रविवार, 28 अगस्त 2011
अन्ना हजारे तथा उनके समर्थकों पर संसद की गरिमा भंग करने का आरोप बार बार लगता रहा। हर बार मन बरबस कमजोर माने जाने वाले आम आदमी की तुलना पितृसत्ता के तहत दमित शोषित नारी से करने लगा। कारण कुल परिवार की मर्यादा की रक्षा का भार भी इसी बेचारी नारी पर होता है। कुल की मर्यादा की रक्षा के विए उससे कभी सती सीता सावित्री की भूमिका तो कभी काली की भूमिका की अपेक्षा की जाती रही है। परंतु खुद की रक्षा करने में उसको हमेशा ही असमर्थ रखा गया है ताकि वह पीढ़ी दर पीढ़ी पुरुष पर निर्भर रहै। कमोवेश यही भूमिका व्यवस्था के रखवैालों तथा कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा आम आदमी के लिए गढ़ी जारही थी। अपने लिए एक मजबूत लोकपाल कानून को एक निश्चित अवधि में पास करने की उसकी मांग को संसद की अवह्वेलना के रूप में प्रचारित किया गया। परंतु सासदों के संसद में असंसदीय आचरण पर कोई अगुली लहीं उठीई गई।
शुक्रवार, 15 मई 2009
इस रंग भेद के क्या कहने?
हरिद्वार में 13मई को स्वामी रामदेव ने वोट देने के बाद कहा कि विश्व के कई अंय देशों की भांति भारत में भी कानूनी तौर पर वोट डालना आवश्यक कर देना चाहिए।उनका मानना है कि शत प्रतिशत वोट पड़ने से राजनीति में अनपढ़ व बेइमान लोग नहीं आने पाएंगे।बाबा इस बात से व्यथित थे कि लोग चंद रुपयों और दारू की बोतल में अपना वोट बेच देते हैं जो लोकतंत्र और देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।बाबा राजनीति में भ्रष्ट लोगों का बोलबाला होने से भी चिंतित थे। इन भ्रष्ट लोगों के आगे समाज के ईमानदार लोगों की विवशता व लाचारी भी बाबा को खलती है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन को देश में वापस लाना भी बाबा को अहम लगता है। चुनाव के बाद बाबा इस धन को वापस देश में लाने के लिए जोरदार मुहिम चलाने का वादा कर रहे हैं।(14 मई 2009 की जनसत्ता) इस रिपोर्ट के अनुसार बाबा अनपढ़ और बेईमान को तराजू के एक ही पलड़े में रख रहे हैं। चुनाव में भ्रष्टाचार भी बाबा को केवल दारू की बोतल और वोट पाने के लिए नोट बाटने में ही दिखता है।चुनाव प्रचार में जो अथाह धन राजनीतिक दल व प्रत्यासी दोनों लगाते हैं उस पर बाबा की नजर नहीं जाती।राजनीतिक दलों तथा प्रत्यासियों के पास यह अकूत संपत्ति आती कहां से है?इतनी विशाल राशि राजनीतिक दलों को दान देने वाले औद्योगिक और व्यापारिक घराने इस संपदा का अर्जन क्या ईमानदार तरीके से करते हैं? क्या आम भारतीय गरीब, अनपढ़, व बेराजगार इन औद्योगिक और व्यापारिक घरानों की ईमानदारी के बावजूद हुआ है या अपने निहित स्वार्थ सिद्धि के लिए इन द्वारा अपनाए गए भ्रष्ट तरीकों की वजह से हुआ है? संसद और विधान सभाओं में कितने सांसद व विधायक इन घरानों से धन लेकर इनके हितों का संरक्षण और संवर्धन करते हैं ?इसका हिसाब किताब भी शायद बाबा ने नहीं रखा है।लेकिन बाबा तो आकड़ों के सहारे अपनी बात कहते हैं ।ये आकड़े बाबा के पास नहीं होना आश्चर्यजनक है।बाबा को भक्त लाखों करोड़ों का दान किस पैसे से देते हैं? क्या बाबा ने दानियों पर यह शर्त रखी है कि वे ईमानदारी से कमाए गए सफेद धन ही दान में स्वीकार करेंगे? यह सब कहने का लुब्बों लबाव यह है कि पढ़े लिखे सुविधा-संपंन लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए जिस हद तक भ्रष्ट व गैरकानूनी तरीके अपनाते हैं उसकी तुलना में गरीबों द्वारा फैलाया गया भ्रष्टाचार बहुत कम है। पढ़े लिखे सुविधा-संपंन, औद्योगिक और व्यापारिक घराने तथा राजनीतिज्ञ किस प्रकार इस देश की संपदा और गरीब को लूटते हैं इसकी एक बानगी शिरीष खरे ने पेश की है।
शिरीष खरेमुंबई मेहनतकश मजदूरों की बदौलत चलती है. जिस रोज उन्होंने अपना हाथ रोका, यह शहर भी रूक जाएगा. इतनी अहम हिस्सेदारी होने के बावजूद उनकी जिंदगी मलिन बस्तियों में गुजरती है. क्योंकि देश की पूरी तरक्की खास शहरों को केन्द्र में रखकर हुई इसलिए कई दलित, आदिवासी, मछुआरा, कामगार और कारीगर अपने माहल्लों से उजड़कर यहां आए. लेकिन अमीर खानदान उन्हें `अतिक्रमणदार´ कहते हैं. ऐसा कहते वक्त गंदगी का एहसास उनके चेहरे पर आकर सिकुड़ जाता है. जबकि सच यह है कि आखा मुंबई पर बिल्डर, ठेकेदार और माफिया के गठजोड़ का राज है.जिन्होंने समुंदर के किनारों और रास्तों को गैरकानूनी तरीके से हथिया लिया है. 10/12 की लाखों झुग्गियां तोड़ने वाली सत्ता का ध्यान इस तरफ नहीं जाता. महाराष्ट्र या बाकी राज्यों से आए गरीब लोग मुंबई के दुश्मन नहीं होते. जिन लोगों की वजह से मुंबई अस्त-व्यस्त आता हैं उनके काले कारनामों पर रोशनी डाली जानी चाहिए. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी. लेकिन बिल्डर ने गरीबों का हक मारकर अपना कारोबार तो खड़ा किया ही कई कानूनों को भी तोड़ा. इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन मुंबई में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में शहर के बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन को 80 साल के लिए लीज पर दिया गया. ऐसा ही एक और इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसके अलावा दो और घटनाओं पर गौर कीजिए. पहले जमीन सीलिंग कानून का रद्द होना और उसके बाद कुछ अमीरों का 3000 एकड़ जमीन पर राज चलना. यह दोनों बातें एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं बल्कि काफी घुली-मिली लगती हैं. मुंबई सेन्ट्रल में तैयार हो रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. जो आप नहीं जानते वह है इससे जुड़ा घोटाला. यह टावर से भी ऊंचा है. सूचना के हक से मिली जानकारी के मुताबिक यहां की जमीन 12.2 मीटर डीपी मार्ग के लिए आरक्षित है. यह काम झोपड़पट्टी पुर्नवास योजना के तहत होना है. साफ है कि टावर के बहाने शहर के अमीर लोगों ने करोड़ रूपए की जमीन घेर ली है. लेकिन इससे भी ज्यादा हेरतअंगेज मामला यह है कि सड़क के ऊपर हुआ इतना बड़ा अतिक्रमण किसी को नजर नहीं आता. 1976 में सरकार ने शहर की खाली जमीन को बचाने और समुदाय की भलाई के लिए `शहरी जमीन कानून´ बनाया था. लेकिन यह कानून मौलिक तौर पर कभी अमल में नहीं लाया गया. लगता है शहरी जमीनदारों ने ही इसका फायदा उठाया है. इसलिए तो कुछ खानदानों ने ऐसी करीब 15000 एकड़ से अधिक जमीन को अपना बना लिया. इसी तरह सार्वजनिक जमीनों का निजी इस्तेमाल भी हो रहा है. जैसा कि नगर योजना विभाग लिखता है कि `मुंबई की जमीन का इस्तेमाल विकास योजना के तहत जाना और माना गया है.´ इसलिए विकास योजना मे उन्हें हर बार गरीब का झोपड़ा ही बाधक लगता है. बार-बार ऐसी बस्तियां ही टूटती हैं. सूचना के हक से मिले कागजात दर्शाते हैं कि पिछले दो सालों में, महाराष्ट्र शासन ने 60 जगहों के आरक्षण या तो बदलें या काटे. और उनमें से कई प्राइवेट बिल्डरों को ऊंची इमारत बनाने के लिए दिए. पिछले 15 सालों में स्कूल, अस्पताल, गार्डन और ग्राउण्ड के लिए रखी कुल जमीन में से एक-तिहाई ही प्राप्त की है. इसी प्रकार 281 जगहों में से महज 3 सार्वजनिक आवास के लिए, 925 जगहों में से 48 स्कूलों के लिए और 379 जगहों में से केवल 1 अस्पताल के लिए रखी है. बाकी की जमीनों का जिक्र नहीं मिलता है. सूचना के हक से मिली जानकारी के आधार पर यह जाहिर होता है कि- ``मंडल ने मुंबई की सैकड़ों एकड़ जमीन कुछ गिने-चुने लोगों को सौंपी है. दूसरी तरफ पिछले कई सालों से गरीब के भाड़े की जमीन रूकवाई है. कुछ असरदार लोगों ने भाड़े की नई जगहों को लिया है. उन्होंने पुराने भाड़ों के इकरारनामों को या तो नया बनवाया या बढ़वाया है. मंडल ने करीब 10,000 वर्ग मीटर जगह भाड़े से दी हैं. इसका बाजार भाव सलाना 1700 रूपए प्रति वर्ग मीटर है लेकिन मंडल ने 106 रूपए प्रति वर्ग मीटर से भाड़ा लगाया. इससे उसे कुल 48 करोड़ रूपए का घाटा हुआ. मुंबई के लोगों ने कपड़ा मीलों को बंद होते देखा है. इस बेकारी के बीच मिलों की जमीनों को बेचा गया. इसमें एक के बाद एक घपले हुए. उनमें से एक घपला 2005 का है जिसमें एनटीसी ने ज्युटीपर मिल को 11 एकड़ जमीन बेची. एनटीसी ने जब जमीन बेचने के लिए भाव मंगवाए तब टेण्डर में घोषित किया था कि एमएसआय करीब 6.4 लाख वर्ग फिट रहेगा. इस आधार पर इण्डियाबुल्स ने 276 करोड़ रूपए लगाए. लेकिन मिल की जमीन लेने पर एमएसआय दुगुना हुआ. कानून के हिसाब से देखा जाए तो `शहरी जमीन कानून की धारा 26´ के मुताबिक जमीन बेचने से पहले मंडल से इजाजत लेनी जरूरी थी. लेकिन यह जमीन बिना इजाजत बेची गई. ऐसे ही घपले कर शहर के बीचोंबीच करीब 600 एकड़ जमीन पर माल, शापिंग काम्लेक्स, बंग्ले और प्राइवेट आफिस बनाए जा रहे हैं. उन्होंने मीठी नदी को भी नहीं छोड़ा. 90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया था जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन बनाई गई. आज काम्पलेक्स की जगह लाखों वर्ग फिट से अधिक फैली हैं जिनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल्स बस गए हैं. इन बिल्डरों ने फेरीवालों की जमीनों पर कब्जा किया. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए आरक्षित थी उसे छोटे व्यपारियों से छीन लिया गया है.( www.crykedost.blogspot.com से)
posted by CRY के दोस्त at 1:54 PM on May 12, 2009
इसके विपरीत गरीबों, अनपढ़ों, भिखारियों व किन्नरों को जब जब भी जन सेवा का मौका मिला उन्होंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से यह जिम्मेदारी निभाई। मुजफ्फरनगर के मोरना ब्लाक क्षेत्र के पंचायत चुनाव में स्थानीय लोगों ने एक किन्नर बाला को जिला पंचायत के लिए चुना। यह जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के हर नागरिक के सुख दुख में शामिल होती है। पंचायत की बैठकों में अपने क्षेत्र की समस्याओं के निस्तारण के लिए आवाज उठाती है।क्षेत्र में घूम घूम कर समस्याओं का पता लगाकर अधिकारियों तक पहुंचाती है।इसी प्रकार पुरकाजी ब्लाक के खाई खेड़ा गांव के वासिंदों ने एक भिखारी नट को अपना प्रधान बना दिया। इस प्रधान ने जाति, पक्ष विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठ कर गांव के विकास के कार्य कराए। गांव की समस्याओं को सांसदों, विधायकों व अफसरों तक पहुचाकर उनका निराकरण कराया। सदर ब्लाक के सुजडू गांव में घरों में चूल्हा-चौका व खेत में मजदूरी करने वाली कश्मीरी देवी को प्रधान बना दिया। वह भी अपने साथियों के साथ पूरी निष्ठा और लगन से गांव के विकास में लगी है। इन सभी प्रत्यासियों के चुनाव में धन भी स्थानीय ग्रामीणों ने ही लगाया।(जनसत्ता 8 मई 2009)/ यह विडंबना ही है कि अपने ही देश में अपनी चुनी सरकारों द्वारा पिछले 60सालों से ये गरीब, दमित शोषित ठगे, कुचले जारहे हैं। फिर भी एक दिन इस राजनीति में अपना यथोचित स्थान पाने की उमीद में ये निष्ठा से अपना वोट देते हैं। पर समाज के ठेकेदार इनको दुराग्रह की नजर से देखते हैं।जिस दिन समाज के स्वयंभू भद्रलोक इन गरीब गुरबों के मानवीय गुणों को पहचानने लगेंगे, और भ्रष्ट लोगों के चकाचक सफेद कपड़ों भ्रष्टाचार के दाग देख पाएंगे।साथ ही निसंकोच और निस्वार्थ भाव से उन दागों की ओर अंगुली उठा पाएंगे उस दिन समाज में भ्रष्टाचार व भ्रष्टचारी की मान्यता कम हो जाएगी ।समाज में भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में यह पहला कदम होगा।अनपढ़ गरीब भ्रष्ट नही होता वरन् भ्रष्टाचार का शिकार होता है।
शिरीष खरेमुंबई मेहनतकश मजदूरों की बदौलत चलती है. जिस रोज उन्होंने अपना हाथ रोका, यह शहर भी रूक जाएगा. इतनी अहम हिस्सेदारी होने के बावजूद उनकी जिंदगी मलिन बस्तियों में गुजरती है. क्योंकि देश की पूरी तरक्की खास शहरों को केन्द्र में रखकर हुई इसलिए कई दलित, आदिवासी, मछुआरा, कामगार और कारीगर अपने माहल्लों से उजड़कर यहां आए. लेकिन अमीर खानदान उन्हें `अतिक्रमणदार´ कहते हैं. ऐसा कहते वक्त गंदगी का एहसास उनके चेहरे पर आकर सिकुड़ जाता है. जबकि सच यह है कि आखा मुंबई पर बिल्डर, ठेकेदार और माफिया के गठजोड़ का राज है.जिन्होंने समुंदर के किनारों और रास्तों को गैरकानूनी तरीके से हथिया लिया है. 10/12 की लाखों झुग्गियां तोड़ने वाली सत्ता का ध्यान इस तरफ नहीं जाता. महाराष्ट्र या बाकी राज्यों से आए गरीब लोग मुंबई के दुश्मन नहीं होते. जिन लोगों की वजह से मुंबई अस्त-व्यस्त आता हैं उनके काले कारनामों पर रोशनी डाली जानी चाहिए. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी. लेकिन बिल्डर ने गरीबों का हक मारकर अपना कारोबार तो खड़ा किया ही कई कानूनों को भी तोड़ा. इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन मुंबई में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में शहर के बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन को 80 साल के लिए लीज पर दिया गया. ऐसा ही एक और इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसके अलावा दो और घटनाओं पर गौर कीजिए. पहले जमीन सीलिंग कानून का रद्द होना और उसके बाद कुछ अमीरों का 3000 एकड़ जमीन पर राज चलना. यह दोनों बातें एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं बल्कि काफी घुली-मिली लगती हैं. मुंबई सेन्ट्रल में तैयार हो रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. जो आप नहीं जानते वह है इससे जुड़ा घोटाला. यह टावर से भी ऊंचा है. सूचना के हक से मिली जानकारी के मुताबिक यहां की जमीन 12.2 मीटर डीपी मार्ग के लिए आरक्षित है. यह काम झोपड़पट्टी पुर्नवास योजना के तहत होना है. साफ है कि टावर के बहाने शहर के अमीर लोगों ने करोड़ रूपए की जमीन घेर ली है. लेकिन इससे भी ज्यादा हेरतअंगेज मामला यह है कि सड़क के ऊपर हुआ इतना बड़ा अतिक्रमण किसी को नजर नहीं आता. 