्पादन से अपना हाथ खीच रहे हैं । अमेरिका में भी आखिरी परमाणु संयंत्र व्यावसायिक रूप में 1996 में चालू किया गया था।
सामयिक वार्ता में मनमोहन सिंह पर रत्नेश कुमार कविती छपी है।उसमें लिखा गया है प्रिय मनमोहन/भारतीय तन/ अमेरिकी मन/ कहता जन-जन। मनमोहन ही क्यों?अमेरिकी मन तो आज हर उस मध्यवर्गीय भारतीय का है जो कोई न कोई जुगाड़ लगा कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हिस्सा बनने की कोशिश में लगा है। या बन गया है। हम भारतीयों का यह मर्ज पुराना है।अंग्रेजों के भारत आने के बाद से ही अधिकतर संभ्रांत भारतीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने में ही अपना भविष्य देखने लगे थे। हिन्द स्वराज के सातवे अध्याय में गांधी लिखते हैं कि फटापट धनी बनने के चक्कर में भारतीयों ने कम्पनी के कारिन्दों की सहायता की उनको गले लगाया। 1947 में अंग्रेज चले गए।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय जगत में इग्लेंन्ड का स्थान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने ले लिया। अब अधिकतर संभ्रांत भारतीय (उनकी विचारधारा अमेरिका विरोधी ही क्यों न हो) अमेरिका से जुड़ने में ही अपना भविष्य देखते हैं। सरकारी स्तर पर 1992 से पूरे भारतीय व्यवस्थआ को ही अमेरिका के सांचे में ढ़ालने की कवायद होरही है। लेकिन अमेरिकीकरण की इतने सालों की प्रक्रिया में भी हम आजतक उनके(आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के) उस गुण को नही आत्मसात कर पाए जिसके गांधी भी कायल थे। हिन्द स्वराज के पांचवे अध्याय में अंग्रेजों के सदगुण बताते हुए गांधी लिखते हैं कि अंग्रेज कभी अपने देश की किसी प्रकार की हानि बर्दास्त नही करते । यह गुण अमेरिकियों में भी कूट कूट कर भरा है। इंग्लेंड से आजादी हासिल करने के बाद अमेरिका ने इंग्लेंड पर अपनी असमान आर्थिक निर्भरता से पूरी तरह निजात पा ली और ब्रितानी साम्राज्यवाद से अन्तर्राष्ट्रीय जगत में होड़ करने लगा । प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश की भूमिका में उभरा।
अमेरिका के विपरीत हम भारतीयों में ठेट भारतीय हितों के संरक्षण एवं संवर्धन की कोई जीजीविषा नही दिखती।(अपने को सबसे बड़े राष्ट्रवादी का तमगा देने वाले हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन अंग्रेजों के समय से ही उनके हाथ की कठपुतली बने रहे। आज भी देश के विभिन्न भागों को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौक कर साम्राज्यवादी तत्वों का ही हित साध रहे हैं।) यदि जीजीविषा होती तो अमेरिका के एक इशारे पर हमारे ईमान्दार प्रधान मंत्री अपनी सरकार को दांव पर नही लगाते तथा हर प्रकार के अनैतिक हथकंडे अपना कर संसद में विश्वास मत हासिल करने की औपचारिकता पूरी नही करते। जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने, सांसदों ने पाले बदले वह दर्शाता है कि हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की ही है।आज भी हम अपने पूर्वजों की तरह ही (इंग्लेंन्ड की जगह)अमेरिका का स्वागत,उसकी मदद अपने क्षुद्र निजी स्वार्थों की पूर्ति या प्रतिरोध की क्षमता की कमी की वजह से कर रहे हैं। गांधी ने इस खतरे से हमें 1909 में ही सावधान कर दिया था उन्होंने लिखा कि पूँजी अंग्रेजों के लिए ईश्वर है। आज अमेरिकियों के लिए भी यह ईश्वर से कम नही है। अमेरिकियों का व्यापार भी हमें 1909 में अंग्रेजों के व्यापार की तरह अति पसंद है। ब्रितानियों की तरह अपने तौर तरीकों से अमेरिकी हमें खुश रखते हैं और जो चाहते हैं हमसे करवा लेते हैं।(2,10,2008 की परमाणु संधि इसका एक उदारहण है।)
1909 गांधी ने बताया कि अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। तथा पूरी दुनियां को अपना बाजार बनाना उनका लक्ष्य था । उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेरिका ने भी आज पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी अर्थव्यवस्था का बंधक बनाकर रखा है।1909 की तरह आज भी हम देशवासी भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी पकड़ मजबूत करने में लगे हैं। 1909 में अंग्रेज पूरे विश्व को अपनी मंडी बनाने का प्रयास कर रहे थे पर पूरी तरह सफल नही हो पाए। इसके विपरीत आज अमेरिका ने पूरे विश्व को कमोवेश अपनी मंडी बना ही लिय़ा है। 1909 में यदि हमने आपस में लड़कर अंग्रेजों की शक्ति को बढ़ाया था तो आज भी सभी समाजों के सांप्रदायिक तत्वों ने पूरे देश को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौकने में कोई कोर कसर नही उठा रखी है।
हिन्द स्वराज के पंद्रहवे अध्याय में गांधी जी बताते हैं कि भारत को किस प्रकार का स्वराज नही चाहिये।अपना मंतब्य समझाने के लिए वे इटली का उदाहरण देते हैं। चूंकि समाज का भविष्य समाज को दिशा देने का दावा करने वाले नेताओं की विचारधारा पर निर्भर करता है इसलिए गांधी इटली के दो प्रमुख नेताओं की विचारधाराओं में भिन्नता की दर्शाते हुए राष्ट्र का मतलब समझाते हैं ।नेता का जनता के प्रति कर्तव्य बताते हैं। गांधी कहते हैं गैरीबाल्डी के लिए इटली का अर्थ वहां का राजा तथा उसके अनुचर थे, जबकि मैज्जिनी के लिए इटली का मतलब वहां की जनता थी। मैज्जिनी राजा को महज जनता का सेवक मानते थे।इटली और आस्ट्रिया के बीच हुआ युद्ध केवल दो राजाओं के बीच का टकराव था जिसमें इन देशों की जनता की हैसियत केवल प्यादे की थी। युद्ध जीतने के बाद इटली की उपलब्धियां मामूली रही। जिन सुधारों के नाम पर युद्ध लड़ा गया था उनको लागू नही किया गया। लोगों की हालत में कोई सुधार नही हुआ है। इसलिए इटली के मजदूरों में असंतोष पनपता रहा। वे हत्याएं करते रहे तथा विरोध प्रदर्शन करते रहे। उनके विद्रोह की आशंका हमेशा बनी रही। गांधी नही चाहते थे कि स्वराज मिलने पर भारत के लोगों की ऐसी दुर्गति हो। यहां के नेता जनता के नाम पर सत्ता हथिया लें ऐसा वे नही चाहते थे । गांधी के लिए राष्ट्र भक्ति (देश भक्ति ) का अर्थ आम जन को तानाशाही के दमन चक्र से बचाना था। देश भक्ति का गांधी के लिए मतलब था सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय । दबाव की राजनीति में गांधी विश्वास नही करते थे।वे मानते थे कि हिंसा के माध्यम से हासिल किये गए अधिकार स्थाई नही होते। कारण जैसे ही हिंसा का भय दूर होजाएगा व्यवस्था इन अधिकारों को वापस ले लेगी।
हमारी आजादी के साठ सालों का इतिहास दर्शाता है कि भारतीय लोगों को अधकचरी आजादी ही मिली।राजनीतिक दल सत्ता हथियाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। आम इंसान की आवश्यकताएं, और महत्वाकाक्षाएं, हमारे राजनीतिक तंत्र की प्रार्थमिकता नही रही है। समय बीतने के साथ साथ नेताओं तथा उनके द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था का असली रुप समाज के सामने आगया। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की जगह पूँजी खासकर विदेशी पूँजी हिताय उनका उद्देश्य रह गया है। 1992 के बाद स्थिति और भी खराब होने लग गई है। उदारीकरण की वजह से अमीर और अमीर गरीब और गरीब होरहे हैं।हताशा में विभिन्न वर्गों के लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अभी तक किसानों की आत्मह्त्या सुर्खियों में थी तो अब बुरकरों के आत्महत्या के समाचार आने लगे हैं। आर्थिक मंदी के कारण डाक्टर सटोरियों के भी मानसिक परेशानियों का शिकार होने की घटनाएं बता रहे हैं।