1976 में सरकार ने शहर की खाली जमीन को बचाने और समुदाय की भलाई के लिए `शहरी जमीन कानून´ बनाया था. लेकिन यह कानून मौलिक तौर पर कभी अमल में नहीं लाया गया. लगता है शहरी जमीनदारों ने ही इसका फायदा उठाया है. इसलिए तो कुछ खानदानों ने ऐसी करीब 15000 एकड़ से अधिक जमीन को अपना बना लिया. इसी तरह सार्वजनिक जमीनों का निजी इस्तेमाल भी हो रहा है. जैसा कि नगर योजना विभाग लिखता है कि `मुंबई की जमीन का इस्तेमाल विकास योजना के तहत जाना और माना गया है.´ इसलिए विकास योजना मे उन्हें हर बार गरीब का झोपड़ा ही बाधक लगता है. बार-बार ऐसी बस्तियां ही टूटती हैं. सूचना के हक से मिले कागजात दर्शाते हैं कि पिछले दो सालों में, महाराष्ट्र शासन ने 60 जगहों के आरक्षण या तो बदलें या काटे. और उनमें से कई प्राइवेट बिल्डरों को ऊंची इमारत बनाने के लिए दिए. पिछले 15 सालों में स्कूल, अस्पताल, गार्डन और ग्राउण्ड के लिए रखी कुल जमीन में से एक-तिहाई ही प्राप्त की है. इसी प्रकार 281 जगहों में से महज 3 सार्वजनिक आवास के लिए, 925 जगहों में से 48 स्कूलों के लिए और 379 जगहों में से केवल 1 अस्पताल के लिए रखी है. बाकी की जमीनों का जिक्र नहीं मिलता है. सूचना के हक से मिली जानकारी के आधार पर यह जाहिर होता है कि- ``मंडल ने मुंबई की सैकड़ों एकड़ जमीन कुछ गिने-चुने लोगों को सौंपी है. दूसरी तरफ पिछले कई सालों से गरीब के भाड़े की जमीन रूकवाई है. कुछ असरदार लोगों ने भाड़े की नई जगहों को लिया है. उन्होंने पुराने भाड़ों के इकरारनामों को या तो नया बनवाया या बढ़वाया है. मंडल ने करीब 10,000 वर्ग मीटर जगह भाड़े से दी हैं. इसका बाजार भाव सलाना 1700 रूपए प्रति वर्ग मीटर है लेकिन मंडल ने 106 रूपए प्रति वर्ग मीटर से भाड़ा लगाया. इससे उसे कुल 48 करोड़ रूपए का घाटा हुआ. मुंबई के लोगों ने कपड़ा मीलों को बंद होते देखा है. इस बेकारी के बीच मिलों की जमीनों को बेचा गया. इसमें एक के बाद एक घपले हुए. उनमें से एक घपला 2005 का है जिसमें एनटीसी ने ज्युटीपर मिल को 11 एकड़ जमीन बेची. एनटीसी ने जब जमीन बेचने के लिए भाव मंगवाए तब टेण्डर में घोषित किया था कि एमएसआय करीब 6.4 लाख वर्ग फिट रहेगा. इस आधार पर इण्डियाबुल्स ने 276 करोड़ रूपए लगाए. लेकिन मिल की जमीन लेने पर एमएसआय दुगुना हुआ. कानून के हिसाब से देखा जाए तो `शहरी जमीन कानून की धारा 26´ के मुताबिक जमीन बेचने से पहले मंडल से इजाजत लेनी जरूरी थी. लेकिन यह जमीन बिना इजाजत बेची गई. ऐसे ही घपले कर शहर के बीचोंबीच करीब 600 एकड़ जमीन पर माल, शापिंग काम्लेक्स, बंग्ले और प्राइवेट आफिस बनाए जा रहे हैं. उन्होंने मीठी नदी को भी नहीं छोड़ा. 90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया था जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन बनाई गई. आज काम्पलेक्स की जगह लाखों वर्ग फिट से अधिक फैली हैं जिनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल्स बस गए हैं. इन बिल्डरों ने फेरीवालों की जमीनों पर कब्जा किया. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए आरक्षित थी उसे छोटे व्यपारियों से छीन लिया गया है.( www.crykedost.blogspot.com से)
posted by CRY के दोस्त at 1:54 PM on May 12, 2009
इसके विपरीत गरीबों, अनपढ़ों, भिखारियों व किन्नरों को जब जब भी जन सेवा का मौका मिला उन्होंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से यह जिम्मेदारी निभाई। मुजफ्फरनगर के मोरना ब्लाक क्षेत्र के पंचायत चुनाव में स्थानीय लोगों ने एक किन्नर बाला को जिला पंचायत के लिए चुना। यह जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के हर नागरिक के सुख दुख में शामिल होती है। पंचायत की बैठकों में अपने क्षेत्र की समस्याओं के निस्तारण के लिए आवाज उठाती है।क्षेत्र में घूम घूम कर समस्याओं का पता लगाकर अधिकारियों तक पहुंचाती है।इसी प्रकार पुरकाजी ब्लाक के खाई खेड़ा गांव के वासिंदों ने एक भिखारी नट को अपना प्रधान बना दिया। इस प्रधान ने जाति, पक्ष विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठ कर गांव के विकास के कार्य कराए। गांव की समस्याओं को सांसदों, विधायकों व अफसरों तक पहुचाकर उनका निराकरण कराया। सदर ब्लाक के सुजडू गांव में घरों में चूल्हा-चौका व खेत में मजदूरी करने वाली कश्मीरी देवी को प्रधान बना दिया। वह भी अपने साथियों के साथ पूरी निष्ठा और लगन से गांव के विकास में लगी है। इन सभी प्रत्यासियों के चुनाव में धन भी स्थानीय ग्रामीणों ने ही लगाया।(जनसत्ता 8 मई 2009)/ यह विडंबना ही है कि अपने ही देश में अपनी चुनी सरकारों द्वारा पिछले 60सालों से ये गरीब, दमित शोषित ठगे, कुचले जारहे हैं। फिर भी एक दिन इस राजनीति में अपना यथोचित स्थान पाने की उमीद में ये निष्ठा से अपना वोट देते हैं। पर समाज के ठेकेदार इनको दुराग्रह की नजर से देखते हैं।जिस दिन समाज के स्वयंभू भद्रलोक इन गरीब गुरबों के मानवीय गुणों को पहचानने लगेंगे, और भ्रष्ट लोगों के चकाचक सफेद कपड़ों भ्रष्टाचार के दाग देख पाएंगे।साथ ही निसंकोच और निस्वार्थ भाव से उन दागों की ओर अंगुली उठा पाएंगे उस दिन समाज में भ्रष्टाचार व भ्रष्टचारी की मान्यता कम हो जाएगी ।समाज में भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में यह पहला कदम होगा।अनपढ़ गरीब भ्रष्ट नही होता वरन् भ्रष्टाचार का शिकार होता है।
गुरुवार, 7 मई 2009
जनता की समस्या बनाम् नेता का कद
पंद्रहवीं लोक सभा के लिए आम चुनाव हो रहे हैं। देश चारों तरफ से समस्य़ाओं से घिरा है। मंदी की मार से पूरे विश्व में तथा भारतीय समाज के हर वर्ग में हा हाकार मचा है। रोजगार घट रहे हैं। स्वरोजगार समाप्त होरहे हैं। एक अनुमान के अनुसार 2008-09 की आखरी तिमाही में पांच लाख से अधिक लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा।पहले मुद्रास्फीति चरम् पर थी तो अब शून्य पर आगई है। पर खाद्य पदार्थ तथा अंय आवश्यक जिंसों के दाम ऊपर चढ़ते ही जारहे हैं।क्रय शक्ति का ह्रास होने से आम जनजीवन अस्त व्यस्त होगया है।उधर धरती का तापमान बढ़ने से वर्षा अनिश्चत व अनियंत्रित होगई है। कहीं सूखे के कारण पानी के लिए लोग त्राहि त्राहि कर रहे हैं(बुंदेलखंड)। कहीं बाढ़ ने पूरे क्षेत्रवासियों को बेघर कर दिया है।सरकार आम इंसान को राहत पहुचाने में पूरी तरह नाकाम रही है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम(कामन मिनिमम प्रोग्राम) के तहत जो भी लोकहितकारी कार्यक्रम चलाए गए उनका लाभ आम जन के बजाय भ्रष्ट लोगों को हुआ है।ऐसा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट से साफ हो जाता है। 26 नवंबर के आतंकी हमले ने देश की आंतरिक सुरक्षा की पोल खोल दी।आमजन के बढ़ते हासियाकरण की वजह से सर्वत्र असंतोष और मायूसी का वातावरण है। देश के विभिनं भागों से हिंसक आंदोलनों के समाचार आते रहते हैं।
ऐसे में मुख्य विपक्षी दल के सामने मुख्य चुनौती आमजन की हताशा दूर करने की तथा उनमें नईं आशा का संचार करने की न होकर अपने नेता की मजबूती सिद्ध करने की है।मजबूत का मतलब जिम में युवाओं की तरह अपनी मांसपेशियां बनाने के व्यायाम करने में सक्षम होना।अपने नेता को(जो प्रधान मंत्री की कतार में लगे हैं।) कद्दावर दिखाने के लिए आवश्यक है मौजूदा प्रधान मंत्री को कमजोर साबित किया जाय। यह भी कितनी बड़ी विडंबना है कि राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के 81 साल के नेता, भूतपूर्व उप प्रधान मंत्री को अपने देशवासियों को यह विश्वास दिलाने कि वह एक मजबूत नेता है और निर्णायक सरकार देने में सक्षम है, के लिए नारों की, जगह जगह होर्डिंग लगाने की तथा स्वयं व अपने समूचे संगठन को वर्तमान प्रधान मंत्री को कमजोर सिद्ध करने की कवायद में लगाना पड़ रहा है।यह इस देश की वर्तमान पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि लगभग सौ साल के स्वतंत्रता संग्राम में जिस देश में एक से बढ़कर एक कद्दावर नेता हुए।(उन नेताओं ने अपना ऊँचा कद प्रचार से या दूसरे को नीचा दिखाकर नहीं हासिल किया वरन् अपने शुभ कार्यों अपने बलिदानों से पाया। यह भी प्रासंगिक है कि ये नेक काम और बलिदान भी उन्होंने अपना कद बड़ा बनाने नहीं किए बल्कि देश और जनता के हित में किये।)उस देश की युवा पीढ़ी का पाला एक ऐसे प्रधान मंत्री के उंमीदवार से पड़ा है जिसे 81 साल का आयु में खुद को कद्दावर नेता सिद्ध करना पड़ रहा है।अपने गृह मंत्री व उप प्रधान मंत्री के कार्यकाल में वह अपने को लौह पुरुष कहलाना पसंद करते थे।बाद में उन्हीं की पार्टी के एक मुख्य मंत्री भी इस दौड़ में उनके साथ शामिल होगए.(इस देश की जनता ने जिस एक मात्र महान हस्ती को लौहपुरुष के संमान से नवाजा उस सरदार पटेल ने विभाजन की त्रासदी झेल रहे भारतवर्ष को और टुकड़ों में टूटने से अपनी दूरदृष्टि व अपने सफल प्रयासों से बचा लिया। अपने देश का वर्तमान स्वरूप उन्ही के अथक प्रयासों की वजह से हासिल हुआ है। इसीलिए आम जन के मानसपटल पर उनकी लौहपुरुष की अमिट छाप पड़ी है। इसके विपरीत आडवाणी ने सत्ता पर काबिज होने के लिए राम पर करोड़ों हिंदुओं की आस्था को भुनाने के लिए राम रथ यात्रा नहीं निकाली। भड़काऊ भाषण दिए। परिणामस्वरूप जगह जगह दंगे फसाद हुए। समाज का ताना बाना ऐसा टूटा कि जिनके भयानक परिणामों से आज भी समाज उबर नहीं पाया है।)
खैर सिद्ध करने और नकारने की इस जद्दोजहद में आखिर प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुंह खोला और उप प्रधान मंत्री तथा गृह मंत्री की भूमिका में आडवाणी जी की उपलब्धियां गिना डाली। एक बार प्रधान मंत्री का मुंह खुला तो खुलता ही चला गया। नम्र, मृदुभाषी मनमोहन सिंह का धैर्य भी चौतरफा व अनवरत लांछनों को सुनते सुनते शायद जवाब देगया। उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराने में भूतपूर्व उप प्रधान मंत्री की भूमिका का मुद्दा उछाल दिया। आहत आडवाणी को यह पलटवार नागवार लगा। (यही मजबूत नेता की पहचान है।अपने विरोधियों को तो वह पानी पी पी कर कोसे। अनर्गल इल्जाम लगाए। पर जब स्वयं उस पर वार पड़े तो है बिलबिला जाए।)लेकिन उन्होंने जवाब में कोई सफाई नहीं दी।इस प्रकार उन्होंने अपनी महानता सिद्ध करने का एक मौका खो दिया।
हालांकि आडवाणी ने कई जगह बोला और लिखा है कि 6 दिसम्बर 1992 का दिन उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था। पर जो लोग 6 दिसम्बर 1992 को अपनी ड्यूटी की वजह से आडवाणी या बाबरी मस्जिद के आसपास थे उनके अदालत में दिए बयान ऐसा कुछ भी नहीं दर्शाते।मसलन् 16 मई 2001 की यू एन आई की रपट के अनुसार बिजिनैस इंडिया की तत्कालीन संवाददाता रुचिरा गुप्ता ने लिब्राहन आयोग को बताया कि जब .बाबरी मस्जिद का ध्वंस होरहा था। भारतीय जनता पार्टी के नेता 'jubilant मूड में थे। तब आडवाणी ने इस घटना को ऐतिहासिक बताया था।अपनी आंखों देखी बताते हुए रुचिरा गुप्ता ने कहा कि जब कार सेवक गुम्बद पर चढ़ रह थे आडवाणी ने कहा कि उनको ऊपर नहीं चढ़ना चाहिए। ढ़ाचा तो गिरने ही वाला था। आडवाणी को आशंका थी कि ढ़ाचा गिरने से कार सेवकों को चोट लग सकती थी। रुचिरा गुप्ता ने आयोग को बताया कार सेवक मस्जिद के भीतर फोटो खींच रहे संवाददाताओं से मार पीट कर रहे थे उनके कैमरे छीन रहे थे तोड़ रहे थे। था।गुप्ता ने यह भी बताया कि आचार्य नरेंद्र ने आड़वाणी के साथ बात कर कार सेवकों को हिदायत दी कि फोटोग्राफरों को मस्जिद तोड़ने की फोटो नहीं लेने दी जांय।गुप्ता ने कार सेवकों की हिंसा का शिकार हुए संवाददाताओं के नाम भी आयोग को बताए। रुचिरा गुप्ता ने आयोग को यह भी बताया कि वह स्वयं कार सेवकों की हिंसा का शिकार होते होते बची थी।(वह मस्जिद के भीतर वहां होरही गतिबिधियों को जानने घुसी तो उन्हें मुसलमान बता कर कार सेवक मारने दौड़े।इस भीड़ में एक कार सेवक उनको जानता था उसी ने रुचिरा गुप्ता की जान बचाई।) रुचिरा गुप्ता ने आडवाणी से कार सेवकों को संवाददाताओं से मार पीट नहीं करने का निर्देश देने के आग्रह किया पर आडवाणी ने रुचिरा गुप्ता की बात पर ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय रुचिरा गुप्ता को कहा इतना बड़ा दिन है चीनी खाओ और चीनी खाने को दी।उस समय वहां उपस्थित सभी को चीनी खाने को(खुशी के मौके पर मुंह मीठा करने को)दी जा रही थी। आडवाणी ने कार सेवकों को केन्द्रीय सुरक्षा बल के मस्जिद तक पहुचने के मार्ग को बैंच डाल कर व स्वंय लेट कर बाधित करने की भी हिदायत दी। रुचिरा गुप्ता ने आयोग को यह भी बताया कि उसने बाबरी मस्जिद के पास के कुछ घरो,व दुकानों को जलते हुए देखा और आडवाणी से पूछा कि उन घरो व, दुकानों को क्यों जलाया जारहा था। आडवाणी का उत्तर था कि मुसलमान खुद ही मुआवजा पाने के लिए अपने घरों और दुकानों में आग लगा रहे थे। जब रुचिरा गुप्ता ने कहा की स्थिति भयावह हो सकती है उन लोगों वापस जाने में समस्या हो सकती है आडवाणी को लोगों को रोकना चाहिये। इस अनुरोध के जवाब में कार सेवकों हिंसा करने से रोकने के बजाय आडवाणी ने पूछा उनकी सुरक्षा में लगे राष्टीय सुरक्षा गार्ड कहां हैं और राष्टीय सुरक्षा गार्डों की सुरक्षा में वहां से चले गए।
रुचिरा गुप्ता ने बताया कि 5 दिसम्बर 1992 को विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने खबरनवीसों को कार सेवा स्थल घुमाया और बताया कि उड़ीसा से एक इंजीनियर कुछ निर्धारित कार सेवकों को गुम्बद को धाराशाई करने के लिए किन किन बिंदुओं से तोड़ना आरंभ किया जाय यह दिशा निर्देश देने के लिए विशेषरूप से बुलाया गया था। रुचिरा गुप्ता ने आगे जोड़ा कि उसके प्रश्न के उत्तर में संबंधित कारसेवक ने बताया कि मस्जिद तोड़ने की उनकी तैयारी पूरी थी। लेकिन तोड़ने का अंतिम निर्णय लेने का जिम्मा नेताओं का था। इससे पहले दिसंबर 3,4,5 1992 को आडवाणी ने कई सभाऐं की और कार सेवकों को दिसंबर 6 को अयोध्या पहुंचने का अनुरोध किया। आडवाणी ने कार सेवकों को बताया कि वहां वे लोग भजन कीर्तन या झाड़ू पोछा करने नहीं जा रहे थे। वहां वे लोग कार सेवा करने जारहे थे। उन्होंने लोगों को यह कसम भी दिलवाई कसम राम की खाते हैं कि मंदिर वहीं बनाएंगे।तत्कालीन बी बी सी संवाददाता ने आयोग को बताया कि बाबरी गिराते समय वहां पर jubilation का वातावरण था। जब गुम्बद तोड़े जारहे थे आडवाणी चुप थे उन्होंने भीड़ को रोकने की कोशिश नहीं थी। हालांकि भीड़ व्यवस्थित थी बेकाबू नहीं थी। (UNI http://www.rediff.com/news/2001/may/16ad.htm)