लोगों का धैर्य उनका साथ छोड़ रहा है।अपनी जायज और नाजायज मागें मनवाने के लिए लोग हिंसा का सहारा ले रहे हैं। व्यवस्था का दमन भी चरम पर है।आज देश और देशवासियों की हालात उस तरह की ही है जिस तरह की हालत देख कर गांधी को 1909 में रोना आता था। भारतीय नेता भी गैरीबाल्डी की तरह हैं। इन नेताओं के लिए लोग राष्ट्र का निर्माण नही करते वरन् भौगोनिक सीमाएं देश का निर्माण करती हैं।
बुधवार, 17 सितंबर 2008
पतिव्रता की मजबूरी
अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कांग्रेस के पास भेजे गए 123 के नीतिगत दस्तावेज में कहा कि करार में भारत को ईधन आपूर्ति का आश्वासन एक राजनीतिक वादा है और इसे कानूनी बाध्यकारी वादे में तब्दील नही किया जासकता। बुश का बयान आते ही भारत सरकार सफाई देने में या कहिये लीपा पोती में लग गई।कानूनी मामलों में कानूनविद ही ज्यादा अच्छी तरह समझा सकते हैं। अतः कपिल सिब्बल आगे आये उन्होंने फरमाया कि अमेरिका ने राजनीतिक वादा किया है कि परमाणु ईधन की आपूर्ति में रुकावट आने की स्थिति में वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के अन्य सदस्यों से मदद मांगेगा। कपिल सिब्बल ने सफाई दी कि बुश ने यह नही कहा कि वे इस राजनीतिक वादे का सम्मान नही करेंगे।सिब्बल का मानना है कि कानूनी बाध्यता एक अलग सवाल है। (जनसत्ता,13,09) भारत अमेरिका के संबंधों को समानता के तथा आपसी हितों के संरक्षण व संबर्धन के पटल पर स्थापित करने के आधार तो कानूनी प्रावधान ही होंगे। इसीलिए अमेरिकी सरकार ने हाइड कानून पास किया और इस संधि को हाइड कानून तथा 123 के तहत ही कांग्रेस से पास करवा रहा है। सरकारें तो शायद कानूनी बाध्यताओं के आधार पर ही चलती हैं राजनीतिक वायदों के आधार पर नहीं। क्योंकि राजनीतिक वादा तो वुश ने किया है। बुश की कुर्सी गई तो वादा भी गया। यदि कुर्सी रहते भी बुश वादे को भूल जाते हैं तो भारत क्या कर सकता है। यदि राजनीतिक वादे में कोई बाध्यता होती तो बुश को यह सफाई देने की क्या आवश्यकता थी कि कोई कानूनी बाध्यता नही है। इस संदर्भ में इतिहास से यह उद्धरण भी प्रासंगिक है। प्रथम विश्व युद्ध के समय में अपनी आजादी की अलख जगाए देशों का समर्थन पाने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने वादा किया कि युद्ध के बाद गुलाम देशों को स्वनिर्णय का अधिकार दिया जायगा।इसी उमीद में गांधी जी ने भारत में अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती का अभियान चलाया। लेकिन बाद में जब अमेरिकी कांग्रेस ने वर्साय संधि पर मुहर लगाने से इंकार कर दिया तो वुडरो विलसन के सारे वादे धरे के धरे रह गये। किसी ने उन पर मुकरदमा भी नही चलाया। अपने देश में दुर्भाग्य से बुश की कांग्रेस को सफाई के बाद यह राजनीतिक बनाम् कानूनी बाध्यता चिंता का विषय नही बनी। चिंता का विषय बना तो सरकार पर इस संधि का विरोध करने वाले वाम पंथियों के हाथ सरकार पर प्रहार करने के लिए आया यह नया हथियार। अमेरिका से संबंध बनाए रखने के लिए इस हथियार को भोथरा करना आवश्यक था।आज अधिकतर तथाकथित जागरूक भारतीय, मीडिया सभी अमेरिका के अनुकरण में ही देश का हित देख रहे हैं। सरकार और उसके समर्थक राजनीतिक दलों को तो इसी प्रकार के जनमानस की दरकार है।इसीलिए 11 सितंबर को अपने रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने वाशिंगटन में अमेरिकी हथियार कंपनियों को भरोसा दिलाया कि उनको देश में व्यापार करने का बराबरी का मौका दिया जायगा। भारतीय समुदाय के समारोह में मंत्री महोदय ने वियना में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से मिली छूट के लिए भी बुश प्रशासन का आभार जताया। लेकिन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में आने वाली दिक्कतों को ठंडे बस्ते में ही बंद रखना रक्षा मंत्री ने सुविधाजनक समझा।(जनसत्ता 12,9,) उल्लेखनीय है कि वाशिंगटन पोस्ट ने अपने संपादकीय Yes for an Answer में लिखा है कि भारत अमेरिका परमाणु संधि अमेरिका के हित में है। इससे अमेरिकी परमाणु उद्दोगों को बाजार मिलेगा। पोस्ट ने चिंता व्यक्त की कि यदि कांग्रेस इस विधेयक को पास नही करेगी तो बाजार का यह लाभ फ्रांसीसी कंपनियां ले लेंगी।(पी.टी.आई. 12,09,08) 13 सितंबर को संधि के विरोधी से समर्थक बने, मनमोहन सरकार के संजीवनी बने अमर सिंह ने फरमाया कि भारत अमेरिका असैन्य समझौते के बाद भारत जब उपकरणों का आर्डर देगा तो अमेरिका कंपनियों को घाटे नहीं रखा जाएगा।(जनसत्ता 14 सितंबर)स्मरणीय है कि इस प्रकार का बेवाक शर्त विहीन आश्वासन ये मंत्री व जन नेता अपने लोगों को नही देते। किसान 10 पंद्रह हजार का कर्ज नही चुका पाने के कारण देश के हर राज्य में आत्महत्या कर रहे हैं। पर है कोई माई का लाल नेता जो यह कह दे कि बहुत हो चुका अब भारत का किसान आत्महत्या नहीं करेगा। हमारे संवेदनशील प्रधान मंत्री भी पैकेज की घोषणा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। दलितों, आदिवासियों, गरीब गुरबों के बीच जाकर, उनकी रोटी पानी का सेवन करने की हिम्मत करने वाले, उनकी झुग्गियों में रात विता कर भारत के हासिये में रह रहे इंसान की मुश्किलों को समझने की कोशिश कर रहे भारत के युवा नेता राहुल गांधी भी आम भारतीय की हालत नही सुधरने का सारा दोष राज्य सरकारों पर मढ़ देते हैं। काग्रेस शासित राज्यों में भी हालात बेहतर नही हैं यह तथ्य उनकी जवान नही लड़खड़ाता। यही बात आतंकवादी हमलों या बाढ़ पीड़ितो को राहत पहुचाने के संदर्भ में कही जासकती है। इस प्रकार भारतीय नेताओं की भारतवासियों के लिए प्रतिबद्धता व अमेरिकी हितों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता में साफ फर्क नजर आता हैं।अमेरिका के लिए जब हम प्रतिबद्ध होते हैं तो बदले में अमेरिका से उसी प्रकार की प्रतिबद्धता की अपेक्षा भी नही करते।उल्टे जब कभी इस प्रकार के प्रश्न को दबाए रखना संभव नही होता तो लीपा पोती करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अमेरिका के एक खास प्रकार के संबंध बनाए रखने की हमारी मजबूरी एक पतिव्रता स्त्री की मजबूरी की भांति है।भारतीय पतिव्रता नारी भी अपने पति के हर अवगुण और वादखिलाफी को नजरअंदाज कर उसको परमेश्वर मानकर उसकी सेवा में लगी रहने में ही अपना सौभाग्य समझती रही है।आधुनिक भारत में राजा राम मोहन राय के समय से ही संपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय नेता व समाज सुधारक पतिव्रता स्त्री को पतिव्रत के इस गैर बराबरी तथा दोहरे मापदंड़ों की गुलामी से आजाद करने की कोशिश करते रहे। आज दुर्भाग्य से पूरे देश को ही अमेरिका के संदर्भ में इस प्रकार की गैर बराबरी के, आर्थिक गुलामी के रिस्तों में धकेला जारहा है। यह सब महान त्यागी कर रहे हैं। जाने माने अर्थशास्त्री कर रहे है और राष्ट्र हित के नाम पर होरहा है।
सोमवार, 8 सितंबर 2008
जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो...