14 मई 2001 को स्वंय श्री आडवाणी ने लिब्राहम आयोग के सामने गवाही दी। आडवाणी ने अपने अयोध्या में राम मंदिर बनाने के आंदोलन का ठीकरा तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी की सरकार पर फोड़ा। कारण राजीव गांधी की सरकार ने ही राम मंदिर के कपाट खोलने के तथा मंदिर के शिलान्यास करने का निर्णय लिया था।आडवाणी ने जोड़ा की सत्तासीन कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति के चलते मंदिर बनाने का उपक्रम कर रही थी। इसीलिए उनके संगठन ने अयोध्या प्रस्ताव पास किया। ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में मजबूत नेता हमेशा अपने दुष्कर्मों असफलताओँ के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। (UNI http://www.rediff.com/news/2001/may/14ad.htm) आज (25, 04, 09) को एक टी वी चैनल ने आर. एस. एस के के एस सुदर्शन को उदृत करते हुए कहा कि सुदर्शन कहते हैं कि बाबरी मस्जिद तोड़ने में मुख्य भूमिका तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिह राव की थी।
15 दिसम्बर 2004 को सी बी आई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच को बताया कि लाल कृष्ण आडवाणी को बाबरी मस्जिद गिराए जाने की पूर्व जानकारी थी। 6 दिसम्बर 1992 को फैजाबाद की अतिरिक्त पुलिस सुप्रिटैंन्डैंन्ट अंजू गुप्ता की ड्यूटी आडवाणी की सुरक्षा में लगी थी। गुप्ता ने अपने बयान में बताया कि आडवाणी अंजू गुप्ता से मस्जिद को भीतर चल रही गतिविधियों की समय समय पर जानकारी ले रहे थे। मस्जिद के तीनों गुम्बद तोड़ने वाले कार सेवकों का समूह एक ही था। (PTI http://news.indiainfo.com/2004/12/15/1512advanibabri.html)
निर्णायक सरकार देने की हैसियत रखने वाले मजबूत नेता से इस देश के हर जाति, धर्म, वर्ग, लिंग के लोगों को यह अपेक्षा है कि बाबरी मस्जिद ध्वंस करने में वह अपनी भूमिका का ईमानदारी से खुलासा करें। कारण जैसा कि मशहूर गांधी-विचारनिष्ठ शैलेशकुमार वद्योपाध्याय बताते हैं कि बाबरी मस्जिद ध्वंस होने के दो माह बाद तक पूरा देश सांप्रदायिकता के नासूर की टीस से कराहता रहा। हजारों लोगों की जानें गईं करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के पारंपरिक , ऐतिहासिक सौहार्द को ठेस पहुंची। आज भी बहुत सारे लोग इसकी अभिशप्त छाया की काली यादों में जीवन जीने मजबूर हैं। इस घटना के बाद भारतीय समाज का तेजी से अपराधीकरण हुआ। भूमाफिया, अपराध की दुनियां के लोग (अण्डरवर्ल्ड डान),व असामाजिक तत्व संगठित रूप से राजनीतिक दलों की छत्रछाया में देश की कानून – व्यवस्था पर हावी हो गए हैं। इस घटना के बाद जन मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। दंगा प्रभावित इलाकों में हिंदू-मुसलमान मन बटे हैं। एक राष्ट्र के तौर पर बुनी गई हमारी राष्ट्रीयता भी इन दंगों से बूरी तरह प्रभावित हुई है।अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया है।यदि हिंदुत्व लाने के नाम पर बहुसंख्यक इसी रास्ते पर चलने को उद्धत रहे तो भारत में अल्पसंख्यकों की गरिमा, सम्मान सुरक्षित नहीं रह सकता। ऐसा भय अल्पसंख्यकों के मन में बैठ गया है। भयभीत होने की वजह भी है।जब जब अल्पसंख्यकों पर संकट आया धर्म निरपेक्षता, प्रजातंत्र, मानव-अधिकार, कानून-सम्मत शासन , एकता का आह्वान केवल कथनी के स्तर पर होता है।(शैलेशकुमार वद्योपाध्याय, दंगों का इतिहास,वाराणसी,सर्व सेवा संघ, 2000, पृष्ट सं.1-4) करनी के स्तर पर कानून व्यवस्था , नागरिक सेवाओँ के लिए जिंमेदार तंत्र कुछ मामलों में न्यायिक व्यवस्था भी दंगाइयों या दंगा भड़काने वालों के पीछे खड़े दिखते हैं। वरुण गांधी को राहत देने में जिस तरह की तत्परता न्यायिक तंत्र ने दिखाई वैसी तत्परता डा.विनायक सेन या मनीपुर की इरोम शर्मीला के मामले में नहीं दिखी। बल्कि उन मामलों न्यायिक तंत्र उदासीन रहा है। डा.विनायक सेन के जमानत के मामले में कहा जारहा कि माननीय अदालत ने बहस तक की अनुमति नहीं दी। यह तब होरहा है जब देश के नामी वकील उनकी पैरवी करने तैयार हैं। 2002 के गुजरात दंगों में अलबत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने पीड़ितों का व्यवस्था में विश्वास वापस लौटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
नेता की मजबूती तो मानसिक होगी, नैतिक होगी न कि जिम में ढ़ाली गई मांसल। इसका दर्शन दूसरों की कमजोरियों का डंका पीटने से अधिक अपनी कमजोरियों के आंकलन में होना चाहिए।इस देश में कबीर हुए हैं जिनका संदेश था बूरा जो देखन चला बूरा दिखा न कोय।जो दिल खोजो आपनो मुझसो बूरो न कोय।यह देश आडवाणी के मजबूत नेता तथा निर्णायक सरकार देने दावे पर तभी विश्वास करेगा जब वह बाबरी मस्जिद मसले पर, गुजरात दंगों के मसले पर, कंधमाल के दंगों पर अपनी और अपनी पार्टी जिंमेदारी का ईमानदार आंकलन करें अपनी गल्ती मानें, गल्ती सुधारने के लिए क्या कदम उठाएंगे यह बताएं।अपने व्यवहार से यह दर्शायें कि उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है। आखिर अशोक कलिंग विजय के बाद हुए हृदय परिवर्तन के बाद ही महान सम्राट बने थे। (कलिंग में बरपाई हिंसा की वजह से नहीं।)यह हृदय परिवर्तन उनकी करनी और कथनी दोनों साफ दिखा।
यह कदम अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने के लिए ही आवश्यक नही है वरन् उन हजारों लाखों लोगों का टूटा विश्वास जोड़ने (यदि जोड़ना संभव है तो) के लिए आवश्यक है जिन्होंने आडवाणी के राम मंदिर बनाने के इरादे में विश्वास किया होगा और आडवाणी द्वारा चलाए आंदोलनों को सफल बनाने में योगदान दिया होगा। पर जब 6 साल केन्द्र में सत्ता में रहने पर भी मंदिर नही बना तो स्वंय को ठगा महसूस कर रहे होंगे। चूंकि हमारे तंत्र में ऐसे लोगों की भड़ास मापने का कोई यंत्र नहीं है। उन लाखों बे-जुबान ठगे गए लोगों के एहसास हम तक नहीं पहुचते। ठगे जाने का यह ऐहसास कितना व्यापक है यह आडवाणी पर खड़ाऊ फैकने वाले व्यक्ति के उदगारों से साफ हो जाता है। उसने भी तो कथनी और करनी में फरक होने का ही इल्जाम लगाया । जब अपने लोगों में ही नैतिकता के मापदंडों को लेकर शक सुबहा है तो आमजन कैसे विश्वास कर सकता है कि भारतीय जनता पार्टी निर्णायक सरकार देसकती है। अभी जो छबि है उसके अनुसार यह पार्टी चुनाव जीतने के लिए उनके मुद्दे उठाने के बजाय धार्मिक उन्माद फैला कर लोगों को आपस में बाटने की कोशिश करती है ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो और बहुमत के बल पर सत्ता मिल जाय।
आवश्यकता है लोकोपकारी नीतियों की—भारत में संसदीय लोकतंत्र है। यहां सरकार नेता नही चलाता वरन् संसद में बहुमत हासिल करने वाला राजनीतिक दल या दलों का गठबंधन चलाता है। इसलिए आम जनता के लिए अहम मुद्दा नेता की मजबूती या कमजोरी नहीं है। आम लोगों के लिए तो चुनाव लड़ने वाले दलों की नीतियां महत्वपूर्ण हैं। यह प्रत्येक राजनीतिक दल को तय करना है कि अपने किस नेता के नेतृत्व में वह अपनी नीतियों का कुशलता से क्रियांवयन करवा सकता है। लेकिन भाजपा ने अपने वरिष्टतम नेता के नेतृत्व में इस चुनाव को आडवाणी और मनमोहन सिंह दो व्यक्तियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई बना दिया है। इस दल के प्रधान मंत्री पद के दावेदार और स्टार प्रचारक मनमोहन सिंह की वास्तविक या काल्पनिक कमजोरियां गिनाकर उन पर तरस खाकर अपने लिए जन समर्थन मांग रहे हैं।इस दल के एक स्टार प्रचारक जो मुख्य मंत्री भी हैं ने तो मनमोहन सिंह पर सरदार होकर भी पाकिस्तान में रह रहे सरदारों की सुरक्षा के लिए कदम नहीं उठाने का आरोप जड़ दिया।इस देश के संविधान के तहत कोई भी सरकारी मुलाजिम किसी भी धर्म जाति का न होकर भारतीय नागरिक होता है और उसे भारत तथा भारतवासियों के हितों की रक्षा करनी होती है।
ऐसे में मुख्य विपक्षी दल के सामने मुख्य चुनौती आमजन की हताशा दूर करने की तथा उनमें नईं आशा का संचार करने की न होकर अपने नेता की मजबूती सिद्ध करने की है।मजबूत का मतलब जिम में युवाओं की तरह अपनी मांसपेशियां बनाने के व्यायाम करने में सक्षम होना।अपने नेता को(जो प्रधान मंत्री की कतार में लगे हैं।) कद्दावर दिखाने के लिए आवश्यक है मौजूदा प्रधान मंत्री को कमजोर साबित किया जाय। यह भी कितनी बड़ी विडंबना है कि राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के 81 साल के नेता, भूतपूर्व उप प्रधान मंत्री को अपने देशवासियों को यह विश्वास दिलाने कि वह एक मजबूत नेता है और निर्णायक सरकार देने में सक्षम है, के लिए नारों की, जगह जगह होर्डिंग लगाने की तथा स्वयं व अपने समूचे संगठन को वर्तमान प्रधान मंत्री को कमजोर सिद्ध करने की कवायद में लगाना पड़ रहा है।यह इस देश की वर्तमान पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि लगभग सौ साल के स्वतंत्रता संग्राम में जिस देश में एक से बढ़कर एक कद्दावर नेता हुए।(उन नेताओं ने अपना ऊँचा कद प्रचार से या दूसरे को नीचा दिखाकर नहीं हासिल किया वरन् अपने शुभ कार्यों अपने बलिदानों से पाया। यह भी प्रासंगिक है कि ये नेक काम और बलिदान भी उन्होंने अपना कद बड़ा बनाने नहीं किए बल्कि देश और जनता के हित में किये।)उस देश की युवा पीढ़ी का पाला एक ऐसे प्रधान मंत्री के उंमीदवार से पड़ा है जिसे 81 साल का आयु में खुद को कद्दावर नेता सिद्ध करना पड़ रहा है।अपने गृह मंत्री व उप प्रधान मंत्री के कार्यकाल में वह अपने को लौह पुरुष कहलाना पसंद करते थे।बाद में उन्हीं की पार्टी के एक मुख्य मंत्री भी इस दौड़ में उनके साथ शामिल होगए.(इस देश की जनता ने जिस एक मात्र महान हस्ती को लौहपुरुष के संमान से नवाजा उस सरदार पटेल ने विभाजन की त्रासदी झेल रहे भारतवर्ष को और टुकड़ों में टूटने से अपनी दूरदृष्टि व अपने सफल प्रयासों से बचा लिया। अपने देश का वर्तमान स्वरूप उन्ही के अथक प्रयासों की वजह से हासिल हुआ है। इसीलिए आम जन के मानसपटल पर उनकी लौहपुरुष की अमिट छाप पड़ी है। इसके विपरीत आडवाणी ने सत्ता पर काबिज होने के लिए राम पर करोड़ों हिंदुओं की आस्था को भुनाने के लिए राम रथ यात्रा नहीं निकाली। भड़काऊ भाषण दिए। परिणामस्वरूप जगह जगह दंगे फसाद हुए। समाज का ताना बाना ऐसा टूटा कि जिनके भयानक परिणामों से आज भी समाज उबर नहीं पाया है।)
खैर सिद्ध करने और नकारने की इस जद्दोजहद में आखिर प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुंह खोला और उप प्रधान मंत्री तथा गृह मंत्री की भूमिका में आडवाणी जी की उपलब्धियां गिना डाली। एक बार प्रधान मंत्री का मुंह खुला तो खुलता ही चला गया। नम्र, मृदुभाषी मनमोहन सिंह का धैर्य भी चौतरफा व अनवरत लांछनों को सुनते सुनते शायद जवाब देगया। उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराने में भूतपूर्व उप प्रधान मंत्री की भूमिका का मुद्दा उछाल दिया। आहत आडवाणी को यह पलटवार नागवार लगा। (यही मजबूत नेता की पहचान है।अपने विरोधियों को तो वह पानी पी पी कर कोसे। अनर्गल इल्जाम लगाए। पर जब स्वयं उस पर वार पड़े तो है बिलबिला जाए।)लेकिन उन्होंने जवाब में कोई सफाई नहीं दी।इस प्रकार उन्होंने अपनी महानता सिद्ध करने का एक मौका खो दिया।
हालांकि आडवाणी ने कई जगह बोला और लिखा है कि 6 दिसम्बर 1992 का दिन उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था। पर जो लोग 6 दिसम्बर 1992 को अपनी ड्यूटी की वजह से आडवाणी या बाबरी मस्जिद के आसपास थे उनके अदालत में दिए बयान ऐसा कुछ भी नहीं दर्शाते।मसलन् 16 मई 2001 की यू एन आई की रपट के अनुसार बिजिनैस इंडिया की तत्कालीन संवाददाता रुचिरा गुप्ता ने लिब्राहन आयोग को बताया कि जब .बाबरी मस्जिद का ध्वंस होरहा था। भारतीय जनता पार्टी के नेता 'jubilant मूड में थे। तब आडवाणी ने इस घटना को ऐतिहासिक बताया था।अपनी आंखों देखी बताते हुए रुचिरा गुप्ता ने कहा कि जब कार सेवक गुम्बद पर चढ़ रह थे आडवाणी ने कहा कि उनको ऊपर नहीं चढ़ना चाहिए। ढ़ाचा तो गिरने ही वाला था। आडवाणी को आशंका थी कि ढ़ाचा गिरने से कार सेवकों को चोट लग सकती थी। रुचिरा गुप्ता ने आयोग को बताया कार सेवक मस्जिद के भीतर फोटो खींच रहे संवाददाताओं से मार पीट कर रहे थे उनके कैमरे छीन रहे थे तोड़ रहे थे। था।गुप्ता ने यह भी बताया कि आचार्य नरेंद्र ने आड़वाणी के साथ बात कर कार सेवकों को हिदायत दी कि फोटोग्राफरों को मस्जिद तोड़ने की फोटो नहीं लेने दी जांय।गुप्ता ने कार सेवकों की हिंसा का शिकार हुए संवाददाताओं के नाम भी आयोग को बताए। रुचिरा गुप्ता ने आयोग को यह भी बताया कि वह स्वयं कार सेवकों की हिंसा का शिकार होते होते बची थी।(वह मस्जिद के भीतर वहां होरही गतिबिधियों को जानने घुसी तो उन्हें मुसलमान बता कर कार सेवक मारने दौड़े।इस भीड़ में एक कार सेवक उनको जानता था उसी ने रुचिरा गुप्ता की जान बचाई।) रुचिरा गुप्ता ने आडवाणी से कार सेवकों को संवाददाताओं से मार पीट नहीं करने का निर्देश देने के आग्रह किया पर आडवाणी ने रुचिरा गुप्ता की बात पर ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय रुचिरा गुप्ता को कहा इतना बड़ा दिन है चीनी खाओ और चीनी खाने को दी।उस समय वहां उपस्थित सभी को चीनी खाने को(खुशी के मौके पर मुंह मीठा करने को)दी जा रही थी। आडवाणी ने कार सेवकों को केन्द्रीय सुरक्षा बल के मस्जिद तक पहुचने के मार्ग को बैंच डाल कर व स्वंय लेट कर बाधित करने की भी हिदायत दी। रुचिरा गुप्ता ने आयोग को यह भी बताया कि उसने बाबरी मस्जिद के पास के कुछ घरो,व दुकानों को जलते हुए देखा और आडवाणी से पूछा कि उन घरो व, दुकानों को क्यों जलाया जारहा था। आडवाणी का उत्तर था कि मुसलमान खुद ही मुआवजा पाने के लिए अपने घरों और दुकानों में आग लगा रहे थे। जब रुचिरा गुप्ता ने कहा की स्थिति भयावह हो सकती है उन लोगों वापस जाने में समस्या हो सकती है आडवाणी को लोगों को रोकना चाहिये। इस अनुरोध के जवाब में कार सेवकों हिंसा करने से रोकने के बजाय आडवाणी ने पूछा उनकी सुरक्षा में लगे राष्टीय सुरक्षा गार्ड कहां हैं और राष्टीय सुरक्षा गार्डों की सुरक्षा में वहां से चले गए।