जनसत्ता के 24 अगस्त के अंक में साजिद रशीद ने अजित साही की 16 अगस्त के तहलका पत्रिका में छपी रपट पर अपनी टिप्पणी खुले पत्र की शैली में लिखी। तहलका पत्रिका में छपी रपट में लेखक ने सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आँफ इंडिया ) के गिरफ्दार सदस्यों पर पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद ठहराने की कोशिश की। साजिद रशीद ने कुछ और पहलुओं को उजागर कर यह समझाने की कोशिश की कि समस्या का दूसरा पहलू भी है। साजिद रशीद की रपट पढ़ कर लगा कि वे इस्लाम के नाम पर आम युवकों को हिंसा के मार्ग पर लेजाने वाले संगठनों की बड़ी बेवाकी से भर्तस्ना करने की कुव्वत रखते हैं। साथ ही जैसा कि उन्होंने स्वयं ही लिखा है कि हिंदू अतिवादी संगठनों के विरुद्ध गवाही देने में भी वह पीछे नही रहे हैं। उनकी आपत्तियों का अजित साही ने 7,9 के जनसत्ता में जो उत्तर दिया वह साजिद रशीद के तर्कों को अपने तत्थों से काटने नूरा कुश्ती भर थी। दुर्भाग्य से अजित साही ने साजिद रशीद की चिंता पर गौर करने का कष्ट नही किया। साजिद रशीद ने 10 अगस्त को भी सिमी पर जमात-ए-इस्लामी का बजरंग दल शीर्षक से लेख लिखा। साजिद रशीद के तीनों लेखों को पढ़ने से यह समझ में आया कि उनकी चिंता उनके समाज का भविष्य है। सिमी के गिरफ्दार नेताओं का कानून का नजर में निर्दोष होना उनके लिए इतना मायने नही रखता जितना अजित साही के लिए दिखता है।साजिद रशिद उनको बेकसूर नही मानते। फिर भी इसमें कोई शक नही है कि पुलिस आतंकी घटना के बाद अल्पसंख्यक समाज के गरीब तबके के बेकसूर लोगों को पकड़ कर उन पर जुल्म करती है। (आरुसि हत्या कांड में भी घरेलू नौकर ही पकड़े गए हैं। उनमें से एक को सबूतों के अभाव में जमानत भी मिल गई है।) ।
साजिद रशीद महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे है। धर्म के नाम पर सिमी द्वारा फैलाई जारही जो आतंकी विचारधारा है वह नव युवकों को गुमराह कर रही है।और ये भोले भाले नवयुवक बहकावे में आकर अपना और साथ में पूरे समाज का नुकसान कर रहे हैं। अजित साही से उम्मीद थी कि वे अपने उत्तर में या तो यह सिद्ध कर दें कि सिमी एक अहिंसक संगठन है और उसकी गतिविधियों से इस्लाम व मुसलमानों का भला ही होरहा है। पर वह यह नही कहते हैं। खाली सिमी के उद्देश्य लिख देते हैं। हमें यह नही भूलना चाहिये कि आज पूरे देश में धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर आम जनता का भावनाएं भड़काई जारही हैं। राजनीतिक स्वार्थों के लिए यह सब किया जारहा है। जो काम मुसलमानों के बीच सिमी कर रहा है वही काम हिंदुओं के बीच संघ परिवार कर रहा है।ओडिसा में गरीब दलित व आदिवासी धर्म के नाम पर आपस में मर कट रहे हैं। ये हिंसा कौन फैला रहा है धार्मिक संगठन। महाराष्ट्र में भाषा के नाम पर लोगों को उकसाया जारहा है। कुछ साल पहले खालिस्तान के नाम पर सिख युवकों को गुमराह किया गया। पंजाब के एक प्रोफेसर व प्रसिद्ध रंगकर्मी जो खालिस्तान आंदोलन का खुलकर विरोध कर रहे थे ने दिल्ली में एक जन सभा में कहा था कि बम फटने की हर घटना के बाद पुलिस आस पास के दस बीस गावों से नौ जवानों को उठा लेजाती थी।अपने बच्चों को छुड़ाने के लिए हर माता पिता को 10,000 रुपये घूस देनी पड़ती थी। उस समय 10,000 रुपये आज के मुकाबले बड़ी राशि हुआ करती थी। खालिस्तान आंदोलन ने पंजाब खासकर सिखों को जो नुकसान पहुचाया क्या कभी उसका आंकलन होगा। क्या कभी आंदोलन के नेता उन माताओं से माफी मांगेंगे जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। काश्मीर में तो खोये हुए व्यक्तियों के रिस्तेदारों ने एक संगठन ही बना लिया है। धर्म, भाषा,क्षेत्र, वर्ग संघर्ष के नाम पर जो भी हिंसक वारदातें होती हैं उनमें मरते तो बेकसूर ही हैं।छत्तीसगड़ में भी नक्सली हिंसा व सलवा जूडूम में मर तो आदिवासी ही रहे हैं। बिहार में नक्सलियों व जमींदारों की सेनाओं के बीच होने वाली हिंसक झड़पों में मरे तो दलित ही।अक्सर हिंसक आंदोलनों को चलाने वाले नेता या तो विदेश में आराम फरमाते हैं या देश में सुरक्षित ठिकानों में रहते हैं। लिट्टे के प्रभाकरन् भी गरीबों को ही मानव बम बनाते हैं। बम विस्फोटों में असंख्य बेकसूर मरते हैं। कई वेकसूरों को पुलिस पकड़ कर यातना देती है। प्रभाकरन् तो सुरक्षित ही रहते हैं। क्या आमजन को बलि का बकरा बनाने की इस साजिस का भंडाफोड़ नही होना चाहिये?संक्षेप में समाज में विष राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले नेता ही अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए फैलाते हैं उससे मरते आम बेकसूर हैं। करता कोई है भरता कोई है। साजिद रशीद इस करने वाले पर अंगुली उठा रहे है। काश अजित साही इस इशारे को समझ पाते और माकूल जबाब देते। अब समय आगया है अपने समाज के ताने बाने को बनाए रखाने के लिए हम सबको मिलकर, अपने निहित स्वार्थों के लिए इस ताने बाने को नष्ट करने वालों को रोकना चाहिये।
साजिद रशीद महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे है। धर्म के नाम पर सिमी द्वारा फैलाई जारही जो आतंकी विचारधारा है वह नव युवकों को गुमराह कर रही है।और ये भोले भाले नवयुवक बहकावे में आकर अपना और साथ में पूरे समाज का नुकसान कर रहे हैं। अजित साही से उम्मीद थी कि वे अपने उत्तर में या तो यह सिद्ध कर दें कि सिमी एक अहिंसक संगठन है और उसकी गतिविधियों से इस्लाम व मुसलमानों का भला ही होरहा है। पर वह यह नही कहते हैं। खाली सिमी के उद्देश्य लिख देते हैं। हमें यह नही भूलना चाहिये कि आज पूरे देश में धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर आम जनता का भावनाएं भड़काई जारही हैं। राजनीतिक स्वार्थों के लिए यह सब किया जारहा है। जो काम मुसलमानों के बीच सिमी कर रहा है वही काम हिंदुओं के बीच संघ परिवार कर रहा है।ओडिसा में गरीब दलित व आदिवासी धर्म के नाम पर आपस में मर कट रहे हैं। ये हिंसा कौन फैला रहा है धार्मिक संगठन। महाराष्ट्र में भाषा के नाम पर लोगों को उकसाया जारहा है। कुछ साल पहले खालिस्तान के नाम पर सिख युवकों को गुमराह किया गया। पंजाब के एक प्रोफेसर व प्रसिद्ध रंगकर्मी जो खालिस्तान आंदोलन का खुलकर विरोध कर रहे थे ने दिल्ली में एक जन सभा में कहा था कि बम फटने की हर घटना के बाद पुलिस आस पास के दस बीस गावों से नौ जवानों को उठा लेजाती थी।अपने बच्चों को छुड़ाने के लिए हर माता पिता को 10,000 रुपये घूस देनी पड़ती थी। उस समय 10,000 रुपये आज के मुकाबले बड़ी राशि हुआ करती थी। खालिस्तान आंदोलन ने पंजाब खासकर सिखों को जो नुकसान पहुचाया क्या कभी उसका आंकलन होगा। क्या कभी आंदोलन के नेता उन माताओं से माफी मांगेंगे जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। काश्मीर में तो खोये हुए व्यक्तियों के रिस्तेदारों ने एक संगठन ही बना लिया है। धर्म, भाषा,क्षेत्र, वर्ग संघर्ष के नाम पर जो भी हिंसक वारदातें होती हैं उनमें मरते तो बेकसूर ही हैं।छत्तीसगड़ में भी नक्सली हिंसा व सलवा जूडूम में मर तो आदिवासी ही रहे हैं। बिहार में नक्सलियों व जमींदारों की सेनाओं के बीच होने वाली हिंसक झड़पों में मरे तो दलित ही।अक्सर हिंसक आंदोलनों को चलाने वाले नेता या तो विदेश में आराम फरमाते हैं या देश में सुरक्षित ठिकानों में रहते हैं। लिट्टे के प्रभाकरन् भी गरीबों को ही मानव बम बनाते हैं। बम विस्फोटों में असंख्य बेकसूर मरते हैं। कई वेकसूरों को पुलिस पकड़ कर यातना देती है। प्रभाकरन् तो सुरक्षित ही रहते हैं। क्या आमजन को बलि का बकरा बनाने की इस साजिस का भंडाफोड़ नही होना चाहिये?संक्षेप में समाज में विष राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले नेता ही अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए फैलाते हैं उससे मरते आम बेकसूर हैं। करता कोई है भरता कोई है। साजिद रशीद इस करने वाले पर अंगुली उठा रहे है। काश अजित साही इस इशारे को समझ पाते और माकूल जबाब देते। अब समय आगया है अपने समाज के ताने बाने को बनाए रखाने के लिए हम सबको मिलकर, अपने निहित स्वार्थों के लिए इस ताने बाने को नष्ट करने वालों को रोकना चाहिये।
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
सांप्रदायिकता का यह दंश तो भारतीय नही है।
आज हिंदुओं की अस्मिता की रक्षा के नाम पर जिस तरह की हिंसा हिंदूवादी संगठन फैला रहे हैं उस तरह की हिंसा की परंपरा न भारतीय है और न ही हिंदू है। बिनौय कुमार सरकार का हिंदू राजनीतिक दर्शन पर एक लेख दिसंबर 1918 के पोलिटिकल साइंस क्वाटरली, पेज 482-500 में छपा।इस लेख में बिनौय कुमार सरकार लिखते हैं कि भारत कट्टर प्रकार की थिआँक्रसि कभी नही था। यहां राज्य धार्मिक संस्थाओं के अधीन कभी नही रहा। हिंदू राज्यों की एक अंय विशेषता यह थी कि वे पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष थे। भारत में धर्म का राजनीति पर कभी भी प्रभुत्व नही रहा। हमेशा ही राज्य का धार्मिक संस्था से अलग स्वतंत्र अस्तित्व रहा। धार्मिक संस्थाओं ने कभी भी राज्य की शक्तियां हासिल करने की कोशिश नही की। धार्मिक संस्थाओं ने कभी राज्य के मामलों में हस्तक्षेप नही किया। इसके विपरीत यूरोप में चर्च और राजा के बीच अक्सर टकराव होते रहते थे। चर्च धार्मिक और भौतिक दोनों क्षेत्रों को अपना नियंत्रण में रखना चाहता था। इसके अलावा पोप अपने कार्डिनल तथा लें गिट्स के माध्यम से भी यूरोपीय राज्यों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करते रहते थे । हिंदू धार्मिक संस्थाओं का इस प्रकार का इतिहास नही रहा है।
13वीं सदी के प्रारंभ से भारत में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। पर भारत के इतिहास में कोई मुसलिम काल नही है इस्लाम के भारत आगमन के पश्चात भी यहां का कोई हिस्सा किसी विदेशी शक्ति के अधीन नही था। सर्व प्रथम इस्लाम ने राजनीतिक तौर पर भारतीयों की आजादी पर अंकुश नही लगाया। दूसरा पूरे देश में कभी भी मुसलमान राजाओं का शासन नही रहा। तीसरा मुसलमान राजाओं व हिंदू राजाओ के आपसी रिस्ते,मुसलमान राजाओं और उनकी हिंदू प्रजा के बीच के रिस्ते,हिंदू राजाओं तथा उनकी मुसलमान प्रजा के बीच के रिस्ते कभी भी रोमन कै थँलिक –प्रा टिस्टैंट के रिस्तों की तरह कटु तथा हिंसक नही रहे। आमतौर पर हिंदू राजाओं के गैर हिंदू प्रशासनिक अधिकारी तथा गैर हिंदू राजाओं के हिंदू सलाहकार व सेनापति होते थे। पुजारी का प्रभाव केवल राजा की तथा जनता निजी धार्मिक जिंदगी तक सीमित था। राज्य की समितियों में पुजारी का दखल केवल तीज त्यौहारों तक सीमित होता था। हर शासक का नैतिक आचरण पर अवश्य धार्मिक मूल्यों के अनुसार होता था। मध्य काल के भारत के राजनीतिक इतिहास में उस प्रकार की अशांति और असुरक्षा कभी नही रही जिस प्रकार रोमन साम्राज्य के उत्थान व पतन के समय दिखी, या इग्लेंन्ड के वेल्स, आइरिस, व स्काट की लड़ाइयों में, या इग्लेंन्ड और फ्रांस के बीच सौ साल के युद्ध में , या इटली के गणराज्यों के मध्य हुए संघर्ष में,या इग्लेंन्ड के गृह युद्ध में, व अन्य यूरोपी देशों में हुए युद्धों में दिखी।
समाज में सारी अच्छाई का स्त्रोत नीति शास्त्र को माना गया जिस प्रकार शरीर को हृष्ट पुष्ट रखने के लिए पौष्टक आहार आवश्यक होता है उसी प्रकार व्यक्ति एवं राज्य के जीवन में स्थायित्व लाने के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का अनुकरण आवश्यक था।हिंदू राजाओं के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक था। नीतिशास्त्र के सिद्धांतों का अनुकरण करके ही राजा प्रजा दोनों के ही हितों का संरक्षण व संवर्धन होसकता है ऐसी मान्यता थी। चूंकि राजा पर अपनी प्रजा के हितों के संरक्षण संबर्धन की जिम्मेदारी थी इसलिए राजा के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का प्रशिक्षण आविश्यक था।
16वी सदी में अब्दुल फजल ने आइने अकबरी में हिंदू नियमों कानूनों का संक्षिप्त विवरण पारसी भाषा में छापा। अब्दुल फजल अकबर के मंत्री थे. अब्दुल फजल ने लिखा कि बुद्धिमान राजा अपने दरबार से भ्रष्ट व षडयंत्रकारियों का सफाया कर देगा।अपने इस महत्वपूर्ण ग्रंथ में अब्दुल फजल ने राजा की तुलना माली से की गई है। जैसे माली बगीचे से खरपतवार उखाड़ कर एक ओर कर देता है और बगीचे को सुंदर बना देता है। साथ ही बगीचे की रखवाली के लिए बाड़ भी चारों ओर उगाता है। ताकि कोई बाहरी तत्व बगीचे में नहीं घुस सके। उसी प्रकार राजा अपने राज्य व प्रजा की देखभाल करता है। अपने प्रशासकों व प्रजा के बीच द्वंद होने पर राजा को प्रजा के साथ खड़ा होना होता था। शुक्र के नीतिशास्त्र के अनुसार राजा को भ्रष्ट लोगों, चोरों उचक्कों,बतमाशों, व अन्य प्रकार की नकारात्मक प्रवृति के लोगों को राज्य का संरक्षण नही देना चाहिये। संक्षेप में बिनौय कुमार सरकार का मानना है कि धार्मिक उन्माद फैला कर समाज में हिंस फैलाना न हिंदू धर्म दर्शन का हैं और न ही कई धर्मों का गुलदस्ता भारतीय धर्म दर्शन का।