रुचिरा गुप्ता ने बताया कि 5 दिसम्बर 1992 को विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने खबरनवीसों को कार सेवा स्थल घुमाया और बताया कि उड़ीसा से एक इंजीनियर कुछ निर्धारित कार सेवकों को गुम्बद को धाराशाई करने के लिए किन किन बिंदुओं से तोड़ना आरंभ किया जाय यह दिशा निर्देश देने के लिए विशेषरूप से बुलाया गया था। रुचिरा गुप्ता ने आगे जोड़ा कि उसके प्रश्न के उत्तर में संबंधित कारसेवक ने बताया कि मस्जिद तोड़ने की उनकी तैयारी पूरी थी। लेकिन तोड़ने का अंतिम निर्णय लेने का जिम्मा नेताओं का था। इससे पहले दिसंबर 3,4,5 1992 को आडवाणी ने कई सभाऐं की और कार सेवकों को दिसंबर 6 को अयोध्या पहुंचने का अनुरोध किया। आडवाणी ने कार सेवकों को बताया कि वहां वे लोग भजन कीर्तन या झाड़ू पोछा करने नहीं जा रहे थे। वहां वे लोग कार सेवा करने जारहे थे। उन्होंने लोगों को यह कसम भी दिलवाई कसम राम की खाते हैं कि मंदिर वहीं बनाएंगे।तत्कालीन बी बी सी संवाददाता ने आयोग को बताया कि बाबरी गिराते समय वहां पर jubilation का वातावरण था। जब गुम्बद तोड़े जारहे थे आडवाणी चुप थे उन्होंने भीड़ को रोकने की कोशिश नहीं थी। हालांकि भीड़ व्यवस्थित थी बेकाबू नहीं थी। (UNI http://www.rediff.com/news/2001/may/16ad.htm)
14 मई 2001 को स्वंय श्री आडवाणी ने लिब्राहम आयोग के सामने गवाही दी। आडवाणी ने अपने अयोध्या में राम मंदिर बनाने के आंदोलन का ठीकरा तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी की सरकार पर फोड़ा। कारण राजीव गांधी की सरकार ने ही राम मंदिर के कपाट खोलने के तथा मंदिर के शिलान्यास करने का निर्णय लिया था।आडवाणी ने जोड़ा की सत्तासीन कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति के चलते मंदिर बनाने का उपक्रम कर रही थी। इसीलिए उनके संगठन ने अयोध्या प्रस्ताव पास किया। ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में मजबूत नेता हमेशा अपने दुष्कर्मों असफलताओँ के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। (UNI http://www.rediff.com/news/2001/may/14ad.htm) आज (25, 04, 09) को एक टी वी चैनल ने आर. एस. एस के के एस सुदर्शन को उदृत करते हुए कहा कि सुदर्शन कहते हैं कि बाबरी मस्जिद तोड़ने में मुख्य भूमिका तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिह राव की थी।
15 दिसम्बर 2004 को सी बी आई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच को बताया कि लाल कृष्ण आडवाणी को बाबरी मस्जिद गिराए जाने की पूर्व जानकारी थी। 6 दिसम्बर 1992 को फैजाबाद की अतिरिक्त पुलिस सुप्रिटैंन्डैंन्ट अंजू गुप्ता की ड्यूटी आडवाणी की सुरक्षा में लगी थी। गुप्ता ने अपने बयान में बताया कि आडवाणी अंजू गुप्ता से मस्जिद को भीतर चल रही गतिविधियों की समय समय पर जानकारी ले रहे थे। मस्जिद के तीनों गुम्बद तोड़ने वाले कार सेवकों का समूह एक ही था। (PTI http://news.indiainfo.com/2004/12/15/1512advanibabri.html)
निर्णायक सरकार देने की हैसियत रखने वाले मजबूत नेता से इस देश के हर जाति, धर्म, वर्ग, लिंग के लोगों को यह अपेक्षा है कि बाबरी मस्जिद ध्वंस करने में वह अपनी भूमिका का ईमानदारी से खुलासा करें। कारण जैसा कि मशहूर गांधी-विचारनिष्ठ शैलेशकुमार वद्योपाध्याय बताते हैं कि बाबरी मस्जिद ध्वंस होने के दो माह बाद तक पूरा देश सांप्रदायिकता के नासूर की टीस से कराहता रहा। हजारों लोगों की जानें गईं करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के पारंपरिक , ऐतिहासिक सौहार्द को ठेस पहुंची। आज भी बहुत सारे लोग इसकी अभिशप्त छाया की काली यादों में जीवन जीने मजबूर हैं। इस घटना के बाद भारतीय समाज का तेजी से अपराधीकरण हुआ। भूमाफिया, अपराध की दुनियां के लोग (अण्डरवर्ल्ड डान),व असामाजिक तत्व संगठित रूप से राजनीतिक दलों की छत्रछाया में देश की कानून – व्यवस्था पर हावी हो गए हैं। इस घटना के बाद जन मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। दंगा प्रभावित इलाकों में हिंदू-मुसलमान मन बटे हैं। एक राष्ट्र के तौर पर बुनी गई हमारी राष्ट्रीयता भी इन दंगों से बूरी तरह प्रभावित हुई है।अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया है।यदि हिंदुत्व लाने के नाम पर बहुसंख्यक इसी रास्ते पर चलने को उद्धत रहे तो भारत में अल्पसंख्यकों की गरिमा, सम्मान सुरक्षित नहीं रह सकता। ऐसा भय अल्पसंख्यकों के मन में बैठ गया है। भयभीत होने की वजह भी है।जब जब अल्पसंख्यकों पर संकट आया धर्म निरपेक्षता, प्रजातंत्र, मानव-अधिकार, कानून-सम्मत शासन , एकता का आह्वान केवल कथनी के स्तर पर होता है।(शैलेशकुमार वद्योपाध्याय, दंगों का इतिहास,वाराणसी,सर्व सेवा संघ, 2000, पृष्ट सं.1-4) करनी के स्तर पर कानून व्यवस्था , नागरिक सेवाओँ के लिए जिंमेदार तंत्र कुछ मामलों में न्यायिक व्यवस्था भी दंगाइयों या दंगा भड़काने वालों के पीछे खड़े दिखते हैं। वरुण गांधी को राहत देने में जिस तरह की तत्परता न्यायिक तंत्र ने दिखाई वैसी तत्परता डा.विनायक सेन या मनीपुर की इरोम शर्मीला के मामले में नहीं दिखी। बल्कि उन मामलों न्यायिक तंत्र उदासीन रहा है। डा.विनायक सेन के जमानत के मामले में कहा जारहा कि माननीय अदालत ने बहस तक की अनुमति नहीं दी। यह तब होरहा है जब देश के नामी वकील उनकी पैरवी करने तैयार हैं। 2002 के गुजरात दंगों में अलबत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने पीड़ितों का व्यवस्था में विश्वास वापस लौटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
नेता की मजबूती तो मानसिक होगी, नैतिक होगी न कि जिम में ढ़ाली गई मांसल। इसका दर्शन दूसरों की कमजोरियों का डंका पीटने से अधिक अपनी कमजोरियों के आंकलन में होना चाहिए।इस देश में कबीर हुए हैं जिनका संदेश था बूरा जो देखन चला बूरा दिखा न कोय।जो दिल खोजो आपनो मुझसो बूरो न कोय।यह देश आडवाणी के मजबूत नेता तथा निर्णायक सरकार देने दावे पर तभी विश्वास करेगा जब वह बाबरी मस्जिद मसले पर, गुजरात दंगों के मसले पर, कंधमाल के दंगों पर अपनी और अपनी पार्टी जिंमेदारी का ईमानदार आंकलन करें अपनी गल्ती मानें, गल्ती सुधारने के लिए क्या कदम उठाएंगे यह बताएं।अपने व्यवहार से यह दर्शायें कि उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है। आखिर अशोक कलिंग विजय के बाद हुए हृदय परिवर्तन के बाद ही महान सम्राट बने थे। (कलिंग में बरपाई हिंसा की वजह से नहीं।)यह हृदय परिवर्तन उनकी करनी और कथनी दोनों साफ दिखा।
यह कदम अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने के लिए ही आवश्यक नही है वरन् उन हजारों लाखों लोगों का टूटा विश्वास जोड़ने (यदि जोड़ना संभव है तो) के लिए आवश्यक है जिन्होंने आडवाणी के राम मंदिर बनाने के इरादे में विश्वास किया होगा और आडवाणी द्वारा चलाए आंदोलनों को सफल बनाने में योगदान दिया होगा। पर जब 6 साल केन्द्र में सत्ता में रहने पर भी मंदिर नही बना तो स्वंय को ठगा महसूस कर रहे होंगे। चूंकि हमारे तंत्र में ऐसे लोगों की भड़ास मापने का कोई यंत्र नहीं है। उन लाखों बे-जुबान ठगे गए लोगों के एहसास हम तक नहीं पहुचते। ठगे जाने का यह ऐहसास कितना व्यापक है यह आडवाणी पर खड़ाऊ फैकने वाले व्यक्ति के उदगारों से साफ हो जाता है। उसने भी तो कथनी और करनी में फरक होने का ही इल्जाम लगाया । जब अपने लोगों में ही नैतिकता के मापदंडों को लेकर शक सुबहा है तो आमजन कैसे विश्वास कर सकता है कि भारतीय जनता पार्टी निर्णायक सरकार देसकती है। अभी जो छबि है उसके अनुसार यह पार्टी चुनाव जीतने के लिए उनके मुद्दे उठाने के बजाय धार्मिक उन्माद फैला कर लोगों को आपस में बाटने की कोशिश करती है ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो और बहुमत के बल पर सत्ता मिल जाय।
आवश्यकता है लोकोपकारी नीतियों की—भारत में संसदीय लोकतंत्र है। यहां सरकार नेता नही चलाता वरन् संसद में बहुमत हासिल करने वाला राजनीतिक दल या दलों का गठबंधन चलाता है। इसलिए आम जनता के लिए अहम मुद्दा नेता की मजबूती या कमजोरी नहीं है। आम लोगों के लिए तो चुनाव लड़ने वाले दलों की नीतियां महत्वपूर्ण हैं। यह प्रत्येक राजनीतिक दल को तय करना है कि अपने किस नेता के नेतृत्व में वह अपनी नीतियों का कुशलता से क्रियांवयन करवा सकता है। लेकिन भाजपा ने अपने वरिष्टतम नेता के नेतृत्व में इस चुनाव को आडवाणी और मनमोहन सिंह दो व्यक्तियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई बना दिया है। इस दल के प्रधान मंत्री पद के दावेदार और स्टार प्रचारक मनमोहन सिंह की वास्तविक या काल्पनिक कमजोरियां गिनाकर उन पर तरस खाकर अपने लिए जन समर्थन मांग रहे हैं।इस दल के एक स्टार प्रचारक जो मुख्य मंत्री भी हैं ने तो मनमोहन सिंह पर सरदार होकर भी पाकिस्तान में रह रहे सरदारों की सुरक्षा के लिए कदम नहीं उठाने का आरोप जड़ दिया।इस देश के संविधान के तहत कोई भी सरकारी मुलाजिम किसी भी धर्म जाति का न होकर भारतीय नागरिक होता है और उसे भारत तथा भारतवासियों के हितों की रक्षा करनी होती है।
पप्पू वोट नहीं देता! क्यों?
वोट देना जनतंत्र में हर नागरिक का अधिकार है और कर्तव्य भी। पर पप्पू यानी खाता पीता उच्च वर्ग न अपने मताधिकार का प्रयोग करना आवश्यक समझता और न ही अपने कर्तव्य का पालन करना जरूरी समझता है।यह रोग इतना फैल गया है कि चुनाव आयोग को पप्पू को वोट देने के लिए प्रेरित करने के लिये छोटी छोटी फिल्म बनाकर विज्ञापन भी देने पड़े हैं। 15वीं लोक सभा के चुनाव के समय तो टी वी चैनलों तथा व्यापारिक घरानों ने भी मिलकर पप्पू के वोट देने के फर्ज को निभाने की आवश्यकता को प्रसारित करने की मुहिम चलाई। पर हुए ढाक के वही तीन पात। 26/11/ 2008 के मुंबई के आतंकी हमले के बाद गुस्से से लाल पीला हुए उच्च वर्गीय मुंबईकर जिस तरह से सड़क पर उतर कर आया उससे कुछ लोगों को आशा थी कि इस 15वीं लोक सभा के चुनाव में वह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेगा। पर नहीं लिया। सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाले अभिनेता राहुल बोस जैसे लोग हताश हुए। हों पप्पुओं की बला से। इससे पप्पू को क्या मतलब।
आखिर पप्पू वोट क्यों दे?चुनाव केवल वोट की ताकत ही नहीं दर्शाता वह धनतंत्र की ताकत भी दर्शाता है। एक जमाना था लोक से जुड़े नेता वोट के साथ साथ नोट भी अपने चुनाव क्षेत्र से चुनाव का खर्चा चलाने के लिए मांगते थे और लोग सहर्ष देते थे। चुनाव जीतने के बाद भी इन नेताओं की आर्थिक हालत में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आता था। इस चुनाव के दौरान भी एक टी वी चैनल ने एक पुरानी जन प्रतिनिधि को परिवार के भरण पोषण के लिए अपने पति के साथ पत्थर ढ़ोते दिखाया था। अब जमाना बदल गया है। अब जनतंत्र का ऊर्जा स्त्रोत धनतंत्र होगया है। यदि पारिवारिक विरासत में राजनीतिक हैसियत प्राप्त न हो तो धनतंत्र उसे प्राप्त करने का सबसे सरल रास्ता है। बहुजन समाज पार्टी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। आज तो पैसे से चुनाव लड़ने के लिए टिकट खरीदा जाता है। (बहुजन समाज पार्टी मे यह खुले आम होता है।पिछले 2008 के विधान सभा चुनाव में दो मुख्य राष्ट्रीय दलों पर भी टिकट बेचने के आरोप लगे थे।)टिकट मिलने के बाद तो चुनाव जीतने के लिए हर कदम पर पैसा लगाना होता है। सभाओं व रोड शो करने के लिए भाड़े में लोगों को जुटाना पड़ता है।यह धन कहां से आता है और क्यों आता है।आज आम मतदाता भी यह खूब समझता है।
13वीं लोक सभा के समय तहलका से स्ट्रिंग आपरेशन तथा 14वीं लोक सभा के दौरान हुए विभिन्न स्ट्रिंग आपरेशनों से स्पष्ट हो गया कि तथाकथित जन प्रतिनिधि जनसेवा के मकसद से नहीं धनसेवा के मकसद से चुनकर आते हैं। इसीलिए हम देखते हैं जब भी सांसदों या विधायकों की या निगम स्तर के जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्ते को बढ़ाने के मसले पर सत्तापक्ष कोई प्रस्ताव लाता है उस पर राजनीतिक दलों में कभी कोई मतभेद नहीं होता। सर्वसंमति से ये प्रस्ताव पास होजाते हैं।
धनतंत्र के बल पर चुनाव जीते सभी प्रतिनिधि गैर कानूनी तरीके से ही अपने धनतंत्र को मजबूत करने में विश्वास नहीं करते।उदारीकरण के दौर में जो भी राजनीतिक दल सत्ता में आता है वह देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हित साधने के लिए ही नियम, कानून बनाता है नीति निर्धारित करता है। पिछले 18 सालों के अनुभव से साफ होगया है कि देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हित साधने में राजनीतिक दलों की विचारधारा आड़े नहीं आती।विकास का मतलब भी रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा व स्वास्थ से हटकर बिजली, सड़क व पानी होगया है। यह स्थिति उस जनतंत्र में है जहां एक सरकारी समिति ने अपनी रपट में उजागर किया था कि 80 प्रतिशत जनता की रोजना आमदनी महज 20 रुपया है। एक बात साफ है आम जन को जीवन की मूल सुविधाएं(रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा व स्वास्थ) मुहैय्या कराने से जनता की सेवा करने का दावा करने वाले प्रत्यासी व उनके राजनीतिक दलों को वह लाभ नहीं होता जो देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों को बिजली, सड़क व पानी की सुविधा उपलब्ध कराने में होता है। राजनीतिक दल किस प्रकार विकास के नाम पर देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हाथों इस देश की संपदा ओने पौने दामें में बेच रहे हैं इसका नंगा स्वरूप झारखंड, छत्तीसगड़ तथा उड़ीसा जैसे प्राकृतिक संपदा के धनी राज्यों में देखा जासकता है। अक्सर इस प्रक्रिया में संविधान, नियम व कानूनों को भी ताक पर रख दिया जाता है।आम आदिवासी या वनवासी जिसका अस्तित्व इन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है इसका विरोध कर रहा है और सरकारी तंत्र की ज्यादतियों का शिकार होरहा है। दुर्भाग्य से अक्सर उसे न्यायपालिका से भी राहत नहीं मिल रही है।
विकास के नाम पर पिछले 60 सालों में अपने जल जंगल जमीन के बेदखल होकर जब गरीब रोजी रोटी की खोज में शहर आता है तो यहां उसके लिए झुग्गी बनाने के लिए जगह नहीं है। वह सड़क किनारे रेड़ी लगाकर सब्जी आदि नहीं बेच सकता। अब बड़े बड़े मौल खोले जारहे हैं वहां ये व्यापारिक घराने खुदरा माल बेच रहे हैं। इन मौलों के लिए भी भूमि, बिजली, सड़क पानी चाहिये। पप्पू के हित इन देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हितों से जुड़े हैं।निजीकरण व आउटसोर्सिंग की वजह से महज फर्राटो की अंग्रेजी बोलने वाले पप्पुओं को भी आसानी से नौकरी मिल रही है।मौल उनकी मौज मस्ती की पूरा प्रबंध करते हैं। आखिर मौज मस्ती के लिए एक ही जिंदगी तो है।उस एक ही जिंदगी में चुनाव के दिन मिली एक दिन की छुट्टी वोट देने में कैसे बरबाद की जा सकती है। इतना बड़ा दिल तो पप्पू के पास नहीं हो सकता। दूसरा वोट कोई भी दे। सरकार किसी भी दल की बने पप्पू की हित संरक्षित होता है। कारण पप्पू को नौकरी देने वाली कंपनी के हितों की सुरक्षा करने में ही हमारे जनप्रतिनिधि तन मन धन से लगे होते हैं।
जहां तक आम आदमी का सवाल है उसके लिए मताधिकार अस्तित्व का अधिकार है। उसको मालूम है लोकतंत्र पर धनतंत्र का ग्रहण लगा है और समय के साथ साथ इस ग्रहण का आकार-प्रकार भी बड़ा हो जारहा है । फिर भी वह बहुत सोच समझ कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहा है। मसलन् राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) की सरकार ने जिस तरह एक ओर गोदामों में अनाज सड़ाया या ओने पौने दामों में निर्यात किया पर भूख से मरते लोगों तक नहीं पहुचाया उसी का परिणाम उसे 14वीं लोकसभा के चुनाव में भुगतना पड़ा।इंड़िया शाइनिंग या फील गुड का राजग का नारा धरा का धरा रह गया।नई सरकार को कुछ नीतियां तो आमजन के लिए बनानी पड़ी।यह सच है क्रियांवयन में बहुत गड़बड़िया हैं।उसका खमिजाना यह सरकार भुगतेगी। पूर्ण बहुमत की उमीद तो किसी भी दल को नहीं है। यदि आमजन के हितों की रक्षा के लिए बनी नीतियां ईमांदारी से लागू की गई होती तो क्या यह हताशा होती।धनतंत्र के ग्रहण के बावजूद लोकतंत्र की यही जीत है।
लेकिन पप्पू का वोट देना हम क्यों जरूरी मानते हैं। अति आवश्यक तो है किसी बालिग नागरिक को मताधिकार से वंचित नहीं किया जाय।मुझे नहीं लगता कि कभी इस पर बहस हुई हो कि कैसे उन लाखों (यदि करोड़ों नहीं भी तो) बेघर लोगों को भी यह अधिकार मिले। उदारीकरण के दौर में हमारे शहरों को पेरिस या शांगहाई बनाने की होड़ में कई झुग्गी बस्तियां उजाड़ी गईँ। आवासीय बस्ती टूट जाने से इनके मतदाता पहचान पत्र भी वैलिड नहीं रहे। कई बस्तीवासियों को वैकल्पिक आवासीय जगह नहीं मिलने से इनके नए आवासीय पतों के आधार पर नए मतदाता पहचान पत्र भी नहीं बने हैं।चूंकि ये लोग अनपढ़ हैं, गरीब हैं हम इनके मताधिकार के बारे में चिंतित नहीं हैं। हमें लगता है इनके वोट नहीं देने से लोकतंत्र को कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पप्पू का वोट देना हमें आश्वस्त करता है कि वह सोच समझ कर लायक प्रत्यासी को ही चुनेगा।शायद यह हमारा आमजन के प्रति दुराग्रह ही है। यदि हम भ्रष्टाचार के आकड़ों और प्रकृति पर नजर डालें तो पाऐंगे कि भ्रष्टाचार करने वाले व भ्रष्टाचार को बढ़वा देने वाले अधिकतर लोग मध्यवर्गीय ही हैं। मध्यवर्ग ही गैर कानूनी तरीके से अपने हितों के संवर्धन के लिए घूस देता है या जान पहचान निकालता है। य़दि मध्यवर्ग पिछले दरवाजे से काम कराने बंद कर दे तो भ्रष्टाचार अपने आप कम हो जाएगा। गरीब मजबूरी में ही घूस देता है। चूंकि उसके पास कोई सरकारी ओहदा नहीं होता इसलिए वह घूस नहीं लेता है। घूस सरकारी मुलाजिम लेता है। अभी तो आम धारणा है कि छोटे से छोटा मुलाजिम भी जो घूस लेता है उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है। गरीब तो बाहुबली भी हो नहीं सकता। दूसरा बिना सफेद पोस के संरक्षण के बाहुबली का बजार नहीं फलता फूलता।
यदि लोकतंत्र में धनतंत्र के प्रभाव को कम करना है तो आज जरूरत है आमजन को बिना हील हुज्जत के मतदाता पहचान पत्र मिले। और इस मतदाता में अपने मताधिकार का बिना किसी लाग लपेट के प्रयोग करने का माद्दा जागे।जिस दिन यह मतदाता शराब की बोतलों, साडियों या बिरयानी की दावतों के एवज में मतदान न दे।बल्कि उपलब्ध प्रत्यासियों की सूची में सबसे लायक, तथा सबसे कम भ्रष्ट प्रत्यासी को चुनेंगे उस दिन धनतंत्र पर लोकतंत्र के विजयी होने की शुरुआत होगी।
आखिर पप्पू वोट क्यों दे?चुनाव केवल वोट की ताकत ही नहीं दर्शाता वह धनतंत्र की ताकत भी दर्शाता है। एक जमाना था लोक से जुड़े नेता वोट के साथ साथ नोट भी अपने चुनाव क्षेत्र से चुनाव का खर्चा चलाने के लिए मांगते थे और लोग सहर्ष देते थे। चुनाव जीतने के बाद भी इन नेताओं की आर्थिक हालत में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आता था। इस चुनाव के दौरान भी एक टी वी चैनल ने एक पुरानी जन प्रतिनिधि को परिवार के भरण पोषण के लिए अपने पति के साथ पत्थर ढ़ोते दिखाया था। अब जमाना बदल गया है। अब जनतंत्र का ऊर्जा स्त्रोत धनतंत्र होगया है। यदि पारिवारिक विरासत में राजनीतिक हैसियत प्राप्त न हो तो धनतंत्र उसे प्राप्त करने का सबसे सरल रास्ता है। बहुजन समाज पार्टी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। आज तो पैसे से चुनाव लड़ने के लिए टिकट खरीदा जाता है। (बहुजन समाज पार्टी मे यह खुले आम होता है।पिछले 2008 के विधान सभा चुनाव में दो मुख्य राष्ट्रीय दलों पर भी टिकट बेचने के आरोप लगे थे।)टिकट मिलने के बाद तो चुनाव जीतने के लिए हर कदम पर पैसा लगाना होता है। सभाओं व रोड शो करने के लिए भाड़े में लोगों को जुटाना पड़ता है।यह धन कहां से आता है और क्यों आता है।आज आम मतदाता भी यह खूब समझता है।
13वीं लोक सभा के समय तहलका से स्ट्रिंग आपरेशन तथा 14वीं लोक सभा के दौरान हुए विभिन्न स्ट्रिंग आपरेशनों से स्पष्ट हो गया कि तथाकथित जन प्रतिनिधि जनसेवा के मकसद से नहीं धनसेवा के मकसद से चुनकर आते हैं। इसीलिए हम देखते हैं जब भी सांसदों या विधायकों की या निगम स्तर के जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्ते को बढ़ाने के मसले पर सत्तापक्ष कोई प्रस्ताव लाता है उस पर राजनीतिक दलों में कभी कोई मतभेद नहीं होता। सर्वसंमति से ये प्रस्ताव पास होजाते हैं।
धनतंत्र के बल पर चुनाव जीते सभी प्रतिनिधि गैर कानूनी तरीके से ही अपने धनतंत्र को मजबूत करने में विश्वास नहीं करते।उदारीकरण के दौर में जो भी राजनीतिक दल सत्ता में आता है वह देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हित साधने के लिए ही नियम, कानून बनाता है नीति निर्धारित करता है। पिछले 18 सालों के अनुभव से साफ होगया है कि देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हित साधने में राजनीतिक दलों की विचारधारा आड़े नहीं आती।विकास का मतलब भी रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा व स्वास्थ से हटकर बिजली, सड़क व पानी होगया है। यह स्थिति उस जनतंत्र में है जहां एक सरकारी समिति ने अपनी रपट में उजागर किया था कि 80 प्रतिशत जनता की रोजना आमदनी महज 20 रुपया है। एक बात साफ है आम जन को जीवन की मूल सुविधाएं(रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा व स्वास्थ) मुहैय्या कराने से जनता की सेवा करने का दावा करने वाले प्रत्यासी व उनके राजनीतिक दलों को वह लाभ नहीं होता जो देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों को बिजली, सड़क व पानी की सुविधा उपलब्ध कराने में होता है। राजनीतिक दल किस प्रकार विकास के नाम पर देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हाथों इस देश की संपदा ओने पौने दामें में बेच रहे हैं इसका नंगा स्वरूप झारखंड, छत्तीसगड़ तथा उड़ीसा जैसे प्राकृतिक संपदा के धनी राज्यों में देखा जासकता है। अक्सर इस प्रक्रिया में संविधान, नियम व कानूनों को भी ताक पर रख दिया जाता है।आम आदिवासी या वनवासी जिसका अस्तित्व इन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है इसका विरोध कर रहा है और सरकारी तंत्र की ज्यादतियों का शिकार होरहा है। दुर्भाग्य से अक्सर उसे न्यायपालिका से भी राहत नहीं मिल रही है।
विकास के नाम पर पिछले 60 सालों में अपने जल जंगल जमीन के बेदखल होकर जब गरीब रोजी रोटी की खोज में शहर आता है तो यहां उसके लिए झुग्गी बनाने के लिए जगह नहीं है। वह सड़क किनारे रेड़ी लगाकर सब्जी आदि नहीं बेच सकता। अब बड़े बड़े मौल खोले जारहे हैं वहां ये व्यापारिक घराने खुदरा माल बेच रहे हैं। इन मौलों के लिए भी भूमि, बिजली, सड़क पानी चाहिये। पप्पू के हित इन देशी तथा विदेशी व्यापारिक घरानों के हितों से जुड़े हैं।निजीकरण व आउटसोर्सिंग की वजह से महज फर्राटो की अंग्रेजी बोलने वाले पप्पुओं को भी आसानी से नौकरी मिल रही है।मौल उनकी मौज मस्ती की पूरा प्रबंध करते हैं। आखिर मौज मस्ती के लिए एक ही जिंदगी तो है।उस एक ही जिंदगी में चुनाव के दिन मिली एक दिन की छुट्टी वोट देने में कैसे बरबाद की जा सकती है। इतना बड़ा दिल तो पप्पू के पास नहीं हो सकता। दूसरा वोट कोई भी दे। सरकार किसी भी दल की बने पप्पू की हित संरक्षित होता है। कारण पप्पू को नौकरी देने वाली कंपनी के हितों की सुरक्षा करने में ही हमारे जनप्रतिनिधि तन मन धन से लगे होते हैं।
जहां तक आम आदमी का सवाल है उसके लिए मताधिकार अस्तित्व का अधिकार है। उसको मालूम है लोकतंत्र पर धनतंत्र का ग्रहण लगा है और समय के साथ साथ इस ग्रहण का आकार-प्रकार भी बड़ा हो जारहा है । फिर भी वह बहुत सोच समझ कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहा है। मसलन् राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) की सरकार ने जिस तरह एक ओर गोदामों में अनाज सड़ाया या ओने पौने दामों में निर्यात किया पर भूख से मरते लोगों तक नहीं पहुचाया उसी का परिणाम उसे 14वीं लोकसभा के चुनाव में भुगतना पड़ा।इंड़िया शाइनिंग या फील गुड का राजग का नारा धरा का धरा रह गया।नई सरकार को कुछ नीतियां तो आमजन के लिए बनानी पड़ी।यह सच है क्रियांवयन में बहुत गड़बड़िया हैं।उसका खमिजाना यह सरकार भुगतेगी। पूर्ण बहुमत की उमीद तो किसी भी दल को नहीं है। यदि आमजन के हितों की रक्षा के लिए बनी नीतियां ईमांदारी से लागू की गई होती तो क्या यह हताशा होती।धनतंत्र के ग्रहण के बावजूद लोकतंत्र की यही जीत है।
लेकिन पप्पू का वोट देना हम क्यों जरूरी मानते हैं। अति आवश्यक तो है किसी बालिग नागरिक को मताधिकार से वंचित नहीं किया जाय।मुझे नहीं लगता कि कभी इस पर बहस हुई हो कि कैसे उन लाखों (यदि करोड़ों नहीं भी तो) बेघर लोगों को भी यह अधिकार मिले। उदारीकरण के दौर में हमारे शहरों को पेरिस या शांगहाई बनाने की होड़ में कई झुग्गी बस्तियां उजाड़ी गईँ। आवासीय बस्ती टूट जाने से इनके मतदाता पहचान पत्र भी वैलिड नहीं रहे। कई बस्तीवासियों को वैकल्पिक आवासीय जगह नहीं मिलने से इनके नए आवासीय पतों के आधार पर नए मतदाता पहचान पत्र भी नहीं बने हैं।चूंकि ये लोग अनपढ़ हैं, गरीब हैं हम इनके मताधिकार के बारे में चिंतित नहीं हैं। हमें लगता है इनके वोट नहीं देने से लोकतंत्र को कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पप्पू का वोट देना हमें आश्वस्त करता है कि वह सोच समझ कर लायक प्रत्यासी को ही चुनेगा।शायद यह हमारा आमजन के प्रति दुराग्रह ही है। यदि हम भ्रष्टाचार के आकड़ों और प्रकृति पर नजर डालें तो पाऐंगे कि भ्रष्टाचार करने वाले व भ्रष्टाचार को बढ़वा देने वाले अधिकतर लोग मध्यवर्गीय ही हैं। मध्यवर्ग ही गैर कानूनी तरीके से अपने हितों के संवर्धन के लिए घूस देता है या जान पहचान निकालता है। य़दि मध्यवर्ग पिछले दरवाजे से काम कराने बंद कर दे तो भ्रष्टाचार अपने आप कम हो जाएगा। गरीब मजबूरी में ही घूस देता है। चूंकि उसके पास कोई सरकारी ओहदा नहीं होता इसलिए वह घूस नहीं लेता है। घूस सरकारी मुलाजिम लेता है। अभी तो आम धारणा है कि छोटे से छोटा मुलाजिम भी जो घूस लेता है उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है। गरीब तो बाहुबली भी हो नहीं सकता। दूसरा बिना सफेद पोस के संरक्षण के बाहुबली का बजार नहीं फलता फूलता।
यदि लोकतंत्र में धनतंत्र के प्रभाव को कम करना है तो आज जरूरत है आमजन को बिना हील हुज्जत के मतदाता पहचान पत्र मिले। और इस मतदाता में अपने मताधिकार का बिना किसी लाग लपेट के प्रयोग करने का माद्दा जागे।जिस दिन यह मतदाता शराब की बोतलों, साडियों या बिरयानी की दावतों के एवज में मतदान न दे।बल्कि उपलब्ध प्रत्यासियों की सूची में सबसे लायक, तथा सबसे कम भ्रष्ट प्रत्यासी को चुनेंगे उस दिन धनतंत्र पर लोकतंत्र के विजयी होने की शुरुआत होगी।
रविवार, 9 नवंबर 2008
भारत कभी जगत गुरु होता था और आज!!!