13वीं सदी के प्रारंभ से भारत में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। पर भारत के इतिहास में कोई मुसलिम काल नही है इस्लाम के भारत आगमन के पश्चात भी यहां का कोई हिस्सा किसी विदेशी शक्ति के अधीन नही था। सर्व प्रथम इस्लाम ने राजनीतिक तौर पर भारतीयों की आजादी पर अंकुश नही लगाया। दूसरा पूरे देश में कभी भी मुसलमान राजाओं का शासन नही रहा। तीसरा मुसलमान राजाओं व हिंदू राजाओ के आपसी रिस्ते,मुसलमान राजाओं और उनकी हिंदू प्रजा के बीच के रिस्ते,हिंदू राजाओं तथा उनकी मुसलमान प्रजा के बीच के रिस्ते कभी भी रोमन कै थँलिक –प्रा टिस्टैंट के रिस्तों की तरह कटु तथा हिंसक नही रहे। आमतौर पर हिंदू राजाओं के गैर हिंदू प्रशासनिक अधिकारी तथा गैर हिंदू राजाओं के हिंदू सलाहकार व सेनापति होते थे। पुजारी का प्रभाव केवल राजा की तथा जनता निजी धार्मिक जिंदगी तक सीमित था। राज्य की समितियों में पुजारी का दखल केवल तीज त्यौहारों तक सीमित होता था। हर शासक का नैतिक आचरण पर अवश्य धार्मिक मूल्यों के अनुसार होता था। मध्य काल के भारत के राजनीतिक इतिहास में उस प्रकार की अशांति और असुरक्षा कभी नही रही जिस प्रकार रोमन साम्राज्य के उत्थान व पतन के समय दिखी, या इग्लेंन्ड के वेल्स, आइरिस, व स्काट की लड़ाइयों में, या इग्लेंन्ड और फ्रांस के बीच सौ साल के युद्ध में , या इटली के गणराज्यों के मध्य हुए संघर्ष में,या इग्लेंन्ड के गृह युद्ध में, व अन्य यूरोपी देशों में हुए युद्धों में दिखी।
समाज में सारी अच्छाई का स्त्रोत नीति शास्त्र को माना गया जिस प्रकार शरीर को हृष्ट पुष्ट रखने के लिए पौष्टक आहार आवश्यक होता है उसी प्रकार व्यक्ति एवं राज्य के जीवन में स्थायित्व लाने के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का अनुकरण आवश्यक था।हिंदू राजाओं के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक था। नीतिशास्त्र के सिद्धांतों का अनुकरण करके ही राजा प्रजा दोनों के ही हितों का संरक्षण व संवर्धन होसकता है ऐसी मान्यता थी। चूंकि राजा पर अपनी प्रजा के हितों के संरक्षण संबर्धन की जिम्मेदारी थी इसलिए राजा के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों का प्रशिक्षण आविश्यक था।
16वी सदी में अब्दुल फजल ने आइने अकबरी में हिंदू नियमों कानूनों का संक्षिप्त विवरण पारसी भाषा में छापा। अब्दुल फजल अकबर के मंत्री थे. अब्दुल फजल ने लिखा कि बुद्धिमान राजा अपने दरबार से भ्रष्ट व षडयंत्रकारियों का सफाया कर देगा।अपने इस महत्वपूर्ण ग्रंथ में अब्दुल फजल ने राजा की तुलना माली से की गई है। जैसे माली बगीचे से खरपतवार उखाड़ कर एक ओर कर देता है और बगीचे को सुंदर बना देता है। साथ ही बगीचे की रखवाली के लिए बाड़ भी चारों ओर उगाता है। ताकि कोई बाहरी तत्व बगीचे में नहीं घुस सके। उसी प्रकार राजा अपने राज्य व प्रजा की देखभाल करता है। अपने प्रशासकों व प्रजा के बीच द्वंद होने पर राजा को प्रजा के साथ खड़ा होना होता था। शुक्र के नीतिशास्त्र के अनुसार राजा को भ्रष्ट लोगों, चोरों उचक्कों,बतमाशों, व अन्य प्रकार की नकारात्मक प्रवृति के लोगों को राज्य का संरक्षण नही देना चाहिये। संक्षेप में बिनौय कुमार सरकार का मानना है कि धार्मिक उन्माद फैला कर समाज में हिंस फैलाना न हिंदू धर्म दर्शन का हैं और न ही कई धर्मों का गुलदस्ता भारतीय धर्म दर्शन का।
बुधवार, 3 सितंबर 2008
धर्म पर अधर्म की विजय का दिवस
शनिवार (30 अगस्त 2008)) देर रात या यों कहे रविवार के तड़के श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति और जम्मू काश्मीर सरकार के बीच समझौता हो जाने का समाचार सोमवार 1सितम्बर के समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपा। जम्मू काश्मीर सरकार ने श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति को काश्मीर में 40 हेक्टेयर जमीन के यात्रियों के लिए अस्थाई इस्तेमाल की इजाजत मिल गई। श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के संयोजक लीलाकरण शर्मा ने कहा कि “यह ऐतिहासिक और हमारे लिए विजय का दिन है।”विजय किसकी किस पर ? समझ में नही आया। काश्मीर के कट्टरपंथी इसका विरोध कर रहे हैं। तो क्य़ा जम्मू के कट्टरपंथी इसको काश्मीर के कट्टरपंथियों पर अपनी जीत मान रहे थे? इस मायने में यह जीत तो काफी संकीण हुई। धर्म की तो नही ही हुई है।64 दिन के इस आंदोलन से जम्मू काश्मीर अर्थव्यवस्था को, वहां की शिक्षा व्यवस्था को, वहां के सामाजिक ताने बाने को, राज्य के विभिन्न हिस्सों के आपसी रिस्तों पर जो गहरी चोट पहुचाई है उसके एवज में सौ एकड़ जमीन के यात्रियों के लिए अस्थाई इस्तेमाल की इजाजत से किसकी जीत हुई है—अहंकार और अभिमान की? धर्म अहंकार, अभिमान को जीतने का रास्ता दिखाता है । धर्म अहंकार और अभिमान के मद में मस्त होकर दूसरों को नीचा दिखाने,दुखी करने, दीन हीनों को और परेशान करने की इजाजत कभी नही देता। धर्म कभी भी इतना संकीर्ण नही होता है कि 40 हेक्टेयर जमीन के अस्थाई इस्तेमाल की इजाजत पाने के लिए एक पूरे प्रांत के जन जीवन को 64 दिन तक अराजकता की आग में झौंक दे। धर्म किसी की भावनाओं को आहत नही करता। जब कि यह आंदोलन तो एक ही प्रांत के दो हिस्सों के राजनीतिक संगठनों का वोटों के लिए धर्म के नाम पर लोगों की भावना भड़का कर, हिंसा, आगजनी के बल पर अपनी बात मनवाने की कवायत भर थी।इस कवायत में सभी संगठनों ने अर्ध सत्य व झूठ का सहारा लिया। यह तो अधर्म के लिए धर्म का इस्तेमाल था।