अभी हाल तक भारतीय जनता दल के नेता ताल ठोक कर कहते थे कि पकड़े गए आतंकी मुसलमान ही होते हैं। अब जब उनकी करीबी साध्वी के भेष में सांप्रदायिक जहर उगलने के साथ साथ मालेगांव और मोडासा में हुए बम धमाकों संलिप्त होने के आरोप में पकड़ी गई है तो संघ परिवार के कई नेता इसको इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध जन आक्रोष बताने की कोशिश कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि हिंदू आतंकवादी नही होता। उड़ीसा के कंधमाल में इसाइयों के विरुद्ध की गई योजनाबद्ध हिंसा को भी आम जन द्वारा की गई स्वतः स्पूर्त हिंसा की संज्ञा दी जाती है। सवाल उठता है कि स्वतः स्पूर्त हिंसा भी तभी भड़कती है जब उसके लिए जमीन तैयार की गई होती है। एक समुदाय के लोगों के मन में दूसरे समुदाय के लोगों के प्रति घृणा, अविश्वास के बीज सतत् प्रयास से बोए जाते हैं। मौका मिलते ही ये बीज हिंसक घटनाओं के रूप में अंकुरित होते हैं। इससे पहले भी जब जब संघ परिवार ने दंगे भड़काए तो उन दंगो को जन आक्रोष की ही संज्ञा दी। 2002 के गुजरात के मुसलमानों के कत्लेआम को क्रिया प्रतिक्रिया कहा गया। जब जब जन आक्रोष की दलील दी गई तब तब दिमाग में एक सवाल कौंधा कि प्रतिद्वंदी को समूल नष्ट कर देना या उसकी कमर तोड़ देना तो भारतीय परंपरा नही रही। जब हमारी परंपरा ही नहीं रही तो फिर इस प्रकार का हिंसक व्यवहार अचानक 19वी 20बी सदी क्यों प्रारंभ हुआ वह भी धर्म के नाम पर।
हिंदू समाज में जाति-आधारित दमन शोषण रहा है पर प्रतिद्वंदी संप्रदायों का कत्लेआम नही
मसलन् जिस मर्यादा पुरुष राम का मंदिर बनाने के लिए अयोध्या और पूरे भारत में संघ परिवार हिंसा का तांडव नृत्य करवाता रहा है उस राम ने आताताई शासकों को हराया लेकिन कहीं भी प्रजा का कत्लेआम नही कराया।इसके विपरीत जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर जो हिंसा आज भड़काई जारही है उसमें निहत्थी गरीब प्रजा ही मारी जारही है। पांडवों को भी महाभारत का युद्ध मजबूरी में लड़ना पड़ा। युद्ध टालने के लिए उन्होंने कौरवों की हर जां बेजां शर्त मानी। लेकिन इसके बाद भी जब उनको पांच गांव देने के लिए भी कौरव राजी नही हुए तो महाभारत हुआ। इस महाभारत के युद्ध में भी सैनिक हताहत हुए। प्रजा का कत्लेआम तो नही हुआ। हां धर्म की रक्षा के नाम पर जातिवादी ब्राह्मणी व्यवस्था का ही संरक्षण किया।जिन शूद्रों व एकलव्यों ने इस ब्राह्मणी व्यवस्था को चुनौती देने की गुस्ताखी की उनको अपनी जान या अंगूठा खोना पड़ा। इस प्रकार भारतीय हिंदू जनमानस की आस्था के जो मुख्य प्रतीक माने जाते हैं जिनको आज भावनाएँ भड़काने तथा अपने ही देश के के लोगों को उजाड़ने के लिए इस्तेमाल किया जारहा है वे भावनाओं में बह कर अनाचार और अत्याचार करने वाले नहीं थे।उन्होंने तो आताताई शासकों का ही विनाश किया। और यह विनाश एक प्रकार से बेकसूर प्रजा को इन राजाओं के अत्याचारों से बचाया। नारी का अपमान खासकर उसकी अस्मिता लूटने जैसा जघन्य अपराध तो किसी भी हाल में क्षम्य नही था। आज किस हिंदू धर्म को बचाने के नाम पर ये सभी दुष्कर्म किये जारहे हैं?यह प्रश्न उन सबको पूछना चाहिये जो इनके बहकावे में आकर आम जनजीवन असुरक्षित कर रहे हैं। नारी अस्मिता लूट रहे हैं।
भारत के प्राचीन इतिहास पर एक सरसरी नजर डालने पर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि हम साम्राज्यवादी कभी भी नही रहे हैं। विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल में राजा, जनजातीय-सभा, और समिति की सहमति से ही निर्णय लिए जाते थे। बौद्ध काल (600 B.C.-A.D. 200 ) में गणराज्यों का अधिक चलन था। कई गणराज्यों में सत्ता बहुत सारे व्यक्तियों के हाथ में होती थी।गणराज्य के मुखिया का चुनाव होता था।सभी महत्वपूर्ण मसले सभा में पेश किये जाते थे।स्थानीय प्रशासन स्थानीय सभाएँ चलाती थी तथा राज्य के प्रशासन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। कुछ गणराज्यों में गावों को विभिन्न आर्थिक पेशों के आधार पर संगठित किया जाता था। हालाकि निरंकुश राजतंत्र इस काल में नही था। परन्तु सत्ता की प्रकृति और चरित्र भी पूर्णरूप से लोकतांत्रिक नहीं था।सभा और समितियों में कुलीन वर्गों के प्रबुद्ध लोगों का दबदबा था।इसी वर्ग के बुजुर्गों का सभा में भी बोलबाला था।(Om Prakash,Negating the Colonial Construct of Oriental Despotism: The Science of Statecraft in Ancient India) संक्षेप में शासन एक व्यक्ति तथा उसके सहायकों की सहायता से नही वरन् ऊँची जातियों के प्रबुद्ध लोगों की सहमति से चलता था।शासन, प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था में इन जातियों का दबदबा तब भी था और आज भी बरकरार है।
ईसा पूर्व 300 में कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र में मजबूत राजतंत्र की वकालत की तथा चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में प्रथम हिंदू साम्राज्य स्थापित किया। इस ग्रंथ में कौटिल्य ने लिखा है कि राजा को वर्ण तथा आश्रम आधारित सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहिये। इस ब्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन की आज्ञा नही थी। ब्राह्मणों का समाज में विशेष स्थान था। इसकी वजह से उनका राजनीति में भी गहरा प्रभाव था। राजा के मंत्री इसी जाति के लोग होते थे। राज पुरोहित का राजा पर खासा प्रभाव होता था। हालाकि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था जाति आधारित असमान व्यवस्था थी। कौटिल्य का राजा प्रजा पालक था। कौटिल्य ने सेना में सभी वर्णों के लोगों की भर्ती का प्रावधान किया था। योगक्षेम जिसकों बनाए रखना राजा का मुख्य उद्देश्य था, उराके तहत जनता का हित ही नही वरन् जनता की सम्पंनता तथा जनता की खुशहाली भी आती थी।राजा की खुशी प्रजा की खुशी में निहित थी। प्रजा के हित में ही राजा का हित भी होता था। राजा का सर्वप्रथम कर्तब्य असामाजिक तत्वों से, धोखेबाज ब्यापारियों, और कारीगरों से, चोरों डाकुओं व हत्यारों से प्रजा की रक्षण व पालन माना गया।संरक्षण का अर्थ जान माल की रक्षा था। यह मान्यता थी कि जो राजा अपनी प्रजा के प्रति अपने कर्तब्यों का ईमानदारी से पालन करता है वह स्वर्ग का अधिकारी होता है।
चंद्र्गुप्त को भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाला पहला सम्राट माना जाता है। चंद्रगुप्त के बाद पुत्र बिंदुसार फिर पोता अशोक गद्दी पर बैठा। इस महान साम्राज्य की जनसंख्या पचास मिलियन थी और क्षेत्र में यह मुगल साम्राज्य तथा भारत में अंग्रेजी साम्राज्य से भी बड़ा था। चंद्र गुप्त की राजधानी पाटलीपुत्र उस समय का विश्व में सबसे बड़ा शहर था।यह आठ मील लंबा व डेढ़ मील चौड़ा था।इसमें 570 स्तंभ थे और चौसठ दरवाजे थे। इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित करने पर भी चमद्रगुप्त को नहीं उसके पोते अशोक को विश्व इतिहास में सर्वोत्तम शासक माना जाता है। क्यों ?क्योंकि सम्राट अशोक ने ही विश्व को समानता तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाया। इसीलिए प्राचीन काल से ही भारत को विश्व में जगत गुरु माना जाता रहा है।
अशोक नैतिकता का वह पाठ जिसने भारत को जगत गुरु बनाया।
भारत को जगत गुरु बनाने का श्रेय सम्राट अशोक को जाता है। चंद्रगुप्त, बिंदुसार या इनके गुरु कौटिल्य को नहीं।अशोक ने क्या किया कि भारत जगत गुरु होगया। अशोक ने भारत का जबरदस्त नैतिक रूपांतरण किया।इसीलिए के. ए. नीलकांत शास्त्री ने लिखा है अशोक का राज्य भारतीय इतिहास के सर्वाधिक चमकदार पन्ने हैं। ये चमकदार पन्ने कलिंग की विजय नही हैं।वरन् इस विजय में हुई हिंसा से आहत होकर अशोक का भविष्य में केवल धम्म के माध्यम से ही विश्व विजयी होने का द्रढ़ निश्चय था। धम्म अशोक के लिए रामबांण होगया। अपने पहले शिलालेख में अशोक ने लिखवाया कि उनका सिद्दांत धम्म के माध्यम से रक्षा करना, धम्म के अनुसार ही शासन चलाना, धम्म से ही प्रजा को संतुष्ट रखना तथा धम्म से ही साम्राज्य की रक्षा करना।
नैतिकता से विश्वविजयी होने के लिए अशोक ने क्या किया? अपने निजी जीवन में आत्म-संयम, आत्म-नियंत्रण, मन की निर्मलता, पूर्ण समर्पण का भाव लाना, कृतज्ञता लाना सर्वाधिक आवश्यक बताया था।मन की निर्मलता प्राप्त किये बगैर धम्म का पालन संभव नही था। पड़ोसियों, रिस्तेदारों के लिए व्यवहार में ईमानदारी, उदारता बरतना,अपने से भिन्न लोगों(समाजों, संस्कृतियों) के प्रति सहिष्णुता, व आदर का भाव अपनाना,संपूर्ण प्राणी जगत के लिए स्नेह, सदभाव, आत्मीयता होना,बुजुर्गों के लिए श्रद्धा भाव व्यक्त करना, अपनी प्रजा की सुख सुविधा के लिए संचार माध्यमो तथा यातायात के साधनों की व्यवस्था करना, कुएँ खुदवाना, पेड़ लगवाना,सभी इंसानों और जानवरों के लिए इलाज की सुविधा करना आदि, आदि थे। गरीबों के हितों की बादशाह को खास चिंता थी। इसीलिए अशोक स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों का अक्सर दौरा किया करते थे।(Roger Boesche
Kautilya's "Arthaωstra" on War and Diplomacy in Ancient India
The Journal of Military History, Vol. 67, No. 1 (Jan., 2003), pp. 9-37).
इसके विपरीत आज स्वंय को भारतीय मूल्यों के अनुसार आचरण करने वाले ,राष्ट्रवादी, हिन्दूवादी बताने वाले राजनीतिक दल अपने ही शासित राज्यों में प्रजा का कत्लेआम करवा रहे हैं। औरतों का असमत लूटी जारही है। घर और संपत्ति लूटी और जलाई जारही है। लोगों को जंगलों या राहत शिविरों में शरण लेने मजबूर किया जारहा है। धर्म के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को ध्वस्त किया जाता है। हड़ताल और बंद का आह्वान कर शिक्षण संस्थानों,औद्योगिक इकाइयों, व व्यापारिक प्रतिष्ठानों को महिनों तक बंद रहने को मजबूर किया जाता है। अभी जिस प्रकार के समाचार पढ़ने और देखने में आरहे है उससे इन दलों द्वारा शासित राज्यों में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त संगठनों को संरक्षण तथा पोषण की संभावनाएँ भी लग रही हैं। सेना में भी आतंकियों की घुसपैठ होने के सबूत या संभावनाओं की जांच चल ही है। एक सेवा निवृत एवं एक कार्यरत पदाधिकारी को पुलिस (आतंकवाद निरोधक दस्ते) ने गिरफ्दार किया है। यहां यह बताना प्रासंगिक है कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक का भूतपूर्व सैनिकों का एक प्रकोष्ठ है। कल रात (07, 11 ) ,के एनडीटीवी हिन्दी सेवा का पट्टी में लिखा आरहा था कि एन डी ए शासन काल में बड़ी संख्या भूतपुर्व सैनिकों ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी। आतंकी घटनाओं में सेना के अफसरों भी हाथ होने की आशंकाओं के संदर्भ में उपरोक्त सूचनाएं महत्वपूर्ण और धर्म के नाम पर फैलाई जारही इस प्रकार की अराजकता से कितने लोगों की रोजी रोटी जाती है कितनों का भविष्य बरबाद होता है। इससे हिंदुत्व के इन ठेकेदारों को मतलब नहीं। इनको स्वर्ग तो जाना नही है। इनको तो किसी भी कीमत पर सत्ता सुख चाहिये। सत्ता में आने के बाद ये भी कांग्रेस की तरह अमेरिका के पिछलग्गू बनने में ही फील गुड करते हैं। चूंकि ये फील गुड करते हैं इसलिए फलते फूलते अमेरिका में ही इनको इंडिया शाइनिंग नजर आती है।अनाज से भरे भंडारों के बावजूद भूख से होरही भारतीयों की मौतें इनको विचलित नही करती। जगत गुरु भारत की और भारतवासियों की ऐसी दुर्दशा करने वाले स्वयं भारतीय ही क्यों हैं यह समझना आवश्यक है।
1990 के अंतिम चरण में, देश में लालकृष्ण आडवाणी के ‘रामरथ’ यात्रा के कारण बड़े पैमाने में दंगे हुए।इन दंगों में हुई हिंसा से व्यथित होकर बंगला भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार, व गांधी-विचारनिष्ठ लेखक शैलेशकुमार वंद्योपाध्याय ने दंगों के इतिहास पर पुस्तक लिखनी आरंभ की। पुस्तक लेखन के अंतिम दौर में बाबरी मस्जिद के तोड़ दिया गया था तथा पूरे देश को एक बार फिर दंगों की भयानक आग में झोंक दिया गया। इस पुस्तक के एक अध्याय दंगों की अनुवंशिकता में लेखक ने अंग्रेजों की बांटो राज करो नीति का पर्दाफास किया है। लेखक के ही शब्दों में
“1857 की घटना की पुनरावृत्ति न हो इसका उपाय सुझाने के लिए सन् 1859 में ब्रिटिश सरकार ने एक राँयल कमीशन की नियुक्ति की। ....उस राँयल कमीशन के सामने लाँर्ड एलिफिनस्टोन...ने कहा कि हिन्दू-मूसलमान की संयुक्त सैन्यशक्ति के कारण सैनिक विद्रोह आसान हुआ है। इसीलिए कमीशन ने भारतवासियों के बीच भेदभाव का बीज बोने के लिए सुनियोजित कार्यसूची की सिफारिश की।.... सन् 1862 में भारत सचिव उड ने बड़े लाट लाँड एलगिन को लिखा, भारत में हमने अपनी सत्ता एक दल को दूसरे दल से टकराकर कायम रखी है।और इस काम को हमें अभी जारी रखना होगा। अतः देशवासियों के अन्दर सामूहिक चेतना जागृत होने के मार्ग में रुकावट पैदा करने के लिए जो संभव हो किया जाय। सन् 1888 में भारत सचिव जार्ज फ्रांसिस हैमिल्टन ने कर्जन को लिखा ...हम यदि भारतवालियों को बिलकुल भिन्न भिन्न तरह के मतावलम्बी हिस्सों में विभक्त कर सकें तो शिक्षा –विस्तार के पलस्वरूप हमारी शासन-व्यवस्था के ऊपर जो प्रछन्न (गुप्त) तथा निरन्तर आक्रमण होने की सम्भावना है उसके विरुद्ध हमारी स्थिति और भी मजबूत हो सकेगी। पाठ्य पुस्तकों को हमें इस तरह तैयार करना होगा जिससे विभिन्न सम्प्रदायों के बीच के भेदभाबों को और भी बढ़ाया जासके।लाँर्ड क्रास ने भारत के बड़े लाँट डफरिन को बताया, धर्म के क्षेत्र में इस तरह का भेदभाव हमारे स्वार्थ के अत्यन्त अनुकूल है।अतः आपके द्वारा प्रायोजित भारत की शिक्षा- व्यवस्था तथा शिक्षण-सामग्री के सम्बन्ध में बनी जाँच कमिटी द्वारा दिये गये सुझावों से हमें कुछ फायदा होने की आशा है।”(पे. 140-141)
शैलेशकुमार वंद्योपाध्याय आगे जोड़ते हैं कि “भारत सचिव चार्ल्स उड ने वाइसराय को लिखा कि भारत में रह रहे जाति-समूहों का आपसी अन्तर्द्वन्द ही भारत में ब्रिटिशों को ताकत देगा। अतः एक फूट डालनेवाली शक्ति को हमेशा जिन्दा रखना होगा। क्योंकि यदि समग्र भारत हमारे विरुद्ध एक हो जाय तो हम कितने दिनों तक यहां टिके रह पायेंगे।”(पे.146) ऐसे ही कुछ उदगार गांधी ने भी हिन्द स्वराज में व्यक्त किये। गांधी ने लिखा कि अंग्रेजों ने अपनी ताकत के बल पर भारत नही लिया वरन् हम भारतीयों ने उन्हें दे दिया।
1904 में लिखी गई सखाराम गणेश देउस्कर की किताब देश की बात में भी लेखक ने आधुनिक भारत में पनपी धार्मिक असहिष्णुता के लिए अंग्रेजी राज को जिम्मेदार बताया। उनका मानना है कि “शरीर- युद्ध में भारतवासियों का बाहुबल और वाणिज्य-युद्ध में उनका धन बल हरण करके ही अंग्रेज शांत नहीं हुए। .…अंग्रेजों को भारतवासियों में बुद्धि-विप्लव उत्पन्न कर उनकी चित्त –वृतियों में खलबली पैदा करने के लिए भी युद्ध करना पड़ा है। इस देश में नई शिक्षा प्रणाली चलाकर देशवासियों का विचार- स्त्रोत नई राह में बहाना और पाश्चात्य सभ्यता की सहायता से लोगों की बुद्धि को मोहित कर उनमें आत्माभिमान और आत्म-शक्ति पर अविश्वास उत्पन्न कराना ही इस युद्ध का प्रधान लक्ष्य था।इस युद्ध से पराधीन जाति का मनरूपी खेत, जीतने वालों के हाथ में पूरी तौर पर चला जाता है।” (पे.261) इसी पुस्तक के संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में (1910) लेखक ने लाला हरदयाल के एक लेख को उद्धृत किया है। 1909 में मा़डर्न रिव्यू में छपे लेख में लाला ने लिखा “…कि जब तक कोई विजेता विजित जाति के सामाजिक कार्यों पर अपना प्रभुत्व नहीं जमा लेता अर्थात उनका परिचालन नही करने लगता, तब तक उसकी राजनीतिक जय पूरी नही होती और उस जय की स्थिरता भी नही रहती। जाति की आत्मा को नष्ट करने के लिए सामाजिक जय की आवश्यकता है। विजेता हमें यह सदा सिखाएंगे कि हमलोग उनकी अपेक्षा निम्नकोटि के हैं। उनके आईन और शासन-पद्धति से उनकी यह बात हमारे दिल में चुभ जाएगी। राजनीतिक विजय डंडे की चोट उनकी श्रेष्ठता और हमारी अक्षमता बता देती है। विजित जाति इसी समय अपनी निकृष्टता स्वीकार करती है, और भविष्योन्नति की आशा छोड़ बैठती है। यहीं से उसका मानसिक अधःपतन प्रारंभ होता है। ” (पे. 265)
संघ परिवार के छपे साहित्य पर एक नजर डालने पर हिंदू जाति के उज्ज्वल भविष्य के बारे में उनकी हताशा परिलक्षित होती है। इस निराशा का ताजा उदाहरण विश्व हिंदू परिषद का हिंदुओं से चार बच्चे पैदा करने की फरमाइश है। इसके पीछे जो तर्क दिया गया है वह आने वाले सौ साल में हिंदुओं की स्थिति इतनी दयनीय होने की संभावना बताई गई है कि हिंदू लड़कियों को अपनी अस्मिता बचाने के लिए आत्महत्या करनी पड़ेगी। इस प्रकार की हीन भावना, आत्मविश्वास की कमी, असुरक्षा और हिंसा का वातावरण तो विजित कमजोर का ही आवरण हो सकता है विजेता की मानसिकता की नहीं। विजेता मजबूत होता है और मजबूत को अपनी मजबूती पर विश्वास होता है।इस प्रकार आजादी के साठ साल बाद भी संघ परिवार स्वंय विजित की मानसिकता से उबर पाया है और न ही हमारे समाज को उबरने देना चाहता है।
1947 से पहले भारत को कमजोर करके ही अंग्रेजी साम्राजाय के हित सधते थे। सवाल है भारत को, तथा विभिन्न धर्मों, संप्रदायों में बटे, विभिन्न क्षेत्रों में रह रहे , अलग अलग भाषा बोलने वाले भारतीयों को कौन कमजोर कर रहा है। दंगों से अब किसके हित सध रहे हैं।गुजरात में 2002 में जो हिंसा हुई वह भारत और गुजरात दोनों के माथे पर कलंक का टीका है। इस हिंसा में जो धन संपत्ति का नुकसान हुआ जो उत्पादन के साधन नष्ट हुए जो रोजगार के अवसर समाप्त हुए उससे हिंदू, मुसलमान, गुजराती, भारतीय सभी प्रभावित हुए। इसी प्रकार जम्मू के चालीस दिन से अधिक के बंध, हड़ताल, काश्मीर को जोड़ने वाले इकलौते राजमार्ग को बंद कर देने से जो नुकसान जम्मू काश्मीर की अर्थव्यवस्था को हुआ उससे कौन कमजोर हुआ कौन मजबूत हुआ।उड़ीसा के बारे में भी यही सवाल उठाए जासकते हैं। वह क्या भाषा, प्रांत,क्षेत्र और धर्म के नाम पर लोगों को भड़का कर हिंसा करवा कर भारतीयों का जो आर्थिक, सामाजिक, सास्कृंतिक नुकसान इन राजनीतिज्ञों ने किया है उसका कभी मुल्यांकन होगा? क्या कभी सर्वोच्च न्यायालय इन मुद्दों पर हिंसक राजनीति करने वालों को उनके द्वारा करवाई गई हिंसा की वजह से हुए नुकसान की भरपाई करवाएगा? उमीद तो नही ही है। भारत में संप्रदायिकता का लंबा इतिहास इतना तो स्पष्ट करता है कि संप्रदायिक तत्वों ने अंग्रेजों के राज में आमजन को धर्म के आधार पर बांट कर अंग्रेजी साम्राज्यवादियों के हित साधे। राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर किया। साम्राज्यवादियों की देश का बटवारा करने में मदद की। आज फिर चारों तरफ हिंसा, अराजकता, अविश्वास, वैमनस्य फैलाकर फिर वही चाल चली जारही है। हिंदुओं के कमजोर होने का भय दिखाना भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है।
भारत में सिकंदर से लेकर आधुनिक काल तक विदेशी आक्रमण होते रहे हैं। परन्तु भारतीय राजाओं ने चीन की तरह पड़ोसी देशों में अपना कब्जा नही जमाया। भारत की ख्याति धर्म गुरु की रही है साम्राज्यवादी की नही। सम्राट अशोक भी महान बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार की वजह से बने कलिंग विजय की वजह से नहीं।
9,11 के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पूरे विश्व को दो खेमों में बाटने की कोशिश की।एक खेमा वह जो अमेरिका के नेतृत्व में विश्व को इस्लामी आतंकवाद से निजात दिलाएगा। साथ में यह चेतावनी भी दी गई कि जो देश या समूह इस खेमे का साथ नही देंगे उनको आतंकवाद समर्थक माना जायगा। इसके साथ साथ आतंकवाद को इस्लाम से भी जोड़ दिया गया। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि ओसामा बिन लादेन को इस्लामी जेहादी संगठन बनाने, पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी समाज को कट्टर सांप्रदायिक संगठनों में संगठित करने का काम अमेरिका ने ही किया।
संक्षेप में कहा जासकता है अंग्रेजी राज की तरह ही आज भी साम्प्रदायिकता पूँजीवादी नव-साम्राज्यवादी व्यवस्था जिसका अगुवा अमेरिका है को ही पोष रहा है। प्रश्न उठता है इसका जहर देश के विभिन्न इलाकों में, मतावलम्बियों में फैलाकर, हिंसा का तांडव करा कर हम किसका हित साध रहे हैं और क्यों साध रहे हैं?अमेरिकी नव-साम्राज्यवादियों का? भारत की तो यह परम्परा कभी नही रही है। यह हिन्दुत्व कहां से आयात किया गया है ?और क्य़ों?
शनिवार, 11 अक्टूबर 2008
गांधी जयंती के बहाने।
दो अक्तूबर गांधी जयंती के उपलक्ष में प्रधान मंत्री ने कहा कि नफरत और संघर्ष के कारण महात्मा गांधी का शांति(सत्य का नहीं?)और अहिंसा का संदेश आज भी दुनियां में प्रासंगिक है।लेकिन अपने समाज में अप्रत्याशित रफ्तार से बढ़ रही हिंसा की प्रवृति के कारणों और शीघ्रातिशीघ्र निदान खोजने की आवश्यकता उनको महसूस नही हुई।आज देश के किसी भी भाग में इंसान स्वयं को सुरक्षित महसूस नही कर रहा है। कहीं पर बम के धमाके हैं तो कहीं सांप्रदायिक हिंसा। सांप्रदायिक तत्व अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए आम लोगों को धर्म, जाति, भाषा प्रांत आदि के खांचों में बाट कर हिंसा के लिये भड़का रहे हैं।सरकारें इन असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने से बचती हैं । कारण उनके स्वंय के राजनीतिक हित इस प्रकार की हिंसा से ही सधते हैं। समाज में गरीबी, बेरोरजरगारी इस कदर बढ़ रही है कि समाज के बड़े तबके को वर्ग संघर्ष के अलावा न्याय पाने का दूसरा रास्ता नजर नहीं आता। क्रांतिकारी आंदोलनों को दबाने के लिए सरकारें गरीबों, शोषितों, विस्थापितों को आपस में बाटने में तथा एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने लगी हैं(मसलन् छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम)। गाधी जयंती पर राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि तो हिंसा के कारणों की समीक्षा ही होगी। क्योंकि सत्य के बगैर अहिंसा संभव ही नही है ।पर हमारे प्रधान मंत्री शांति तो याद रखते हैं सत्य नहीं।
‘त्याग की मूर्ति’ कांग्रेस अध्यक्ष ने भी पानीपत की अपनी रैली में गांधी के आदर्शों का बखान किया। परन्तु केन्द्रीय की सरकार की उपलब्धियों में उन्होंने केवल परमाणु करार का नाम लिया जिसको अमेरिकी सीनेट ने गुरुवार दो अक्तूबर को ही पास कर दिया था।परमाणु करार अपने आप में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला समझौता है। परमाणु ऊर्जा के जिस उत्पादन को इस करार से बढ़ाया जा सकेगा उससे पर्यावरण के प्रदूषण की जो आशंक्षा व्यक्त की जारही है। इस प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। और इस कुप्रभाव से मासूम बच्चे सर्वाधिक पीड़ित होते हैं। परमाणु ऊर्जा उत्पादन में लगी विदेशी कंपनियों के पुराने संयंत्रों को खरीदने में हमारे राजनेता इतने आत्मविभोर हुए हैं कि उनको दीवार पर लिखी यह इबारत नजर नही आती।उनको अपने नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य पर मडराने वाला खतरा भी नहीं दिखता। उन्हें यह जानने की आवश्यकता ही महसूस नही होती कि क्यों फ्रांस,डेनमार्क, नीदरलैंड परमाणु ऊर्जा उत्पादन से अपना हाथ खीच रहे हैं । अमेरिका में भी आखिरी परमाणु संयंत्र व्यावसायिक रूप में 1996 में चालू किया गया था।
सामयिक वार्ता में मनमोहन सिंह पर रत्नेश कुमार कविती छपी है।उसमें लिखा गया है प्रिय मनमोहन/भारतीय तन/ अमेरिकी मन/ कहता जन-जन। मनमोहन ही क्यों?अमेरिकी मन तो आज हर उस मध्यवर्गीय भारतीय का है जो कोई न कोई जुगाड़ लगा कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हिस्सा बनने की कोशिश में लगा है। या बन गया है। हम भारतीयों का यह मर्ज पुराना है।अंग्रेजों के भारत आने के बाद से ही अधिकतर संभ्रांत भारतीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने में ही अपना भविष्य देखने लगे थे। हिन्द स्वराज के सातवे अध्याय में गांधी लिखते हैं कि फटापट धनी बनने के चक्कर में भारतीयों ने कम्पनी के कारिन्दों की सहायता की उनको गले लगाया। 1947 में अंग्रेज चले गए।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय जगत में इग्लेंन्ड का स्थान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने ले लिया। अब अधिकतर संभ्रांत भारतीय (उनकी विचारधारा अमेरिका विरोधी ही क्यों न हो) अमेरिका से जुड़ने में ही अपना भविष्य देखते हैं। सरकारी स्तर पर 1992 से पूरे भारतीय व्यवस्थआ को ही अमेरिका के सांचे में ढ़ालने की कवायद होरही है। लेकिन अमेरिकीकरण की इतने सालों की प्रक्रिया में भी हम आजतक उनके(आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के) उस गुण को नही आत्मसात कर पाए जिसके गांधी भी कायल थे। हिन्द स्वराज के पांचवे अध्याय में अंग्रेजों के सदगुण बताते हुए गांधी लिखते हैं कि अंग्रेज कभी अपने देश की किसी प्रकार की हानि बर्दास्त नही करते । यह गुण अमेरिकियों में भी कूट कूट कर भरा है। इंग्लेंड से आजादी हासिल करने के बाद अमेरिका ने इंग्लेंड पर अपनी असमान आर्थिक निर्भरता से पूरी तरह निजात पा ली और ब्रितानी साम्राज्यवाद से अन्तर्राष्ट्रीय जगत में होड़ करने लगा । प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश की भूमिका में उभरा।
अमेरिका के विपरीत हम भारतीयों में ठेट भारतीय हितों के संरक्षण एवं संवर्धन की कोई जीजीविषा नही दिखती।(अपने को सबसे बड़े राष्ट्रवादी का तमगा देने वाले हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन अंग्रेजों के समय से ही उनके हाथ की कठपुतली बने रहे। आज भी देश के विभिन्न भागों को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौक कर साम्राज्यवादी तत्वों का ही हित साध रहे हैं।) यदि जीजीविषा होती तो अमेरिका के एक इशारे पर हमारे ईमान्दार प्रधान मंत्री अपनी सरकार को दांव पर नही लगाते तथा हर प्रकार के अनैतिक हथकंडे अपना कर संसद में विश्वास मत हासिल करने की औपचारिकता पूरी नही करते। जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने, सांसदों ने पाले बदले वह दर्शाता है कि हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की ही है।आज भी हम अपने पूर्वजों की तरह ही (इंग्लेंन्ड की जगह)अमेरिका का स्वागत,उसकी मदद अपने क्षुद्र निजी स्वार्थों की पूर्ति या प्रतिरोध की क्षमता की कमी की वजह से कर रहे हैं। गांधी ने इस खतरे से हमें 1909 में ही सावधान कर दिया था उन्होंने लिखा कि पूँजी अंग्रेजों के लिए ईश्वर है। आज अमेरिकियों के लिए भी यह ईश्वर से कम नही है। अमेरिकियों का व्यापार भी हमें 1909 में अंग्रेजों के व्यापार की तरह अति पसंद है। ब्रितानियों की तरह अपने तौर तरीकों से अमेरिकी हमें खुश रखते हैं और जो चाहते हैं हमसे करवा लेते हैं।(2,10,2008 की परमाणु संधि इसका एक उदारहण है।)
1909 गांधी ने बताया कि अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। तथा पूरी दुनियां को अपना बाजार बनाना उनका लक्ष्य था । उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेरिका ने भी आज पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी अर्थव्यवस्था का बंधक बनाकर रखा है।1909 की तरह आज भी हम देशवासी भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी पकड़ मजबूत करने में लगे हैं। 1909 में अंग्रेज पूरे विश्व को अपनी मंडी बनाने का प्रयास कर रहे थे पर पूरी तरह सफल नही हो पाए। इसके विपरीत आज अमेरिका ने पूरे विश्व को कमोवेश अपनी मंडी बना ही लिय़ा है। 1909 में यदि हमने आपस में लड़कर अंग्रेजों की शक्ति को बढ़ाया था तो आज भी सभी समाजों के सांप्रदायिक तत्वों ने पूरे देश को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौकने में कोई कोर कसर नही उठा रखी है।
हिन्द स्वराज के पंद्रहवे अध्याय में गांधी जी बताते हैं कि भारत को किस प्रकार का स्वराज नही चाहिये।अपना मंतब्य समझाने के लिए वे इटली का उदाहरण देते हैं। चूंकि समाज का भविष्य समाज को दिशा देने का दावा करने वाले नेताओं की विचारधारा पर निर्भर करता है इसलिए गांधी इटली के दो प्रमुख नेताओं की विचारधाराओं में भिन्नता की दर्शाते हुए राष्ट्र का मतलब समझाते हैं ।नेता का जनता के प्रति कर्तव्य बताते हैं। गांधी कहते हैं गैरीबाल्डी के लिए इटली का अर्थ वहां का राजा तथा उसके अनुचर थे, जबकि मैज्जिनी के लिए इटली का मतलब वहां की जनता थी। मैज्जिनी राजा को महज जनता का सेवक मानते थे।इटली और आस्ट्रिया के बीच हुआ युद्ध केवल दो राजाओं के बीच का टकराव था जिसमें इन देशों की जनता की हैसियत केवल प्यादे की थी। युद्ध जीतने के बाद इटली की उपलब्धियां मामूली रही। जिन सुधारों के नाम पर युद्ध लड़ा गया था उनको लागू नही किया गया। लोगों की हालत में कोई सुधार नही हुआ है। इसलिए इटली के मजदूरों में असंतोष पनपता रहा। वे हत्याएं करते रहे तथा विरोध प्रदर्शन करते रहे। उनके विद्रोह की आशंका हमेशा बनी रही। गांधी नही चाहते थे कि स्वराज मिलने पर भारत के लोगों की ऐसी दुर्गति हो। यहां के नेता जनता के नाम पर सत्ता हथिया लें ऐसा वे नही चाहते थे । गांधी के लिए राष्ट्र भक्ति (देश भक्ति ) का अर्थ आम जन को तानाशाही के दमन चक्र से बचाना था। देश भक्ति का गांधी के लिए मतलब था सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय । दबाव की राजनीति में गांधी विश्वास नही करते थे।वे मानते थे कि हिंसा के माध्यम से हासिल किये गए अधिकार स्थाई नही होते। कारण जैसे ही हिंसा का भय दूर होजाएगा व्यवस्था इन अधिकारों को वापस ले लेगी।
हमारी आजादी के साठ सालों का इतिहास दर्शाता है कि भारतीय लोगों को अधकचरी आजादी ही मिली।राजनीतिक दल सत्ता हथियाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। आम इंसान की आवश्यकताएं, और महत्वाकाक्षाएं, हमारे राजनीतिक तंत्र की प्रार्थमिकता नही रही है। समय बीतने के साथ साथ नेताओं तथा उनके द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था का असली रुप समाज के सामने आगया। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की जगह पूँजी खासकर विदेशी पूँजी हिताय उनका उद्देश्य रह गया है। 1992 के बाद स्थिति और भी खराब होने लग गई है। उदारीकरण की वजह से अमीर और अमीर गरीब और गरीब होरहे हैं।हताशा में विभिन्न वर्गों के लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अभी तक किसानों की आत्मह्त्या सुर्खियों में थी तो अब बुरकरों के आत्महत्या के समाचार आने लगे हैं। आर्थिक मंदी के कारण डाक्टर सटोरियों के भी मानसिक परेशानियों का शिकार होने की घटनाएं बता रहे हैं।
लोगों का धैर्य उनका साथ छोड़ रहा है।अपनी जायज और नाजायज मागें मनवाने के लिए लोग हिंसा का सहारा ले रहे हैं। व्यवस्था का दमन भी चरम पर है।आज देश और देशवासियों की हालात उस तरह की ही है जिस तरह की हालत देख कर गांधी को 1909 में रोना आता था। भारतीय नेता भी गैरीबाल्डी की तरह हैं। इन नेताओं के लिए लोग राष्ट्र का निर्माण नही करते वरन् भौगोनिक सीमाएं देश का निर्माण करती हैं।
‘त्याग की मूर्ति’ कांग्रेस अध्यक्ष ने भी पानीपत की अपनी रैली में गांधी के आदर्शों का बखान किया। परन्तु केन्द्रीय की सरकार की उपलब्धियों में उन्होंने केवल परमाणु करार का नाम लिया जिसको अमेरिकी सीनेट ने गुरुवार दो अक्तूबर को ही पास कर दिया था।परमाणु करार अपने आप में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला समझौता है। परमाणु ऊर्जा के जिस उत्पादन को इस करार से बढ़ाया जा सकेगा उससे पर्यावरण के प्रदूषण की जो आशंक्षा व्यक्त की जारही है। इस प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। और इस कुप्रभाव से मासूम बच्चे सर्वाधिक पीड़ित होते हैं। परमाणु ऊर्जा उत्पादन में लगी विदेशी कंपनियों के पुराने संयंत्रों को खरीदने में हमारे राजनेता इतने आत्मविभोर हुए हैं कि उनको दीवार पर लिखी यह इबारत नजर नही आती।उनको अपने नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य पर मडराने वाला खतरा भी नहीं दिखता। उन्हें यह जानने की आवश्यकता ही महसूस नही होती कि क्यों फ्रांस,डेनमार्क, नीदरलैंड परमाणु ऊर्जा उत्पादन से अपना हाथ खीच रहे हैं । अमेरिका में भी आखिरी परमाणु संयंत्र व्यावसायिक रूप में 1996 में चालू किया गया था।
सामयिक वार्ता में मनमोहन सिंह पर रत्नेश कुमार कविती छपी है।उसमें लिखा गया है प्रिय मनमोहन/भारतीय तन/ अमेरिकी मन/ कहता जन-जन। मनमोहन ही क्यों?अमेरिकी मन तो आज हर उस मध्यवर्गीय भारतीय का है जो कोई न कोई जुगाड़ लगा कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हिस्सा बनने की कोशिश में लगा है। या बन गया है। हम भारतीयों का यह मर्ज पुराना है।अंग्रेजों के भारत आने के बाद से ही अधिकतर संभ्रांत भारतीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने में ही अपना भविष्य देखने लगे थे। हिन्द स्वराज के सातवे अध्याय में गांधी लिखते हैं कि फटापट धनी बनने के चक्कर में भारतीयों ने कम्पनी के कारिन्दों की सहायता की उनको गले लगाया। 1947 में अंग्रेज चले गए।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय जगत में इग्लेंन्ड का स्थान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने ले लिया। अब अधिकतर संभ्रांत भारतीय (उनकी विचारधारा अमेरिका विरोधी ही क्यों न हो) अमेरिका से जुड़ने में ही अपना भविष्य देखते हैं। सरकारी स्तर पर 1992 से पूरे भारतीय व्यवस्थआ को ही अमेरिका के सांचे में ढ़ालने की कवायद होरही है। लेकिन अमेरिकीकरण की इतने सालों की प्रक्रिया में भी हम आजतक उनके(आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के) उस गुण को नही आत्मसात कर पाए जिसके गांधी भी कायल थे। हिन्द स्वराज के पांचवे अध्याय में अंग्रेजों के सदगुण बताते हुए गांधी लिखते हैं कि अंग्रेज कभी अपने देश की किसी प्रकार की हानि बर्दास्त नही करते । यह गुण अमेरिकियों में भी कूट कूट कर भरा है। इंग्लेंड से आजादी हासिल करने के बाद अमेरिका ने इंग्लेंड पर अपनी असमान आर्थिक निर्भरता से पूरी तरह निजात पा ली और ब्रितानी साम्राज्यवाद से अन्तर्राष्ट्रीय जगत में होड़ करने लगा । प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश की भूमिका में उभरा।