64 दिन के इस आंदोलन में भोले का नाम खूब उछाला गया। उस भोले के नाम पर सारी हिंसा हुई जो इस देश के लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरती गंगा के वेग को अपनी जटाओं में संभाल लेता है। ताकि पृथ्वी पर गंगा के तेज पर पृथ्वी की तथा उस पर रह रहे प्राणियों की कोई हानि न हो । उस भोले शंकर के नाम पर सारा विष उगला गया जिसने समुद्र मंथन में मिले विष का पान इसलिए किया था ताकि देवता अमृत पान कर सकें। ऐसे भोले बाबा जाति, धर्म , वर्ण,लिंग के संकुचित खानों में कब सिमटे ? दुर्भाग्य से अपने निहित निजी स्वार्थों के लिए देवी देवताओं का गलत इस्तेमाल करने वालों को भगवान के पालनहार चरित्र को कलुषित करने में कभी संकोच नही हुआ।
आज से दो दशक पहले मर्यादा पुरषोतम राम के नाम पर जो अ-मर्यादा का प्रदर्शन किया गया उससे तो स्वंय राम भी शर्मिंदा हुए होंगे। प्रजा की भावनाओं का आदर करने के लिए जिस राम ने अपनी गर्भवती पत्नी को वनवास दिया, स्वंय विरह की अग्नि में जलते रहे, लेकिन लांछन लगाने वाले इंसान को सजा नही दी। उस करुणानिधान राम का मंदिर बनाने के नाम पर राम रथ विभिन्न राज्यों में घुमाया गया। अपने भाषणों में तथाकथित राम भक्तों ने जो जहर उगला उससे से इस देश का धर्म निरपेक्ष ताना बाना बूरी तरह चरमराया। आगे आगे राम रथ जाता पीछे पीछे सांप्रदायिक हिंसा में निहत्थे गरीब उजाड़े व मारे जाते। करोड़ों ,अरबों की संपत्ति के नष्ट किया जाता। इसकी परिणिति तत्पश्चात केन्द्र व राज्यों में हुए चुनावों में जीती सीटों की संख्या में इजाफा थी।अब तो सांप्रदायिकता का खुन मुह में लग गया था। बाबरी मस्जिद डहाने के लिए पूरे देश में फिर सांप्रदायिक उंमाद फैलाया गया। पूरे देश में एक बार फिर हिंसा का तांडव हुआ। यह सब बाबरी मस्जिद तोड़ कर वहां पर राम मंदिर बनाने के नाम पर किया गया। बाबरी मस्जिद तोड़ दी गई। राम की वह मूर्ति जो मंदिर के अंदर स्थापित थी अब खुले आकाश के नीचे आगई। मूर्ति की पूजा अर्चना सुलभ बनाने के लिए वहां पर अस्थाई ढ़ाचा बनाया गया। इस प्रकार इन तथाकथित राम भक्तों की सत्ता की भूख मिटाने के लिए राम को पक्का आसरा छोड़ कर अस्थाई ढ़ाचे में रहना पड़ रहा है। जिस दिन बाबरी मस्जिद ढ़हाई गई उस दिन को शौर्य दिवस मनाने की घोषणा भी तथाकथित राम भक्तों ने की।(अब भोले भक्तों ने विजय दिवस मनाने की घोषणा की है।) लेकिन जब लिब्राहन आयोग ने इन शूर वीरों को अपना पक्ष रखने बुलाया तो ये बगलें झाकने लगे। अपने अपने को बचाने के प्रयास में फिर अ-सत्य व अर्ध सत्य का सहारा लेने लगे। राम मंदिर के आंदोलन के शीर्ष में रहे एक शूर वीर तो बाबरी मस्जिद विध्वंस पर खेद प्रकट करने से भी स्वंय को नही रोक पाए। ऐसी रीत उन तथाकथित राम भक्तों की है जिन रघुपति(की) रीत सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाई। जो पिता के दिए वचन को निभाने के लिए राज पाट त्याग कर 14 साल वनवास पर रहे।
बाबरी मस्जिद ढ़हाने के बाद बम विस्पोटों का जो सिलसिला चला है वह थमने के बजाय दिन पर दिन बढ़ ही रहा है। (अब अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से भी उसको जोड़ा जारहा है।) दोनों समुदायों के कट्टरपंथियों के हाथ निरपराध लोगों के खून से रंगे होने के सबूत मीडीया में आते ही रहते हैं। सत्ताशीन दल को भी सत्ता हासिल करने के लिए वोटों की आवश्यकता होती है। अतः वह भी कट्टरपंथियों के जहर उगलने की क्षमता से लोहा लेना नही चाहते। आखिर सत्ता सुख अपने कर्तब्य निर्वाह से अधिक आकर्षक होता है।
तथाकथित राम भक्तों की वर्षों की मेहनत आखिर रंग लाई। इन राम भक्तों को जोड़ तोड़ कर सत्ता मिल भी गई। इस जोड़ तोड़ मे बेचारों को राम को ही भुलाना पड़ा। छः साल के अपने शासन में वे राम मंदिर बनाने का मसला किसी न किसी बहाने टालते रहे। हां विष वमन कर बाबरी मस्जिद ढ़हाने में अहम् भूमिका निभाने वाले संतों और साध्वियों को कौडि़यों के मोल सरकारी जमीन आश्रम बनाने के लिए मिल गई। अब राम अस्थाई ढ़ाचे में पुलिस पहरे में रह रहे हैं । तथाकथित राम भक्त आधुनिक सुविधाओं से लैस अपने आश्रमों में सुख से धर्म की विवेचना करने में व्यस्त हैं। इन आश्रमों के संचालन के लिए भी धन चाहिये । धर्म चर्चा से ही भक्तों से वह धन लिया जासकता है।सेक्षेप में तथाकथित राम भक्तों के सत्ता के मोह ने राम को तो सड़क पर ला ही दिया। इसके साथ साथ भारत के इतिहास को, हिंदुओं , हिंदु धर्म के इतिहास को जो कलुषित किया है उसका कभी कोई पश्चाताप करेगा। क्या कभी कोई धर्मभीरु इन तथाकथित राम भक्तों को समझाएगा कि धर्म की राजनीति करना धर्म का कुर्सी पाने के लिए दुरुपयोग करना नही है। धर्म की राजनीति क्या है इसका महात्मा गांधी जी ने विस्तृत विष्लेषण किया है।
छः वर्षों बाद सत्ता सुख भी जाता रहा। पांच साल के सत्ता से वनवास का दुख झेला है।अब फिर मौका है। चुनाव आने वाले हैं।सत्ता पाने के साथ साथ प्रधान मेत्री की कुर्सी भी दाव पर है। राम के नाम पर लोग अब घास नही डाल रहे हैं। सत्ता में बैठे सत्ता भक्तों ने बैठे बैठे भोले बाबा के यात्रियों की सुविधाओं का मसला सत्ता बाहर इंतजार कर रहे तथाकथित राम भक्तों को पकड़ा दिया। इसी का तो उन्हें इंतजार था। अब क्या करना है उन्हें मालूम है। उसका पुराना अनुभव है। इस प्रकार धर्म का दुरुपयोग करने वालों को कभी भी न तो धार्मिक सिद्धांतों से कोई मतलब रहा है।न ही धर्म के लोकहितकारी इतिहास के संरक्षण की जिम्मेदारी का इनको एहसास है।
राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों की तरह श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति व अंय आंदोलनकारी भूल ही गए कि मृगछाला पहने कैलाश वासी भोले शंकर को विधर्मियों से अधिक खतरा तो इस देश के करोड़ों भूखे नंगे लोगों के परिश्रम से अर्जित धन संपदा से अघाए आधुनिक सुख सुवुधाओं से लैस अपने भक्तों से होरहा है। पुराने जमाने में तीर्थ यात्रा का अर्थ अनगिनत शारीरिक कष्ट उठाकर, जान जोखिम में डालकर,बद्रीनाथ अमरनाथ जैसे दुर्गम स्थानों की यात्रा पैदल करनी होती थी। तीर्थयात्रियों को जीवित वापस घर लौटने का भरोसा भी नही होता था। इसलिए तीर्थ पर जाने से पहले सभी इष्ट मित्रों से मिलकर जाते थे।तीर्थयात्रियों की संख्या कम होती थी। शुचिता में उनकी रुचि अधिक होती थी। आज तो तीर्थयात्रा पर्यटन का हिस्सा हो गई है। तीर्थ यात्रियों की रुचि तीर्थ यात्रा, व उपवास में भी उपभोग में ही अधिक रहती है। अमरनाथ व बद्रीनाथ जैसे दुर्गम तीर्थ स्थानों पर भी हर प्रकार की सुख सुविधाएं उपलब्ध है। आज तीर्थ यात्रा के लिए शारीरिक कष्ट उठाने की इच्छाशक्ति या क्षमता की आवश्यकता नही है। आवश्यकता है तो केवल धन की। उसकी मध्यवर्ग के पास कोई कमी नही है। धन के बल पर हैलीकाप्टर से अमरनाथ जाया जासकता है। यदि इतना धन नही है तो भी घोड़े पर या स्थानीय मजदूर की पीठ पर चढ़ कर तो जाया जासकता है। तीर्थ यात्रियों की यह आरामपरस्ती भोले के निवास पर किस प्रकार का कहर ढ़ा रही है। काश इसकी चिंता भी भोले भक्त करते। पता नही भोले शंकर को भक्तों की यह आरामपरस्ती रास आती है या नही। सुना तो यही है कि वह कठोर तप करने वाले को मुह मांगा वरदान दे देते थे। तप करने वाला रावण या भष्मासुर ही क्यों न हो। भोले बाबा तो भोले बाबा हैं उनको इससे क्या लेना देना।
भोले शंकर तो भोले हैं।शायद भक्तों की इन नादानियों को नजरअंदाज कर दें। पर क्या 40 हेक्टेयर जमीन के लिए इतनी कुर्बानियां देने वाले भक्तों को नही सोचना चाहिये कि उनकी भक्ति से भोले का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है।शायद पिछले साल की ही बात है जब पवित्र अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के नकली होने पर विवाद हुआ था। जांच समिति भी बैठी थी। तभी अमरनाथ के वातावरण के गरमाने की बात भी सामने आई थी। हैलीकाप्टरों से आने वाले यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी तथा आम यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी गुफा का तापमान बढ़ जाने का कारण बताया गया। इसी की वजह से लिंग समय से पहले ही पिघल गया। इसी संदर्भ में बताया गया कि उसी साल वहां पर आशाराम बापू ने राम कथा की थी । उनके अनुयाई कथा स्थल तक हैलीकाप्टरों से ही गए। अनुयाइयों की इस प्रकार की लापरवाही से भोले शंकर का निवास स्थान अपना नैसर्गिक चरित्र खो रहा है इसकी चिंता किसी समिति ने नही व्यक्त की । न ही तीर्थयात्रा को स्थानीय परिस्थितों(पर्यावरण) के अनुरूप योजनाबद्ध कराने की किसी नीति का समाचार पढ़ने को नही मिला। हां लद्दाख के पर्यावरण पर चर्चा में एक टी.वी. चैनल ने अवश्य बताया कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।शायद 2015 तक पूरी तरह पिघल जाने की संभावना जताई। इनके पिघल जाने के बाद क्या भोले शंकर कैलाश में वास कर पाऐंगे। आज भोले भक्तों की मुख्य चिंता कैलाश का पर्यावरण बचाने की होनी चाहिये थी। गुणी भक्तों को सुझाना चाहिये था कि वैज्ञानिक अध्ययनों से हिमालय में बने तीर्थ स्थलों के पर्यावरण की क्षमता का अध्ययन कर वहां प्रति वर्ष जाने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या सुनिश्चित की जानी चाहिये। कैलाश मानसरोवर के यात्रियों की तरह इनकी सूची बननी चाहिये। यात्रा पर रवाना होने से पहले यात्रियों को हिमालय को कूड़ाघर बनने से बचाने के उपायों की उचित जानकारी और निर्देश भी दिये जाने चाहिये।
64 दिन के इस आंदोलन में भोले का नाम खूब उछाला गया। उस भोले के नाम पर सारी हिंसा हुई जो इस देश के लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरती गंगा के वेग को अपनी जटाओं में संभाल लेता है। ताकि पृथ्वी पर गंगा के तेज पर पृथ्वी की तथा उस पर रह रहे प्राणियों की कोई हानि न हो । उस भोले शंकर के नाम पर सारा विष उगला गया जिसने समुद्र मंथन में मिले विष का पान इसलिए किया था ताकि देवता अमृत पान कर सकें। ऐसे भोले बाबा जाति, धर्म , वर्ण,लिंग के संकुचित खानों में कब सिमटे ? दुर्भाग्य से अपने निहित निजी स्वार्थों के लिए देवी देवताओं का गलत इस्तेमाल करने वालों को भगवान के पालनहार चरित्र को कलुषित करने में कभी संकोच नही हुआ।
आज से दो दशक पहले मर्यादा पुरषोतम राम के नाम पर जो अ-मर्यादा का प्रदर्शन किया गया उससे तो स्वंय राम भी शर्मिंदा हुए होंगे। प्रजा की भावनाओं का आदर करने के लिए जिस राम ने अपनी गर्भवती पत्नी को वनवास दिया, स्वंय विरह की अग्नि में जलते रहे, लेकिन लांछन लगाने वाले इंसान को सजा नही दी। उस करुणानिधान राम का मंदिर बनाने के नाम पर राम रथ विभिन्न राज्यों में घुमाया गया। अपने भाषणों में तथाकथित राम भक्तों ने जो जहर उगला उससे से इस देश का धर्म निरपेक्ष ताना बाना बूरी तरह चरमराया। आगे आगे राम रथ जाता पीछे पीछे सांप्रदायिक हिंसा में निहत्थे गरीब उजाड़े व मारे जाते। करोड़ों ,अरबों की संपत्ति के नष्ट किया जाता। इसकी परिणिति तत्पश्चात केन्द्र व राज्यों में हुए चुनावों में जीती सीटों की संख्या में इजाफा थी।अब तो सांप्रदायिकता का खुन मुह में लग गया था। बाबरी मस्जिद डहाने के लिए पूरे देश में फिर सांप्रदायिक उंमाद फैलाया गया। पूरे देश में एक बार फिर हिंसा का तांडव हुआ। यह सब बाबरी मस्जिद तोड़ कर वहां पर राम मंदिर बनाने के नाम पर किया गया। बाबरी मस्जिद तोड़ दी गई। राम की वह मूर्ति जो मंदिर के अंदर स्थापित थी अब खुले आकाश के नीचे आगई। मूर्ति की पूजा अर्चना सुलभ बनाने के लिए वहां पर अस्थाई ढ़ाचा बनाया गया। इस प्रकार इन तथाकथित राम भक्तों की सत्ता की भूख मिटाने के लिए राम को पक्का आसरा छोड़ कर अस्थाई ढ़ाचे में रहना पड़ रहा है। जिस दिन बाबरी मस्जिद ढ़हाई गई उस दिन को शौर्य दिवस मनाने की घोषणा भी तथाकथित राम भक्तों ने की।(अब भोले भक्तों ने विजय दिवस मनाने की घोषणा की है।) लेकिन जब लिब्राहन आयोग ने इन शूर वीरों को अपना पक्ष रखने बुलाया तो ये बगलें झाकने लगे। अपने अपने को बचाने के प्रयास में फिर अ-सत्य व अर्ध सत्य का सहारा लेने लगे। राम मंदिर के आंदोलन के शीर्ष में रहे एक शूर वीर तो बाबरी मस्जिद विध्वंस पर खेद प्रकट करने से भी स्वंय को नही रोक पाए। ऐसी रीत उन तथाकथित राम भक्तों की है जिन रघुपति(की) रीत सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाई। जो पिता के दिए वचन को निभाने के लिए राज पाट त्याग कर 14 साल वनवास पर रहे।
बाबरी मस्जिद ढ़हाने के बाद बम विस्पोटों का जो सिलसिला चला है वह थमने के बजाय दिन पर दिन बढ़ ही रहा है। (अब अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से भी उसको जोड़ा जारहा है।) दोनों समुदायों के कट्टरपंथियों के हाथ निरपराध लोगों के खून से रंगे होने के सबूत मीडीया में आते ही रहते हैं। सत्ताशीन दल को भी सत्ता हासिल करने के लिए वोटों की आवश्यकता होती है। अतः वह भी कट्टरपंथियों के जहर उगलने की क्षमता से लोहा लेना नही चाहते। आखिर सत्ता सुख अपने कर्तब्य निर्वाह से अधिक आकर्षक होता है।