अमेरिका के विपरीत हम भारतीयों में ठेट भारतीय हितों के संरक्षण एवं संवर्धन की कोई जीजीविषा नही दिखती।(अपने को सबसे बड़े राष्ट्रवादी का तमगा देने वाले हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन अंग्रेजों के समय से ही उनके हाथ की कठपुतली बने रहे। आज भी देश के विभिन्न भागों को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौक कर साम्राज्यवादी तत्वों का ही हित साध रहे हैं।) यदि जीजीविषा होती तो अमेरिका के एक इशारे पर हमारे ईमान्दार प्रधान मंत्री अपनी सरकार को दांव पर नही लगाते तथा हर प्रकार के अनैतिक हथकंडे अपना कर संसद में विश्वास मत हासिल करने की औपचारिकता पूरी नही करते। जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने, सांसदों ने पाले बदले वह दर्शाता है कि हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की ही है।आज भी हम अपने पूर्वजों की तरह ही (इंग्लेंन्ड की जगह)अमेरिका का स्वागत,उसकी मदद अपने क्षुद्र निजी स्वार्थों की पूर्ति या प्रतिरोध की क्षमता की कमी की वजह से कर रहे हैं। गांधी ने इस खतरे से हमें 1909 में ही सावधान कर दिया था उन्होंने लिखा कि पूँजी अंग्रेजों के लिए ईश्वर है। आज अमेरिकियों के लिए भी यह ईश्वर से कम नही है। अमेरिकियों का व्यापार भी हमें 1909 में अंग्रेजों के व्यापार की तरह अति पसंद है। ब्रितानियों की तरह अपने तौर तरीकों से अमेरिकी हमें खुश रखते हैं और जो चाहते हैं हमसे करवा लेते हैं।(2,10,2008 की परमाणु संधि इसका एक उदारहण है।)
1909 गांधी ने बताया कि अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। तथा पूरी दुनियां को अपना बाजार बनाना उनका लक्ष्य था । उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेरिका ने भी आज पूरी दुनियां की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी अर्थव्यवस्था का बंधक बनाकर रखा है।1909 की तरह आज भी हम देशवासी भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी पकड़ मजबूत करने में लगे हैं। 1909 में अंग्रेज पूरे विश्व को अपनी मंडी बनाने का प्रयास कर रहे थे पर पूरी तरह सफल नही हो पाए। इसके विपरीत आज अमेरिका ने पूरे विश्व को कमोवेश अपनी मंडी बना ही लिय़ा है। 1909 में यदि हमने आपस में लड़कर अंग्रेजों की शक्ति को बढ़ाया था तो आज भी सभी समाजों के सांप्रदायिक तत्वों ने पूरे देश को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झौकने में कोई कोर कसर नही उठा रखी है।
हिन्द स्वराज के पंद्रहवे अध्याय में गांधी जी बताते हैं कि भारत को किस प्रकार का स्वराज नही चाहिये।अपना मंतब्य समझाने के लिए वे इटली का उदाहरण देते हैं। चूंकि समाज का भविष्य समाज को दिशा देने का दावा करने वाले नेताओं की विचारधारा पर निर्भर करता है इसलिए गांधी इटली के दो प्रमुख नेताओं की विचारधाराओं में भिन्नता की दर्शाते हुए राष्ट्र का मतलब समझाते हैं ।नेता का जनता के प्रति कर्तव्य बताते हैं। गांधी कहते हैं गैरीबाल्डी के लिए इटली का अर्थ वहां का राजा तथा उसके अनुचर थे, जबकि मैज्जिनी के लिए इटली का मतलब वहां की जनता थी। मैज्जिनी राजा को महज जनता का सेवक मानते थे।इटली और आस्ट्रिया के बीच हुआ युद्ध केवल दो राजाओं के बीच का टकराव था जिसमें इन देशों की जनता की हैसियत केवल प्यादे की थी। युद्ध जीतने के बाद इटली की उपलब्धियां मामूली रही। जिन सुधारों के नाम पर युद्ध लड़ा गया था उनको लागू नही किया गया। लोगों की हालत में कोई सुधार नही हुआ है। इसलिए इटली के मजदूरों में असंतोष पनपता रहा। वे हत्याएं करते रहे तथा विरोध प्रदर्शन करते रहे। उनके विद्रोह की आशंका हमेशा बनी रही। गांधी नही चाहते थे कि स्वराज मिलने पर भारत के लोगों की ऐसी दुर्गति हो। यहां के नेता जनता के नाम पर सत्ता हथिया लें ऐसा वे नही चाहते थे । गांधी के लिए राष्ट्र भक्ति (देश भक्ति ) का अर्थ आम जन को तानाशाही के दमन चक्र से बचाना था। देश भक्ति का गांधी के लिए मतलब था सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय । दबाव की राजनीति में गांधी विश्वास नही करते थे।वे मानते थे कि हिंसा के माध्यम से हासिल किये गए अधिकार स्थाई नही होते। कारण जैसे ही हिंसा का भय दूर होजाएगा व्यवस्था इन अधिकारों को वापस ले लेगी।
हमारी आजादी के साठ सालों का इतिहास दर्शाता है कि भारतीय लोगों को अधकचरी आजादी ही मिली।राजनीतिक दल सत्ता हथियाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। आम इंसान की आवश्यकताएं, और महत्वाकाक्षाएं, हमारे राजनीतिक तंत्र की प्रार्थमिकता नही रही है। समय बीतने के साथ साथ नेताओं तथा उनके द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था का असली रुप समाज के सामने आगया। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की जगह पूँजी खासकर विदेशी पूँजी हिताय उनका उद्देश्य रह गया है। 1992 के बाद स्थिति और भी खराब होने लग गई है। उदारीकरण की वजह से अमीर और अमीर गरीब और गरीब होरहे हैं।हताशा में विभिन्न वर्गों के लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अभी तक किसानों की आत्मह्त्या सुर्खियों में थी तो अब बुरकरों के आत्महत्या के समाचार आने लगे हैं। आर्थिक मंदी के कारण डाक्टर सटोरियों के भी मानसिक परेशानियों का शिकार होने की घटनाएं बता रहे हैं।
लोगों का धैर्य उनका साथ छोड़ रहा है।अपनी जायज और नाजायज मागें मनवाने के लिए लोग हिंसा का सहारा ले रहे हैं। व्यवस्था का दमन भी चरम पर है।आज देश और देशवासियों की हालात उस तरह की ही है जिस तरह की हालत देख कर गांधी को 1909 में रोना आता था। भारतीय नेता भी गैरीबाल्डी की तरह हैं। इन नेताओं के लिए लोग राष्ट्र का निर्माण नही करते वरन् भौगोनिक सीमाएं देश का निर्माण करती हैं।
बुधवार, 17 सितंबर 2008
पतिव्रता की मजबूरी
अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कांग्रेस के पास भेजे गए 123 के नीतिगत दस्तावेज में कहा कि करार में भारत को ईधन आपूर्ति का आश्वासन एक राजनीतिक वादा है और इसे कानूनी बाध्यकारी वादे में तब्दील नही किया जासकता। बुश का बयान आते ही भारत सरकार सफाई देने में या कहिये लीपा पोती में लग गई।कानूनी मामलों में कानूनविद ही ज्यादा अच्छी तरह समझा सकते हैं। अतः कपिल सिब्बल आगे आये उन्होंने फरमाया कि अमेरिका ने राजनीतिक वादा किया है कि परमाणु ईधन की आपूर्ति में रुकावट आने की स्थिति में वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के अन्य सदस्यों से मदद मांगेगा। कपिल सिब्बल ने सफाई दी कि बुश ने यह नही कहा कि वे इस राजनीतिक वादे का सम्मान नही करेंगे।सिब्बल का मानना है कि कानूनी बाध्यता एक अलग सवाल है। (जनसत्ता,13,09) भारत अमेरिका के संबंधों को समानता के तथा आपसी हितों के संरक्षण व संबर्धन के पटल पर स्थापित करने के आधार तो कानूनी प्रावधान ही होंगे। इसीलिए अमेरिकी सरकार ने हाइड कानून पास किया और इस संधि को हाइड कानून तथा 123 के तहत ही कांग्रेस से पास करवा रहा है। सरकारें तो शायद कानूनी बाध्यताओं के आधार पर ही चलती हैं राजनीतिक वायदों के आधार पर नहीं। क्योंकि राजनीतिक वादा तो वुश ने किया है। बुश की कुर्सी गई तो वादा भी गया। यदि कुर्सी रहते भी बुश वादे को भूल जाते हैं तो भारत क्या कर सकता है। यदि राजनीतिक वादे में कोई बाध्यता होती तो बुश को यह सफाई देने की क्या आवश्यकता थी कि कोई कानूनी बाध्यता नही है। इस संदर्भ में इतिहास से यह उद्धरण भी प्रासंगिक है। प्रथम विश्व युद्ध के समय में अपनी आजादी की अलख जगाए देशों का समर्थन पाने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने वादा किया कि युद्ध के बाद गुलाम देशों को स्वनिर्णय का अधिकार दिया जायगा।इसी उमीद में गांधी जी ने भारत में अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती का अभियान चलाया। लेकिन बाद में जब अमेरिकी कांग्रेस ने वर्साय संधि पर मुहर लगाने से इंकार कर दिया तो वुडरो विलसन के सारे वादे धरे के धरे रह गये। किसी ने उन पर मुकरदमा भी नही चलाया। अपने देश में दुर्भाग्य से बुश की कांग्रेस को सफाई के बाद यह राजनीतिक बनाम् कानूनी बाध्यता चिंता का विषय नही बनी। चिंता का विषय बना तो सरकार पर इस संधि का विरोध करने वाले वाम पंथियों के हाथ सरकार पर प्रहार करने के लिए आया यह नया हथियार। अमेरिका से संबंध बनाए रखने के लिए इस हथियार को भोथरा करना आवश्यक था।आज अधिकतर तथाकथित जागरूक भारतीय, मीडिया सभी अमेरिका के अनुकरण में ही देश का हित देख रहे हैं। सरकार और उसके समर्थक राजनीतिक दलों को तो इसी प्रकार के जनमानस की दरकार है।इसीलिए 11 सितंबर को अपने रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने वाशिंगटन में अमेरिकी हथियार कंपनियों को भरोसा दिलाया कि उनको देश में व्यापार करने का बराबरी का मौका दिया जायगा। भारतीय समुदाय के समारोह में मंत्री महोदय ने वियना में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से मिली छूट के लिए भी बुश प्रशासन का आभार जताया। लेकिन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में आने वाली दिक्कतों को ठंडे बस्ते में ही बंद रखना रक्षा मंत्री ने सुविधाजनक समझा।(जनसत्ता 12,9,) उल्लेखनीय है कि वाशिंगटन पोस्ट ने अपने संपादकीय Yes for an Answer में लिखा है कि भारत अमेरिका परमाणु संधि अमेरिका के हित में है। इससे अमेरिकी परमाणु उद्दोगों को बाजार मिलेगा। पोस्ट ने चिंता व्यक्त की कि यदि कांग्रेस इस विधेयक को पास नही करेगी तो बाजार का यह लाभ फ्रांसीसी कंपनियां ले लेंगी।(पी.टी.आई. 12,09,08) 13 सितंबर को संधि के विरोधी से समर्थक बने, मनमोहन सरकार के संजीवनी बने अमर सिंह ने फरमाया कि भारत अमेरिका असैन्य समझौते के बाद भारत जब उपकरणों का आर्डर देगा तो अमेरिका कंपनियों को घाटे नहीं रखा जाएगा।(जनसत्ता 14 सितंबर)स्मरणीय है कि इस प्रकार का बेवाक शर्त विहीन आश्वासन ये मंत्री व जन नेता अपने लोगों को नही देते। किसान 10 पंद्रह हजार का कर्ज नही चुका पाने के कारण देश के हर राज्य में आत्महत्या कर रहे हैं। पर है कोई माई का लाल नेता जो यह कह दे कि बहुत हो चुका अब भारत का किसान आत्महत्या नहीं करेगा। हमारे संवेदनशील प्रधान मंत्री भी पैकेज की घोषणा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। दलितों, आदिवासियों, गरीब गुरबों के बीच जाकर, उनकी रोटी पानी का सेवन करने की हिम्मत करने वाले, उनकी झुग्गियों में रात विता कर भारत के हासिये में रह रहे इंसान की मुश्किलों को समझने की कोशिश कर रहे भारत के युवा नेता राहुल गांधी भी आम भारतीय की हालत नही सुधरने का सारा दोष राज्य सरकारों पर मढ़ देते हैं। काग्रेस शासित राज्यों में भी हालात बेहतर नही हैं यह तथ्य उनकी जवान नही लड़खड़ाता। यही बात आतंकवादी हमलों या बाढ़ पीड़ितो को राहत पहुचाने के संदर्भ में कही जासकती है। इस प्रकार भारतीय नेताओं की भारतवासियों के लिए प्रतिबद्धता व अमेरिकी हितों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता में साफ फर्क नजर आता हैं।अमेरिका के लिए जब हम प्रतिबद्ध होते हैं तो बदले में अमेरिका से उसी प्रकार की प्रतिबद्धता की अपेक्षा भी नही करते।उल्टे जब कभी इस प्रकार के प्रश्न को दबाए रखना संभव नही होता तो लीपा पोती करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अमेरिका के एक खास प्रकार के संबंध बनाए रखने की हमारी मजबूरी एक पतिव्रता स्त्री की मजबूरी की भांति है।भारतीय पतिव्रता नारी भी अपने पति के हर अवगुण और वादखिलाफी को नजरअंदाज कर उसको परमेश्वर मानकर उसकी सेवा में लगी रहने में ही अपना सौभाग्य समझती रही है।आधुनिक भारत में राजा राम मोहन राय के समय से ही संपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय नेता व समाज सुधारक पतिव्रता स्त्री को पतिव्रत के इस गैर बराबरी तथा दोहरे मापदंड़ों की गुलामी से आजाद करने की कोशिश करते रहे। आज दुर्भाग्य से पूरे देश को ही अमेरिका के संदर्भ में इस प्रकार की गैर बराबरी के, आर्थिक गुलामी के रिस्तों में धकेला जारहा है। यह सब महान त्यागी कर रहे हैं। जाने माने अर्थशास्त्री कर रहे है और राष्ट्र हित के नाम पर होरहा है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)