तथाकथित राम भक्तों की वर्षों की मेहनत आखिर रंग लाई। इन राम भक्तों को जोड़ तोड़ कर सत्ता मिल भी गई। इस जोड़ तोड़ मे बेचारों को राम को ही भुलाना पड़ा। छः साल के अपने शासन में वे राम मंदिर बनाने का मसला किसी न किसी बहाने टालते रहे। हां विष वमन कर बाबरी मस्जिद ढ़हाने में अहम् भूमिका निभाने वाले संतों और साध्वियों को कौडि़यों के मोल सरकारी जमीन आश्रम बनाने के लिए मिल गई। अब राम अस्थाई ढ़ाचे में पुलिस पहरे में रह रहे हैं । तथाकथित राम भक्त आधुनिक सुविधाओं से लैस अपने आश्रमों में सुख से धर्म की विवेचना करने में व्यस्त हैं। इन आश्रमों के संचालन के लिए भी धन चाहिये । धर्म चर्चा से ही भक्तों से वह धन लिया जासकता है।सेक्षेप में तथाकथित राम भक्तों के सत्ता के मोह ने राम को तो सड़क पर ला ही दिया। इसके साथ साथ भारत के इतिहास को, हिंदुओं , हिंदु धर्म के इतिहास को जो कलुषित किया है उसका कभी कोई पश्चाताप करेगा। क्या कभी कोई धर्मभीरु इन तथाकथित राम भक्तों को समझाएगा कि धर्म की राजनीति करना धर्म का कुर्सी पाने के लिए दुरुपयोग करना नही है। धर्म की राजनीति क्या है इसका महात्मा गांधी जी ने विस्तृत विष्लेषण किया है।
छः वर्षों बाद सत्ता सुख भी जाता रहा। पांच साल के सत्ता से वनवास का दुख झेला है।अब फिर मौका है। चुनाव आने वाले हैं।सत्ता पाने के साथ साथ प्रधान मेत्री की कुर्सी भी दाव पर है। राम के नाम पर लोग अब घास नही डाल रहे हैं। सत्ता में बैठे सत्ता भक्तों ने बैठे बैठे भोले बाबा के यात्रियों की सुविधाओं का मसला सत्ता बाहर इंतजार कर रहे तथाकथित राम भक्तों को पकड़ा दिया। इसी का तो उन्हें इंतजार था। अब क्या करना है उन्हें मालूम है। उसका पुराना अनुभव है। इस प्रकार धर्म का दुरुपयोग करने वालों को कभी भी न तो धार्मिक सिद्धांतों से कोई मतलब रहा है।न ही धर्म के लोकहितकारी इतिहास के संरक्षण की जिम्मेदारी का इनको एहसास है।
राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों की तरह श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति व अंय आंदोलनकारी भूल ही गए कि मृगछाला पहने कैलाश वासी भोले शंकर को विधर्मियों से अधिक खतरा तो इस देश के करोड़ों भूखे नंगे लोगों के परिश्रम से अर्जित धन संपदा से अघाए आधुनिक सुख सुवुधाओं से लैस अपने भक्तों से होरहा है। पुराने जमाने में तीर्थ यात्रा का अर्थ अनगिनत शारीरिक कष्ट उठाकर, जान जोखिम में डालकर,बद्रीनाथ अमरनाथ जैसे दुर्गम स्थानों की यात्रा पैदल करनी होती थी। तीर्थयात्रियों को जीवित वापस घर लौटने का भरोसा भी नही होता था। इसलिए तीर्थ पर जाने से पहले सभी इष्ट मित्रों से मिलकर जाते थे।तीर्थयात्रियों की संख्या कम होती थी। शुचिता में उनकी रुचि अधिक होती थी। आज तो तीर्थयात्रा पर्यटन का हिस्सा हो गई है। तीर्थ यात्रियों की रुचि तीर्थ यात्रा, व उपवास में भी उपभोग में ही अधिक रहती है। अमरनाथ व बद्रीनाथ जैसे दुर्गम तीर्थ स्थानों पर भी हर प्रकार की सुख सुविधाएं उपलब्ध है। आज तीर्थ यात्रा के लिए शारीरिक कष्ट उठाने की इच्छाशक्ति या क्षमता की आवश्यकता नही है। आवश्यकता है तो केवल धन की। उसकी मध्यवर्ग के पास कोई कमी नही है। धन के बल पर हैलीकाप्टर से अमरनाथ जाया जासकता है। यदि इतना धन नही है तो भी घोड़े पर या स्थानीय मजदूर की पीठ पर चढ़ कर तो जाया जासकता है। तीर्थ यात्रियों की यह आरामपरस्ती भोले के निवास पर किस प्रकार का कहर ढ़ा रही है। काश इसकी चिंता भी भोले भक्त करते। पता नही भोले शंकर को भक्तों की यह आरामपरस्ती रास आती है या नही। सुना तो यही है कि वह कठोर तप करने वाले को मुह मांगा वरदान दे देते थे। तप करने वाला रावण या भष्मासुर ही क्यों न हो। भोले बाबा तो भोले बाबा हैं उनको इससे क्या लेना देना।
भोले शंकर तो भोले हैं।शायद भक्तों की इन नादानियों को नजरअंदाज कर दें। पर क्या 40 हेक्टेयर जमीन के लिए इतनी कुर्बानियां देने वाले भक्तों को नही सोचना चाहिये कि उनकी भक्ति से भोले का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है।शायद पिछले साल की ही बात है जब पवित्र अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के नकली होने पर विवाद हुआ था। जांच समिति भी बैठी थी। तभी अमरनाथ के वातावरण के गरमाने की बात भी सामने आई थी। हैलीकाप्टरों से आने वाले यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी तथा आम यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी गुफा का तापमान बढ़ जाने का कारण बताया गया। इसी की वजह से लिंग समय से पहले ही पिघल गया। इसी संदर्भ में बताया गया कि उसी साल वहां पर आशाराम बापू ने राम कथा की थी । उनके अनुयाई कथा स्थल तक हैलीकाप्टरों से ही गए। अनुयाइयों की इस प्रकार की लापरवाही से भोले शंकर का निवास स्थान अपना नैसर्गिक चरित्र खो रहा है इसकी चिंता किसी समिति ने नही व्यक्त की । न ही तीर्थयात्रा को स्थानीय परिस्थितों(पर्यावरण) के अनुरूप योजनाबद्ध कराने की किसी नीति का समाचार पढ़ने को नही मिला। हां लद्दाख के पर्यावरण पर चर्चा में एक टी.वी. चैनल ने अवश्य बताया कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।शायद 2015 तक पूरी तरह पिघल जाने की संभावना जताई। इनके पिघल जाने के बाद क्या भोले शंकर कैलाश में वास कर पाऐंगे। आज भोले भक्तों की मुख्य चिंता कैलाश का पर्यावरण बचाने की होनी चाहिये थी। गुणी भक्तों को सुझाना चाहिये था कि वैज्ञानिक अध्ययनों से हिमालय में बने तीर्थ स्थलों के पर्यावरण की क्षमता का अध्ययन कर वहां प्रति वर्ष जाने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या सुनिश्चित की जानी चाहिये। कैलाश मानसरोवर के यात्रियों की तरह इनकी सूची बननी चाहिये। यात्रा पर रवाना होने से पहले यात्रियों को हिमालय को कूड़ाघर बनने से बचाने के उपायों की उचित जानकारी और निर्देश भी दिये जाने चाहिये।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)